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बिखरे मोती

गुणों से भी श्रेष्ठ सौम्य स्वभाव होता है

प्राय: देखा गया है कि कुछ लोगों में कुछ गुण होते हैं किंतु उनका स्वभाव अच्छा नही होता है यथा-जब तक आदमी सामने रहता है तो मुंह देखी बड़ाई करते हैं और उसके जाते ही पीठ पीछे उसी की चुगली-निंदा करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो दान पुण्य भी कर देते हैं किंतु दम्भ और अहंकार में जीते हैं। कुछ ऐसे होते हैं कि सत्य तो कहते हैं किंतु उनका सत्य बाण की तरह हृदय को बींध देता है। कुछ ऐसे होते हैं जो अपने फन के अथवा विषय के बड़े पारंगत होते हैं किंतु छिद्रान्वेषी होते हैं, चिड़चिड़े, निकृष्ट और तीखे स्वभाव के होते हैं। ऐसे लोग उच्च शिक्षा प्राप्त बड़े बड़े प्रोफेसर, इंजीनियर, डाक्टर और वकील भी हो सकते हैं, उच्च पदस्थ अधिकारी, नेता अभिनेता भी हो सकते हैं।

मान लीजिये, किसी व्यक्ति में दूसरों के काम आने अथवा परोपकार करने का गुण है किंतु स्वभाव इतना गंदा है कि किये गये उपकार को बात बात पर जताता है अथवा मित्र रिश्तेदारों के सामने ताना देकर नीचा दिखाता है तो ऐसे गुण का क्या फायदा? ऐसे व्यक्ति का न तो कोई दिल से आदर करता है और न ही कोई उसका अहसान लेता है। सभी उससे बचकर निकलते हैं और दूसरे को भी कह देते हैं कि अमुक व्यक्ति से जीवन में किसी प्रकार की मदद मत लेना वह बहुत गंदे स्वभाव का निकृष्ट (खोचरा) व्यक्ति है, उसके अंदर विनयशीलता गंभीरता, उदारता और इंसानियत नामोनिशान को भी नही हैं। इसलिए उससे बचकर रहना। जबकि सौम्य स्वभाव वाला व्यक्ति यदि किसी के काम आता है तो मन ही मन परम पिता परमात्मा का शुक्रिया अदा करता है और विनम्र भाव से कहता है-हे प्रभु तेरी बड़ी कृपा है जो यह पुण्य का कार्य आपने मेरे हाथों कराया, मुझे माध्यम बनाया। मैं करने वाला कौन होता हूं? ये तो सब सामथ्र्य और प्रेरणा प्रभु आपकी ही थी। वह किये गये उपकार को ऐसे भूल जाता है जैसे यज्ञ में आहुति देने के बाद उसे यजमान भूल जाता है। इसलिए गुणों से श्रेष्ठ सौम्य स्वभाव होता है। इस संदर्भ में कवि कितना सुंदर कहता है:-
रात कितनी खूबसूरत है? इसकी पहचान, तारों से नही, चमकते चांद से होती है।
कौन कितनी बुलंदी पर है? इसकी पहचान, इंसान के सौम्य स्वभाव से होती है।।
उदाहरण के लिए लंका के राजा रावण को चार वेद, छह शास्त्र कण्ठस्थ थे। वह संस्कृत का प्रकाण्ड पंडित था, उच्च कोटि का विद्वान और कवि भी था किंतु भगवान राम के सामने उसका आचरण और स्वभाव नगण्य था जबकि भगवान राम का आचरण अनुकरणीय तथा मर्यादा से परिपूर्ण और स्वभाव सौम्यता से ओत-प्रोत था। जो अनुकरणीय ही नही अपितु आज भी मानव मात्र के लिए वंदनीय है, प्रशंसनीय है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने व्यक्तित्व में गुणों का अर्जन करे, न्यूनताओं अथवा त्रुटियों का प्रक्षालन करे और सौम्य स्वभाव का संवर्धन करे। शील स्वभाव एक बहुत बड़ी पूंजी है। इसके धनी तो संसार में बिरले लोग ही होते हैं। इस संदर्भ में कवि बड़े मार्मिक शब्दों में कहता है:-
