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गाय ही क्यों?’ पुस्तक समीक्षा

‘भारत में गोवंश के संरक्षकों में तथा उद्घारकों में लाला हरदेवसहाय जी का नाम अग्रगण्य है। उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘गाय ही क्यों’? बहुत ही तथ्यात्मक तथा विश्लेष्णात्मक शैली में लिखी गयी है। स्वतंत्रता पूर्व लालाजी ने गोवंश रक्षा के लिए जो महत्वपूर्ण योगदान दिया वह अपने आप में अप्रतिम था। इस पुस्तक में उनके संघर्ष की झलक तो दीखती ही है साथ ही गौसेवा के प्रति उनका संकल्प और गोवंश के बारे में उनके वृहद ज्ञान का भी पता चलता है। पुस्तक की भूमिका देश के पहले राष्ट्रपति रहे डा. राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा लिखी गयी थी। वास्तव में उन्होंने भूमिका को अत्यंत संक्षिप्त कर उसे पुस्तक की कुंजी बना दिया था। राष्ट्रपति ने लिखा था कि श्री हरदेवसहाय ने गाय का बहुत विस्तृत और गहरा अध्ययन किया है। इतना ही नही उन्होंने जो अध्ययन में पाया है उसका साक्षात अनुभव भी बहुत अंशों में किया है। इसलिए वह जो कुछ इस संबंध में कहें वह आदरपूर्वक सुनने योग्य है। इस छोटी पुस्तिका में उन्होंने गाय ही क्यों और भैंस क्यों नही? जैसे प्रश्न पर बहुत जानकारी के साथ विवेचना की है। मैं समझता हूं कि गो सेवकों के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी सिद्घ होगी।

वास्तव में ही पुस्तक में पिछली शदी के प्रारंभ में गायों की संख्या तथा शक्तियों में कमी की तथ्यात्मक विवेचना संसार के अन्य देशों में गोवंश की स्थिति का तथ्यपरक विश्लेषण भारतवर्ष के मुकाबले में अन्य देशों में गोवंश तथा दुग्ध का उत्पादन, गोवंश के ह्रास से हमारी हानि, गोवंश को नुकसान क्यों पहुंचा? गोवंश कैसे बचे और कैसे उन्नत हो? आदि बिंदुओं पर लेखक का विश्लेषण बहुत ही उत्प्रेरक और ज्ञानवर्धक है। पुस्तक को आद्योपांत पढऩे से गोवंश प्रेमियों को तो प्रेरणा मिलेगी ही साथ ही ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन और प्रचार प्रसार से गोवंश नाशकों को भी प्रेरणा मिलेगी कि इस वंश की रक्षा क्यों आवश्यक है? तथ्यात्मक शैली में लिखी गयी पुस्तक संग्रहणीय, चिंतनीय और मननीय बन गयी है।
पुस्तक का प्रथम संस्करण 1946 में हुआ था। अब 2012 में तीसरा संस्करण आया है। तीसरे संस्करण को भारत गोसेवक समाज-3 सदर थाना रोड दिल्ली 110006 दूरभाष 011-23611910 द्वारा प्रकाशित कराया गया है। पुस्तक का मूल्य 100 रूपया रखा गया है। जो कि पुस्तक की उपयोगिता और उपदेयता के दृष्टिगत कम ही है।
मेरे पास प्रस्तुत पुस्तक को समाज के रत्नों में अग्रगण्य आदरणीय शिवकुमार गोयल जी द्वारा भेजा गया है। भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास के प्रति समर्पित ऐसे महानुभावों के पास ही लाला हरदेवसहाय जी की स्मृतियां अक्षुण्य रह सकती हैं। बीते दिनों लाला जी की 50वीं पुण्यतिथि मनायी गयी है। वास्तव में यह पुस्तक स्व. लाला जी के कृत्यों को एक विनम्र श्रद्घांजलि है। पाठक पुस्तक खरीदें और लाभ उठायें।
-संपादक


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