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इतिहास के पन्नों से

१३ अगस्त १९८० का वह काला दिन।*

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बृजेन्द्र सिंह वत्स

आज १३  अगस्त २०२३ है, दिन रविवार। वर्ष १९८० की १३ अगस्त को बुधवार का दिन था। हरियाली तीज की उमंगो  के साथ ही ३० दिन के पवित्र  रमजान माह के पश्चात उस दिन देश ईद उल फितर  का पर्व भी मना रहा था।ईद उल फितर के  अवकाश का आनंद लेने के उद्देश्य से मैं अपने साथी श्री राजीव हरी जो वर्तमान में दैनिक हिंदुस्तान में वरिष्ठ पत्रकार हैं, के साथ मुरादाबाद की सड़कों पर निकल पड़ा था। हम दोनों सम आयु हैं। समय यही रहा होगा कोई दस बजे  के पश्चात का। उस समय हम दोनों १८ वर्ष पार कर चुके थे। तहसील स्कूल के चौराहे को पार करके 

हम दोनों अपनी एक साइकिल पर कायम की बेरी में प्रवेश कर गए लेकिन अब तक हमें रास्ते में एक सन्नाटे का आभास मिल रहा था और इसका कारण हम यह लगा रहे थे कि वह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र था और हमारे विचार में लोग नमाज इत्यादि में व्यस्त होंगे। रेती मोहल्ले के मुंह पर एक पब्लिक टाइप सेंटर था, जिसकी दो मंजिली छत पर घर के लोग जमा थे और उन्हीं में से ही किसी ने चिल्ला कर हम दोनों को चेतावनी के स्वर में कुछ कहा जो हमारी समझ में नहीं आया लेकिन सामने से आती हुई बदहवास भीड़ से यह आभास हो चुका था कि नगर में कुछ उत्पात हो चुका है। बाजार बंद था लेकिन रास्ते में अफरा तफरी मची हुई थी अब हमारा संदेह विश्वास में परिवर्तित हो चुका था। हम दोनों अपने घर की ओर लौटने के प्रयास में राह खोजने में जुटे हुए थे लेकिन हम जिधर भी जा रहे थे, वहीं एक अराजक भीड़ सड़क पर तांडव करती दृष्टिगोचर हो रही थी। हम दोनों टाउन हॉल के चौराहे की तरफ बढ़े, जहां कोतवाली पुलिस नियंत्रण करने का प्रयास कर रही थी और उसी समय एक पुलिस वाले ने हम दोनों को हड़का कर बुध बाजार चौराहे की ओर खदेड़ दिया। सड़क पर भयभीत कर देने वाला सन्नाटा था या फिर विभिन्न स्थानों से उठने वाले नारों की आवाज़े। स्थान स्थान पर होता हुआ पथराव और नियंत्रित करने के प्रयास में उलझी हुई पुलिस। हमारी यात्रा लगभग दस बजे आरंभ हुई थी और हम दोनों विभिन्न मार्गो से होते हुए अंततः यदि मुझे सही स्मरण है तो मुरादाबाद के डिप्टी गंज के बिजली घर के साथ बनी पुलिया पर लगभग तीन बजे पहुंचे थे। पूरे रास्ते हम एक वर्ग विशेष की उत्पाती भीड़ को ही देख रहे थे जो अपने पवित्र पर्व वाले दिन प्रशासन को पंगु बनाने पर तुली हुई थी। उस पुलिया पर हम जैसे कई लोग उपस्थित थे लेकिन सामने वही उत्पात नजर आ रहा था और मुगलपुरा थाने की पुलिस अपनी नागफनी पुलिस चौकी को बचाने के प्रयास में कार्यवाही कर रही थी। संघर्ष का आरंभ ईदगाह पर हुआ था जहां अराजक भीड़ ने पुलिस पर आक्रमण किया था ।कई पुलिस थानों को आग के हवाले कर दिया गया था और एक प्रशासनिक अधिकारी की हत्या भी इस अराजक भीड़ द्वारा की गई थी।
अगले दिन १४ अगस्त को स्थिति भयंकर रूप से तनाव पूर्ण हो चुकी थी। मुस्लिम और पुलिस के संघर्ष ने सांप्रदायिक संघर्ष का रूप धारण कर लिया था। ऐसी सूचनाएं थीं कि उस दिन तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह मुरादाबाद में परिस्थितियों का मूल्यांकन करने आए थे और सारी रात नगर में लगते भयावह नारों को सुनकर दिल्ली वापस लौट गए थे। संभवत: ज्ञानी जी की रिपोर्ट और प्रदेश सरकार जिसके मुखिया विश्वनाथ प्रताप सिंह थे ,की सूचनाओं के आधार पर प्रदेश सरकार ने कुछ परिवर्तन करते हुए मुरादाबाद के जिलाधिकारी एसपीआर्य को स्थानांतरित किया और उनके स्थान पर मधुकर गुप्ते आईएएस को कार्यभार सौंपा गया। साथ ही मुरादाबाद को सीमा सुरक्षा बल के नियंत्रण में दे दिया गया।इस दंगे की भयावहता इतनी थी कि आज ४३ वर्ष बाद भी इसे स्मरण करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दंगा इतना भयंकर था कि अक्टूबर ८० में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने मुरादाबाद का दौरा किया तो वह भी इसके प्रभाव से आतंकित हो गई थीं। मुझे स्मरण है कि मुरादाबाद में १९८२ अथवा ८३ तक सुरक्षा के नाते रात्रिकालीन कर्फ्यू रहता था।