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हिन्दू धर्म में एक ईश्वर के अतिरिक्त वृक्ष आदि की पूजा भाग -१

डॉ डी के गर्ग
अक्सर ऐसा कहते है की हिन्दू धर्म में एक नहीं अनेको भगवान् है ,किसकी पूजा करें ये समझ नहीं आता ,इसका लाभ विधर्मी उठाते है और कुछ सीधे सच्चे भावुक लोग इस्लाम आदि के चंगुल में फस जाते है। यधपि इस विषय पर लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं था फिर भी कुछ ऐसी बाते हुई की इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए मुझे बाध्य होना पड़ा।
१ एक भाषण में बौद्ध प्रचारक ने हिन्दू धर्म के विरुद्ध बोलते हुए कहा की ये कैसा धर्म है जिसमे कुत्ते, सर्प ,नाग,बैल ,गाय ,उल्लू को पूजते है ,और इन्सान को नहीं। जबकि बौद्ध केवल एक भगवन बुध को ही पूजते है।
२ मुस्लिम कहते है की इस्लाम में साफ़ साफ़ एक अल्लाह , एक दीन और एक किताब है । इस्लाम में कोई संदेह नहीं है।
३ एक नास्तिक ने कहा की वह हिन्दू धर्म को इसलिए नहीं मानता क्योकि ये लोग पेड़ ,पौधे ,जानवर , ईट ,पत्थर को भगवान मानकर पूजते है।
इस विषय पर पहले उपरोक्त बातो का संक्षिप्त जवाब देते हुए आगे विस्तार से चर्चा करेंगे ।
कुतर्क -१: हिन्दू धर्म में पशु,पक्षी ,पेड़ पौधे आदि को ही नहीं पूजा जाता बल्कि स्त्री ,शिक्षक ,शिल्पकार ,विद्वान आदि को भी पूजा जाता है। ये विस्तार से समझना जरुरी है। पशु पक्षियों की पूजा का अर्थ इनकी रक्षा करना है। इस विषय में नीचे विस्तार से लिखा गया है ।
कुतर्क -2 : हिन्दू धर्म में एक ही ईश्वर है जिसका मुख्य नाम ॐ है ,बाकि अन्य नाम गौणिक है। हिन्दू धर्म में एक ग्रंथ है जिसको वेद कहते है । वेद ४ है ,बाकि वेदांग है जो ऋषि कृत ग्रन्थ है जैसे उपनिषद ,दर्शन शाश्त्र ,मनुस्मृति ,आदि। रामायण ,गीता ,महाभारत आदि अच्छे ग्रन्थ है लेकिन ये धर्म ग्रन्थ की श्रेणी में नहीं आते क्योकि इनको लिखने का उद्देश्य अलग अलग है। लेकिन मुस्लिम में सैकड़ो फिरके है जिनकी अलग अलग मान्यताये है। जीव हत्या है ,व्यभिचार है ,इसलिए इस्लाम एक दीन नहीं है।
कुतर्क ३ : पत्थर को भगवान मानकर पूजना अज्ञानता है। ऐसा कही भी हिन्दू धर्म ग्रन्थ वेद -शाश्त्रो में नहीं लिखा है की मूर्ति की पूजा की जाये। ईश्वरीय ज्ञान वेद में मूर्ति पूजा को अमान्य कहा गया है. इसके पीछे कारण बताया जाता है कि ईश्वर का कोई आकार नहीं है और ना ही वो किसी एक जगह व्याप्त है. ईश्वर दुनिया के कण-कण में व्याप्त है. वेदों में वर्णित किया गया है कि भगवान की कोई मूर्ति नहीं हो सकती.