ज्ञानी, ध्यानी, संयमी, दाता, शूर अनेक।
जपिया तपिया बहुत हैं, शील वंत कोई एक।।
भगवान राम के सौम्य स्वभाव का उद्घरण रामचरित मानस के लंका काण्ड के पृष्ठ 711 पर देखिये-यह उस समय का प्रसंग है जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना अपने पति का शव प्राप्त करने के लिए आती है, तो विभीषण उसके पहुंचने से पहले ही परिचय देते हुए भगवान राम से उसके शील स्वभाव और पतिव्रता होने का मान कराते हुए कहते हैं :-
पुत्र वधू दस कंधर केरी।
बड़ी पतिव्रता जनि प्रभु हेरी।।
अर्थात हे प्रभु! यह जो महिला आ रही है यह रावण की पुत्रवधू है जो बड़ी ही पतिव्रता और शील स्वभाव की महिला है। यदि यह आपसे कोई विनती करती है तो इसे निराश मत करना।
कुछ ही क्षणों के बाद सुलोचना भगवान राम के पास पहुंची और अपने शील स्वभाव के अनुसार बड़े ही विनम्र शब्दों में कहती है-हे दया के समुद्र भक्तों को आनंद देने वाले श्रीराम। मैं आपकी शरण में आयी हूं। हे शोभा के धाम जो पति का मस्तक मुझे मिल जाए तो मैं उसके साथ ही जल जाऊं। इसलिए मुझे मेरे पति का शीश दिया जाए। मेरे पति ने शरीर त्याग दिया, वे बड़े भाग्यशाली और प्रेमी थे जिन्होंने आपके कर कमलों से मुक्ति पाई है। उनके प्रेम को कैसे वर्णन करूं जिनकी अचल कीर्ति संसार में व्याप्त है। इस मार्मिक दृश्य को प्रस्तुत करते हुए महात्मा तुलसीदास जी कहते हैं:-
यह बिधि पद पंकज सेव्य रमा,
अज शिरनभि दोउ कर जोरि रहीं।
सुन पंकज लोचन बचन सुलोचनि,
लोचन ते जलधार बही।
अर्थात इस प्रकार लक्ष्मी व ब्रहमा द्वारा सेवित श्रीराम के चरण कमलों में सिर नवाकर और हाथ जोड़कर सुलोचना खड़ी रह गयी। तब उनके वचन सुनकर कमल नयन भगवान राम के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। कहने का भाव यह है कि सुलोचना के सौम्य स्वभाव ने भगवान राम को भी रूला दिया। इसलिए संसार में गुणों से भी श्रेष्ठ सौम्य स्वभाव है। इसके अतिरिक्त भगवान राम के मानस में माधुर्य, कोमलता, उदारता का एक और अनुपम दृष्टांत देखिये जब रावण का भाई विभीषण, भगवान राम की शरण में आ गया तो सुग्रीव ने उन्हें सचेत करते हुए कहा भगवन! वह शत्रु पक्ष का व्यक्ति है। इस पर इतनी जल्दी विश्वास करना उचित नही। कहीं ऐसा तो नही कि रावण का यह कोई षडयंत्र हो? सुग्रीव की शंका को दूर करते हुए भगवान राम ने अपनी वाणी को माधुर्य से स्निग्ध करते हुए सुंदरकांड (पृ. 622) कहा:
जो सभीत आवा सरनाई।
रखिहऊं ताहि प्रान की नाई।
उपरोक्त दोनों दृष्टातों से स्पष्ट होता है कि भगवान राम के व्यक्तित्व में शक्ति और शील का अद्भुत मिलन है। इसलिए वे सौंदर्य की प्रतिमूर्ति हैं। इतना ही नही उनके व्यक्तित्व में सौंदर्य और ऐश्वर्य का भी अनुपम संगम है। इसीलिए वे माधुर्य के मानसरोवर हैं। भारतीय संस्कृति के सशक्त स्तंभ और प्रेरणापुंज हैं। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में मर्यादा का पालन किया है। कहीं भी शीलभंग नही होने दिया। इसीलिए वे मर्यादा पुरूषोत्तम राम कहलाते हैं। उनके शील स्वभाव पर कवि की निम्न पंक्तियां अक्षरश: चरितार्थ होती हैं:-
