पुण्य कितना बड़ा रक्षक है?

मनुष्य के दुष्कर्म (पाप) जब उसे विदीर्ण करते हैं अर्थात उसके सामने आते हैं तो वे मनुष्य पर ऐसे प्रहार करते हैं जैसे भूखे भेडिय़े अपने शिकार पर टूटते हैं और उसे नोंच नोंचकर खाने लगते हैं। ऐसे वक्त में अपने भी साथ छोड़ देते हैं। सब हेय भाव से देखते हैं। जीवन नरक बन जाता है। जिन्हें हम सहारा समझते हैं वे मुंह मोड़ लेते हैं और बात बात पर अपमान, उपेक्षा और अभाव के डंडे पडऩे लगते हैं। वह व्यक्ति अपनों के ही बीच में खड़ा पिटता है और कोई छुड़ाने नही आता। यही है परमात्मा की केन्द्रीय कारागार जहां न कोई कंटीली बाड़ है, न ऊंची ऊंची दीवार है, न कोई संतरी अथवा पहरेदार है, न कोई पीटने वाला हथियार है न कोई चीख पुकार है मगर फिर भी पिटता है। कहीं भाग भी नही सकता। अपने गमों के दर्द को दिल में ही पीकर जीता है। मनुष्य की अमर कांति के मोती (आंसू) आंखों से टप-टप गिरते हैं जिन्हें कोई पोंछने तक नही आता। अपने आंसू आप पोंछता है। कैसी हृदय विदारक स्थिति बना देता है पाप? जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जायें, कलेजा मुंह को आ जाये, पत्थर का भी दिल पिघल जाये।
ऐसी भयावह स्थिति से छुड़ाने के लिए यदि कोई आता है तो व्यक्ति का पुण्य आता है। यह पुण्य ही वह ढाल है, जो पापों के दारूण दुखों से ऐसे बचाता है जैसे अग्नि, सर्दी से बचाती है, रेनकोट अथवा छाता वर्षा से बचाता है। पुण्य के कारण ही प्रभु कृपा ढाल बनकर सामने आती है जो कल तक प्रतिकूल थे वे अनुकूल बन जाते हैं, अर्थात शत्रु मित्र बन जाते हैं। इतना ही नही पुण्य का प्रताप मनुष्य को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाता है। उसे अपने कर्मक्षेत्र में महानता की सीढ़ी चढ़ाता है। इसलिए जीवन में जितना हो सके पुण्य करो। मत भूलो, यह जीवन क्षण भंगुर है और पुण्य हमारा इस लोक में ही नही, अपितु परलोक में भी सबसे बड़ा रक्षक है। इस संदर्भ में प्रश्नोपनिषद का ऋषि पृष्ठ 130 पर कहता है-पुण्य कार्य करने से हृदय में बैठे हुए आत्मा को उदान नाम का प्राण पुण्यलोक में ले जाता है, पाप कर्म करनेसे आत्मा को उदान पाप लोक में ले जाता है, दोनों प्रकार के कर्म करनेसे आत्मा को उदान मनुष्य लोक में ले जाता है। इसी श्रंखला में ब्रहदारण्यक उपनिषद का ऋषि पृष्ठ 895 पर कहता है, जीव मरते समय सविज्ञान हो जाता है, अर्थात जीवन का सारा खेल उसके सामने आ जाता है। यह विज्ञान उसके साथ साथ जाता है। विद्या (ज्ञान) कर्म और पूर्व प्रज्ञा बुद्घि वासना संस्कार ये तीनों भी इसके साथ जाते हैं। इन्हीं के आधार पर पुनर्जन्म का निर्धारण होता है। इसलिए क्यों न अधिक से अधिक पुण्यों का संग्रह किया जाए?
पुण्य के कारण ही व्यक्ति परमात्मा की महती कृपा का पात्र बनता है। देखते ही देखते उसके भाग्य का सितारा चमकने लगता है। लोग कहने लगते हैं इसका कोई पुण्य उदय हो गया है। उसे वे सब साधन और व्यक्ति सहज रूप से मिलते चले जाते हैं जो उसे जीवन की बुलंदी तक पहुंचाते हैं। तरक्की के वे सब रास्ते खुलते चले जाते हैं जो कल तक दुरूह थे। इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस में कितना सुंदर और सटीक कहते हैं:-
अति हरिकृपा जाहि पर होई।
पाऊं देहि ऐहिं मारग सोई।।
उत्तरकाण्ड पृ. 919
योग वशिष्ठ में पुण्य को परलोक की मुद्रा कहा है : जिस प्रकार किसी देश में जाने के लिए वहां की मुद्रा (रूबल, डालर, पौण्ड, येन इत्यादि) की आवश्यकता होती है, ठीक इसी प्रकार परलोक स्वर्ग में जाने की इच्छा रखने वाले को पुण्य रूपी मुद्रा का अधिक से अधिक संचय करना चाहिए। यही मुद्रा आपको स्वर्ग में प्रवास कराएगी, पाप नही। पुण्य के महत्व के संदर्भ में कवि के ये शब्द बड़े ही प्रेरक हैं कि किसी शबाब की वजह से इस जिंदगी में कोई खशुशियत मिला करती है।
प्रजापति ने इस सारी सृष्टिï को चौरासी लाख योनियों में रचाया है। केवल मनुष्य योनि को छोड़कर सभी योनियां भोग योनि है अर्थात पिछले कर्मों का भोग उन योनियों में सभी जीव भोग रहे हैं। किंतु आगे के लिए अपना परलोक नही सुधार सकते जबकि मनुष्य योनि में हम पिछले जन्मों के कर्मों का फल भोगने के साथ साथ अपना परलोक भी सुधार सकते हैं।
यदि हम चाहें तो पुण्य और भक्ति कर सकते हैं अन्य योनियों में यह विशिष्टïता परमात्मा ने उपलब्ध नही करायी। मानव जीवन का महत्व सुझाते हुए रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थिहिं गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।
पाइ न जेहिं, परलोक संवारा।।
अर्थात बड़े भाग्य से मनुष्य शरीर मिलता है।
यह देवताओं को भी दुर्लभ है, ऐसा हमारे धर्मग्रंथों में कहा है। यह मानव शरीर तो साधना के लिए मिला था वासना के लिए नही। ऐसे लोगों पर तरस आता है जिन्होंने इसे पाकर भी परलोक नही संवारा अर्थात भक्ति और पुण्य नही कमाया।
योगदर्शन का ऋषि कहता है भोग योनियों में जितने जीव फंसे हैं उनके केवल तीन कोश ही क्रियाशील हैं, खुले हुए हैं जबकि केवल मात्र मनुष्य योनि ऐसी है जिसमें जीव के पांच कोश क्रियाशील हो सकते हैं।

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