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दंगे के अन्वेषण हेतु न्यायमूर्ति एम पी सक्सेना आयोग गठित किया था और सक्सेना आयोग ने एक लंबी समय अवधि तक इस कांड की तह तक पहुंचने के निमित्त बहुत से व्यक्तियों का साक्ष्य तथा अभिलेख ही साक्ष्य एकत्रित किया था तथा अंततः १९८३ में शासन को अपनी आख्या प्रस्तुत कर दी लेकिन उधर आयोग अपना अन्वेषण कर रहा था किंतु मुरादाबाद में जन धारणा थी कि इस दंगे के पीछे डॉक्टर शमीम अहमद और डॉक्टर हामिद हुसैन उर्फ अज्जी का कुटिल मस्तिष्क काम कर रहा था। वर्ष १९७१ में जहां तक मुझे स्मरण है ५ मार्च को मुरादाबाद में लोकसभा का मतदान हुआ था। डॉक्टर शमीम अहमद मुस्लिम लीग के टिकट पर कश्ती के चुनाव चिन्ह इस निर्वाचन में भाग ले रहे थे और जनसंघ के वीरेंद्र अग्रवाल से पराजित भी हुए थे लेकिन मतदान वाले दिन सांय को मुरादाबाद में सांप्रदायिक दंगा मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से आरंभ हुआ था और उसे दंगे की चपेट में मुरादाबाद आ गया था। उसे समय भी जन धारणा के अनुसार इस दंगे के पीछे शमीम अहमद खान का ही हाथ था। सक्सेना आयोग द्वारा सरकार को प्रस्तुत आख्या के अनुसार उन्होंने जन धारणा पर अपनी मोहर लगा दी।
मुरादाबाद के वातावरण में प्रवाहित जन धारणा तथा सक्सेना आयोग की सम्मति के अनुसार मुरादाबाद कांड का अपराधी डॉक्टर शमीम अहमद खान था। यह आख्या १९८३ में सरकार को सौंपी गई। उस समय प्रदेश में कांग्रेस की वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व में सरकार थी। आज कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी मुस्लिम लीग को धर्मनिरपेक्ष पार्टी कहते हैं। स्पष्ट है कि जो उन्हें पूर्वजों से मिला था वही वह कह रहे हैं। केरल में कांग्रेस का मुस्लिम लीग से गठबंधन था संभवत: इसीलिए वीर बहादुर सिंह यह आभास पाने के पश्चात
कि सक्सेना आयोग की संस्तुतियों में संदेह की सुई मुस्लिम लीग के शमीम अहमद की ओर है और चूंकि कांग्रेस मुस्लिम लीग को धर्मनिरपेक्ष मानती थी इसलिए उन्होंने इस आयोग की संस्तुतियों पर कोई कान नहीं धरा और इस प्रकार एक अपराधी १९८९ में माननीय बन कर विधानसभा में पहुंच गया।
१९८३
से २०२३ तक उत्तर प्रदेश में बहुत सारे मुख्यमंत्री सत्ता में आए। एनडी तिवारी, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव,२०१२ में बहुमत से आई मायावती की स्थिति समझी जा सकती थी लेकिन भाजपा के कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता तथा राजनाथ सिंह एवं भाजपा के सहयोग से मायावती के शासनकाल में इस आख्या के ऊपर से पर्दा न हटना किस ओर इंगित करता है? यह संस्तुतियां भाजपा और संघ को दोष मुक्त करने वाली हैं। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग भाजपा और संघ पर सदैव दंगे भड़काने का आरोप लगाते रहते है,सक्सेना आयोग ने स्पष्ट रूप से भाजपा हिंदू और आर एस एस को इस कांड के लिए निर्दोष कहकर इन सबके मुंह पर ताला जड़ दिया है।सक्सेना आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस पूरे संघर्ष में एक छोटा किंतु निर्णायक मुस्लिम पक्ष ही आक्रामक था। प्रश्न फिर वही है कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने इस तथ्य पर से पर्दा क्यों नहीं उठाया? इस प्रश्न के उत्तर में मुझे लगता है कि गांधीवादी समाजवाद की अवधारणा पर अटल बिहारी वाजपेई द्वारा स्थापित भारतीय जनता पार्टी भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के मकड़जाल में फसी हुई थी इसलिए यह राज अब तक राज ही रहा और दोनों अपराधी ससम्मान दुनिया से कूच कर गए। यदि समय रहते यह रिपोर्ट सदन के पटल पर रख दी जाती तो निश्चित रूप से समाज में विद्वेष फैलाने वाला एक अपराधी सदन में प्रवेश पाने से वंचित हो सकता था।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा इस अभिलेख को सार्वजनिक करने से तथाकथित धर्मनिरपेक्षों द्वारा फैलायी गई यह अवधारणा कि उस कांड में मुसलमान पीड़ित था, पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। इन संस्तुतियों के आधार पर सरकार को नीति निर्धारित करनी चाहिए तथा एक सुदृढ तंत्र विकसित करना चाहिए जिससे कि मुरादाबाद कांड जैसी घटनाओं की पुनरावृति भविष्य में न हो सके।

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