जहां शक्ति और शील मिलते हैं,
वहीं सौंदर्य होता है।
जहां सौदर्य और ऐश्वर्य मिलते हैं,
वही माधुर्य होता है।
भाव यह है कि शील स्वभाव परमात्मा की एक अनुपम देन है। इसे संवारते रहिए और आगे बढ़ते रहिए। स्वभाव विवेक से सुधरता है। विवेक सत्संग से मिलता है। सत्संग का अर्थ है-सत्य का संग जीवन की सच्चाई का दर्शन। इसके लिए आवश्यक नही कि आप वन में जायें अथवा कीर्तन करें, नाचें गायें, ताली बजायें। सत्संग तो आपको चलते चलते अथवा शांत चित्त से चिंतन करते करते भी हो सकता है। सत्पुरूषों के साथ रहने अथवा सद्ग्रंथों का अध्ययन करने, सद्चर्चा सद्चिंतन और सत्कर्म करते करते हो सकता है। इसलिए सत्पुरूषों का संग कीजिये। सद्ग्रंथों का अध्ययन कीजिए। अपना चिंतन पवित्र कीजिये अपनी दुष्प्रवृत्तियों का दमन कीजिये और सद्प्रवृत्तियों को जाग्रत कीजिये। यदि ऐसा कुछ आपके जीवन में घटने लगे तो समझिये कि कोई पूर्व जन्म का सुसंस्कार अथवा पुण्य उदय हो गया है। इस संदर्भ में जगदगुरू शंकराचार्य कितना सुंदर कहते हैं-
कोटि जनम के पुण्य जब, उदित होय एक संग।
मिटती मन की मलिनता, तब भावै सत्संग।
सत्संग में यदि आपका मन लगने लगा तो समझिये कि आप पर प्रभु कृपा होने लगी है। उसने आपको अपनी कृपा का पात्र बना लिया है। इस संदर्भ में रामचरित मानस में तुलसी के यह शब्द कितने प्रेरणादायी हैं:-
बिन सत्संग विवेक न होई।
राम-कृपा बिन सुलभ न सोई।
अपने स्वभाव को सुधारने के लिए शहद की मक्खी का अनुसरण करें और मन ही मन दृढ़ संकल्प करें कि जैसे शहद की मक्खी जिस जिस फूल पर भी जाती है उसकी मिठास ले लेती है बाकी कबाड़ को छोड़ देती है। ठीक इसी प्रकार अपना स्वभाव गुणग्राही बनायें, दोष दृष्ट नही। अपना आत्मावलोकन करते रहें। अपने परीक्षक स्वयं बनें, अपने व्यवहार की भूलों को सुधारते रहें। हीनता का भाव कभी चित्त में न आने दें। सर्वदा प्रसन्न चित्त और आनंदित रहें। अपना मनोबल हमेशा ऊंचा रखें। अपने आदर्श और आराध्य से सदैव जुड़े रहे तो एक दिन आपका स्वभाव सोना बन जाएगा। दूसरों के लिए अनुकरणीय और आदर्श बन जाएगा। महर्षि बाल्मीकि की तरह आपकी जीवन बदल जाएगा। एक बार आप प्रयास तो करें। अध्यवसाय में बहुत बड़ी शक्ति होती है। इसलिए कवि कहता है:-
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रस्सी आवत जात से, सिल पर परत निशान।
यदि हमारा स्वभाव शीलवान हो तो हमारा सामाजिक और पारिवारिक जीवन सुख शांति से परिपूर्ण हो सकता है बशर्ते कि इतना ध्यान रहे:-
धर्म बिहारी पुरूष हों, धर्मचारिणी नार।
शीलवंत संतान हों, सुखी रहे परिवार।।

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