न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: – (यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3)
इसलिए ये आरोप लगाना की हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा है ,गलत है ,जो मूर्ति पूजा करते है वे अज्ञानतावश करते है। मूर्ति पूजा का भावार्थ है की जीती जागती मुर्तिया जैसे मनुष्य ,पशु ,पक्षी ,जलचर आदि का उचित सम्मान देना , हिंसा ना करना ,सृष्टि में सभी की भागीदारी स्वीकार करना ,सभी का सदुपयोग करना आदि है। राम कृष्ण आदि महापुरुष है ,ईश्वर के अवतार नहीं। ईश्वर जन्म मृत्यु से अलग है ,वह हमेशा से है और रहेगा।
मूर्ति बनाना एक शिल्पकला है जिसके माध्यम से छोटे बच्चो को ईश्वर के विभिन्न गुणों के विषय में बताने का प्रयास किया है।
हिन्दू धर्म में ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा का भावार्थ: कुछ प्रमुख उदाहरण द्वारा समझे
१ हिन्दू धर्म में स्त्री पूजा : शास्त्रानुसार-‘पूजनं नाम सत्कारः’अर्थात् यथोचित व्यवहार करना, पूजा है। लोक व्यवहार में भी यही प्रचलित है। भूखा बालक जब भूख-भूख चिल्लाता है तो माँ कहती है दो मिनट में तेरी पेट पूजा करूँगी। यहाँ पूजा से तात्पर्य हाथ जोड़ना या पेट की आरती करना नहीं, अपितु यथोचित व्यवहार- भोजन खिलाना है। दुष्ट के लिए कहते हैं, पीठ पूजा कर दो।
मनु ने लिखा है-
यत्र नार्यस्तु… भूषणाच्छादनाशनैः। – मनु. ३/५९
अर्थात् नारियों की सदैव भूषण, वस्त्र तथा भोजनादि से पूजा-सत्कार, सम्मान करना चाहिए। इस प्रकार पूजा का अर्थ यथोचित व्यवहार, सत्कार, सम्मान करना होता है।
मातृ देवो भव :
पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥
अर्थात : गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!-महर्षि वेदव्यास
२ हिन्दू धर्म में गुरु पूजा :
हिन्दू धर्म में शिक्षक का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है ,शिक्षक द्वारा वेदो का ज्ञान दिया जाता है ,शिक्षक विद्यार्थी को विभिन्न विषयो की शिक्षा योग्य बनाते है और विद्यार्थी को दुनिया में सफल बनाने का प्रयास करते है। अज्ञानी लोग इसका गलत अर्थ निकालकर किसी धर्मगुरु को गुरु मानकर ईश्वर की भांति पूजते है।धर्मशास्त्र क्या कहते है ,देखें :
इस जगत का सबसे बड़ा गुरु कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें योग दर्शन में मिलता हैं।
स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 )
वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है ।इसलिए ईश्वर का एक नाम गुरु भी है ,जो परमेश्वर का उपनाम है।
• मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेदः ( शतपथब्रा ० ) ।
यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान होता है वह कुल धन्य है वह संतान बड़ा ही भाग्यवान् है जिसको उत्तम् धार्मिक एवं विद्वान माता -पिता प्राप्त है ।
हिन्दू धर्म में माता को प्रथम गुरु स्वीकार किया गया है। माता ही बच्चे की प्रथम गुरू होती है। उसके आचार विचार, गुण, कर्म, स्वभाव तथा उसके प्रत्येक क्षण के चिंतन से संतान का निर्माण होता है। अपने इतिहास की ओर देखें तो वैदिक काल में मदालसा, सीता, कुंती, कौशल्या आदि माताओं ने संतानों का निर्माण कर अपने देश और संस्कृति की रक्षा की है।
• अधिगच्छति शास्त्रार्थःस्मरति श्रद्दधाति च ।
यत्कृपावशततस्मै नमोऽस्तु गुरुवे सदा | शाब्दकौस्तुभः १.३.६७ ।
जिसकी कृपा से शास्त्र का अर्थ समझ में आता है जो स्मरण व धारण किया जाता है उस गुरु को सदा हमारा प्रणाम हो ।
• अनुपासितवृद्धानां विद्या नातिप्रसीदति।वाक्यपदीम् ।
विद्या वृद्ध गुरुजनों अनुभवी विद्वानों के सानिध्य एवं उपासना किए बिना विद्या निखरती नहीं है । अतः विद्वानों का सानिध्य प्राप्त करने के लिए हमें सर्वदा तत्पर रहना चाहिए ।

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