मणिपुर समस्या के कुछ और भी पहलू हैं : मणिपुर के मतई लोगों की भारत भक्ति और सेकुलर राजनीति

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नवंबर 1984 में दंगे हुए। जिनमें सिखों का नरसंहार किया गया। निश्चित रूप से वह घटना बहुत ही निंदनीय थी। पर उससे पहले जिन अनेक हिंदुओं का पंजाब में कत्ल किया गया था उनकी चर्चा नवंबर 1984 के दंगों की चर्चा में दबकर रह गई। आज तक कभी आपने यह नहीं सुना होगा कि 1984 के दंगों के साथ-साथ उससे पहले खालिस्तानियों के द्वारा मारे गए हिंदुओं के परिवारों के जख्मों पर भी मरहम लगाया जाएगा?
इसी प्रकार गोधरा कांड की चर्चा तो की जाती है पर उससे पहले राम सेवकों के साथ जो कुछ हुआ था उसे भुलाने का प्रयास किया जाता है। वास्तव में भारत की सेकुलर राजनीति का विकृत स्वरूप ही यह है कि जिसमें वोटों का अधिक से अधिक लाभ हो सकता हो, उस मुद्दे को हाथ में लिया जाए। इसके लिए चाहे सच्चाई को फांसी दी जाए, चाहे न्याय का कत्ल किया जाए, इस राजनीति को सब कुछ स्वीकार है।

आज मणिपुर जल रहा है। सचमुच यह चिंता का विषय है। इसकी वर्तमान स्थिति पर विचार करने से पहले इसके इतिहास पर थोड़ा विचार किया जाए। मणिपुर आर्यावर्त कालीन भारत का एक अभिन्न अंग रहा है। कभी पूरे असम प्रांत को (जिसमें मणिपुर भी सम्मिलित था) प्रागज्योतिषपुर कहा जाता था। यहां के राजा बाण की पुत्री उषा कृष्ण जी के बेटे अनिरुद्ध के लिए ब्याही गई थी। राजा बाण के साथ जहां पर कृष्ण की लड़ाई हुई थी अर्थात जहां पर युद्ध में रक्त बहाया गया था, वहीं पर शोणितपुर नगर बसाया गया शोणित का अर्थ रक्त ही होता है। इसी स्थान पर तेजपुर बसाया गया जो आज भी मिलता है। तेज का अभिप्राय भी स्थानीय भाषा में रक्त ही है। यहां पर महाभारत कालीन अवशेष आज भी हैं ।अनिरुद्ध की पत्नी उषा के नाम पर ही द्वारिका के पास उषा मंडल बसाया गया था। जिसे आजकल ओखामंडल कहते हैं। यह सारा क्षेत्र अब समुद्र मय हो गया है।
नीलांचल पर कामाख्या का मंदिर है। यहां पर नरकासुर नाम के राक्षस का श्री कृष्ण जी ने अंत किया था। 16000 कन्याओं को इस राक्षस ने हरण करके अपने यहां रखा हुआ था। उन सब की मुक्ति श्री कृष्ण जी ने कराई थी।
उसी समय अर्जुन ने पाशुपतास्त्र पाने की तपस्या भी आज के मणिपुर में ही की थी। उन्होंने इस अस्त्र को शिवजी से प्राप्त किया था और यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था। जिससे अर्जुन को एक पुत्र भी प्राप्त हुआ था । उसे मणिपुर में ही छोड़ दिया गया था और जन्मेजय के काल में संपूर्ण पूर्वोत्तर का ही नहीं बल्कि आज के बर्मा और चीन तक का क्षेत्र इसके अधीन छोड़ दिया गया था। मणिपुरी नृत्य यदि आपने देखा हो तो उसे हमारी बेटियां आज भी कृष्ण जी की गोपिकाओं वाली नृत्य शैली में ही प्रस्तुत करती हैं। इन सब बातों से पता चलता है कि मणिपुर के लोगों ने अपनी प्राचीन ऐतिहासिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है। भारत और भारतीयता के प्रति अपनी आत्मीयता को प्रकट करते हुए पहले मुसलमानों से और फिर अंग्रेजों से यहां के लोगों ने डटकर मुकाबला किया था।
आज यहां पर मतई वर्ग को हिंसा का जिम्मेदार माना जा रहा है। ये वही लोग हैं जो इस देश की मूल संस्कृति से जुड़े रहे हैं और अपने आपको भारतीय कहने पर गर्व की अनुभूति करते हैं। इनके सामने यहां पर कूकी लोगों को म्यांमार से एक षड्यंत्र के अंतर्गत लाकर बसाया गया। यह बात विचारणीय है कि जो कुछ कूकी वर्ग की महिलाओं के साथ हुआ है, क्या वैसा कभी पहले मतई वर्ग की महिलाओं के साथ नहीं हुआ ? जब ये घटनाएं अबसे पूर्व में हो रही थीं तब यह सेकुलरिज्म की नपुंसक राजनीति क्या कर रही थी? आज वोटों की राजनीति करने निकला सेकुलर राजनीतिक दलों का टोल क्या इस बात का कोई सटीक उत्तर दे सकता है?
अबसे पहले ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जब कूकी संप्रदाय ने मतई लोगों के साथ ज्यादती करते हुए उनके धर्म स्थलों को क्षतिग्रस्त किया है , उनकी महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया है, उनकी संपत्तियों को छीना है और उन पर अनेक प्रकार के अमानवीय अत्याचार किए हैं।
याद रखें यदि यह सेकुलर हिजड़ो का टोल कभी फूलन देवी को सही समय पर न्याय दे देता तो वह हथियार लेकर उठ खड़ी नहीं होती। जब उसने अन्याय का प्रतिशोध करने के लिए अपने आप हथियार उठा लिए तो वह “बदमाश” हो गई और जब उसे बदमाश बदमाशी करने के लिए प्रेरित या उत्तेजित कर रहे थे, तब किसी ने नहीं देखा कि बदमाशी कहां हो रही है? हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही यह है कि यहां सही समय पर सही व्यक्ति के साथ कोई खड़ा नहीं होता और जब सही व्यक्ति गलत रास्ते पर आ जाता है तो फिर सबकी नैतिकता जाग जाती है।
आज कोई यह नहीं देख रहा कि जो घटना मई में घटित हो गई थी उसकी वीडियो बनाकर इतने दिन पश्चात उसे किन लोगों ने घुमाया ? और उस वीडियो को इस प्रकार घुमाने का उद्देश्य क्या था? उसके पीछे किसका मस्तिष्क काम कर रहा था ! आज हमारा परंपरागत शत्रु चीन, इसके साथ ही साथ भारत की सामाजिक सद्भाव की परंपरागत नीति का शत्रु चर्च और दीर्घकाल तक भारत पर शत्रु भाव से शासन करने वाला ब्रिटेन जिस प्रकार पूर्वोत्तर में पीछे से काम कर रहे हैं उन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सेकुलर राजनीति करने वाले ड्रामेबाज राजनीतिज्ञों के पास तो इस बात के लिए समय नहीं है पर केंद्र की मोदी सरकार इस ओर अवश्य ध्यान दे सकती है।
न्याय होना चाहिए पर न्याय करते समय उन लोगों को भी दंडित किया जाना चाहिए जिन्होंने अबसे पूर्व में मतई लोगों के साथ अत्याचार किए हैं। दंड उन लोगों को भी मिलना चाहिए जो वहां से भारत और भारतीयता से प्रेम करने वाले लोगों को खदेड़ने की योजना बनाते हैं। इससे भी आगे हम यह कहना चाहेंगे कि उन लोगों को ही यहां से खदेड़ा जाए जो भारतीयता से प्रेम करने वाले लोगों को खदेड़ने के मंसूबे बनाते हैं।
पंथनिरपेक्ष राजनीति यदि वास्तव में अत्याचारी को दंड देने की इच्छुक है और भारत के सेकुलर राजनीतिज्ञ नहीं चाहते कि देश में वोटों की राजनीति हो तो न्याय को न्याय के दृष्टिकोण से ही आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए। कानून को अपना काम करने देना चाहिए और किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप न्यायिक प्रक्रिया में नहीं होना चाहिए। जब राष्ट्रीय एकता और अखंडता की बात हो तो पापी लोगों के साथ कड़ाई से पेश आना समय की आवश्यकता होती है। जो देश को तोड़ने की गतिविधियों में लगे हों, या जनसांख्यिकीय आंकड़ों को गड़बड़ा कर अपने अपने संप्रदाय के लोगों की संख्या बढ़ाकर देश की मुख्यधारा में विश्वास रखने वाले लोगों का उत्पीड़न करते हों, न्याय करते समय दंड उनको भी मिलना चाहिए।
आज सारे देश की नजरें प्रधानमंत्री मोदी की ओर लगी है। सारे पूर्वोत्तर का ईसाईकरण करने वाली मदर टेरेसा को भारत रत्न दिलाने वाली सोनिया गांधी आज उस आप पार्टी के साथ जा खड़ी हुई हैं जिससे उनका ३६ का आंकड़ा था। इसके पीछे राजनीति केवल एक है कि कूकी लोगों को फिर प्रोत्साहित किया जाए और वहां के मतई लोगों को न्याय नहीं मिलना चाहिए। देखना यह है कि प्रधानमंत्री मोदी अब मतई लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं ? प्रधानमंत्री के बोलने को लेकर देश की संसद ही नहीं पूरा देश उनकी ओर देख रहा है।
देश के जागरूक और देशभक्त लोगों को इस समय धैर्य से काम लेने की आवश्यकता है। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि धर्मांतरण से मर्मांतरण और मर्मांतरण से राष्ट्रांतरण होता है। जिन लोगों के धर्म बदल गए, उनके मर्म बदल गए और वही देश में आग लगाने की बात करते हैं। इस सच को राजनीति न्याय करते समय यदि स्वीकार नहीं करेगी तो फिर अन्याय होगा। जिधर क्षेत्र खाली पड़ा होता है उधर हवा अपने आप भागती है। यह प्रकृति का नियम है। पर जब उस खाली क्षेत्र की ओर भागती है तो अपने साथ कुछ वायरस भी लेकर आती है। मणिपुर में जिन लोगों को बाहर से लाकर बसाया गया था उन्हें इसी दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
रोहिंग्या मुसलमान भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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