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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू ( डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी )

प्रस्तावना :
नेहरू बोले : मुसलमान तो मैं भी हूं …

हम सभी जानते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वाधीनता के पश्चात देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्हें देश की स्वाधीनता के पश्चात लोगों की प्राण रक्षा की कोई चिंता नहीं थी। उन्हें प्रधानमंत्री पद पाने की चिंता थी। जिसके चलते उस समय लाखों लोगों ने अपने प्राण गंवा दिए। इन्हीं पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने अहमदनगर जेल में रहते हुए 1944 में ‘ हिंदुस्तान की कहानी ‘ या ” डिस्कवरी ऑफ इंडिया ” नामक पुस्तक लिखी । इसे 1946 में प्रकाशित कराया गया। इस पुस्तक को कांग्रेसियों ने इतिहास का सबसे अधिक प्रामाणिक ग्रंथ घोषित किया और उसे नेहरू जी के ‘ ब्रह्मवाक्य ‘ के रूप में स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। कांग्रेस सत्ता में रही तो एक परिवार को रॉयल्टी का विशेष लाभ देने के लिए इस पुस्तक के अनेक संस्करण प्रकाशित किए गए। मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि जब वह भारतीय सेना में सेवारत थे तो वहां पर अनेक बार इस पुस्तक को बड़ी संख्या में ले जाकर सैनिकों में वितरित किया गया था।
बस, इसी घटना ने मुझे ‘ डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ‘ की ‘ डिस्कवरी ‘ लिखने के लिए प्रेरित किया। जिससे यह पुस्तक तैयार हो गई। नेहरू जी की ‘ भारत की खोज ‘ को पढ़ा तो उनकी सोच का बोध हुआ। जिसे देखकर मन बहुत दुखी हुआ।
उसी के चलते समीक्षात्मक टिप्पणियां लिखनी आरंभ कीं। यह टिप्पणियां ही पुस्तक का रूप ले गईं।
श्री कृष्णानंद सागर जी के शोध ग्रंथ “ विभाजनकालीन भारत के साक्षी ”(पृष्ठ 5,खण्ड 2) की प्रस्तावना में नेहरू जी से संबंधित एक महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। इस शोध ग्रंथ के अनुसार नेहरू ने अँग्रेजों से गुप्त संधि की थी। जिसे आज तक देश के सामने उजागर नहीं किया गया। जब उनसे तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि जब अंग्रेज भारत में आए थे तो उन्होंने हुकूमत मुसलमानों से प्राप्त की थी। इसलिए मैं चाहूंगा कि देश की बागडोर किसी मुस्लिम को दी जाए। तब नेहरू जी ने वायसराय से कहा था कि “ मैं भी मुसलमान हूं। ” नेहरू वंश के बारे में कई विद्वानों के द्वारा बहुत कुछ लिखा गया है। कइयों ने इस प्रकार के आरोप लगाए हैं कि नेहरू जी खान वंश के हैं। जिससे नेहरू जी और उनके पूर्वज मुगल सिद्ध होते हैं।
विभाजनकालीन भारत के साक्षी (पृष्ठ 5,खण्ड 2) नामक उपरोक्त पुस्तक की प्रस्तावना से यह स्पष्ट होता है कि टीकमगढ़ ( बुंदेलखंड ) के पास स्थित रही सरीला रियासत के प्रिंस नरेन्द्र सिंह जी के माध्यम से लेखक को विशेष जानकारी प्राप्त हुई। प्रिंस नरेंद्र सिंह बाद में गवर्नर जनरल लार्ड वेवल व लार्ड माउण्टबैटन के ए.डी.सी. रहे थे। इस कारण 1942 से 1948 तक वाइसराय भवन में घटित घटनाओं के वे स्वयं साक्षी थे। उनसे इस लेख के लेखक (प्रो0 सुरेश्वर शर्मा ) की प्रथम भेंट दिसम्बर 1966 में इण्डिया इण्टरनेशनल सेंटर दिल्ली में हुई थी l लेखक के अनुसार प्रिंस आफ़ सरीला श्री नरेंद्र सिंह उस समय काफी वृद्ध थे और इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में ही रहते थे।
श्री नरेंद्र सिंह जी ने इस भेंट वार्ता में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु लेखक को बताये। जिन्हें पढ़ कर आप भी दांतों तले उंगली दबा लेंगे। प्रो0 सुरेश्वर शर्मा जी के लेख के इन अंशों को आप भी ध्यान से पढ़िए :-
“ दूसरे विश्वयुद्ध के रणनीतिकार भले ही विंस्टन चर्चिल थे, लेकिन युद्ध के हीरो बने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने जापान पर एटम बम गिरा कर एक ओर तो जापान के घुटने टिकवा दिए दूसरी ओर जापानी साधनों से ब्रह्मदेश में अंग्रेजी सेना को खदेड़ रही आजाद हिन्द फौज की गति को अवरुद्ध कर दिया। इस प्रकार अमरीका के कारण इंग्लैंड युद्ध जीत सका। “
“ इंगलैंड युद्ध भले ही जीत गया था, लेकिन उसकी शक्ति बहुत क्षीण हो चुकी थी। सुभाषचन्द्र बोस के अद्भुत कारनामों के कारण भारत के लोगों के मनों से अंग्रेजों का डर बिल्कुल समाप्त हो गया था। उल्टे,अंग्रेजों को ही यह डर सताने लगा था कि भारत के लोग कहीं चुन-चुन कर अंग्रेजों को ही समाप्त करना न शुरु कर दें। अतः ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली ने फरवरी 1946 में ही ब्रिटिश संसद में यह घोषणा कर दी थी कि हम भारत की सत्ता भारत के ही लोगों को सौंप कर वहाँ से निकल जाएँगे। ”
माउण्टबेटन यह जानता था कि जवाहरलाल सत्ता का भूखा है। वह किसी भी कीमत पर सत्ता प्राप्त करना चाहता है। अतः उसे सत्ता सौंपने से पहले उसने भारत का विभाजन स्वीकार करा लिया। साथ ही अन्य भी वे सारी शर्तें मनवा लीं, जो ब्रिटिश-अमरीकी हितों के लिए आवश्यक थीं। जवाहर सत्ता के लिए इतना अंधा हो गया था कि उसने इन शर्तों की भनक सरदार पटेल व गान्धी को भी नहीं लगने दी।”
प्रिंस आफ सरीला ने मुझे एक टाइप किए हुए पत्र की प्रति पढ़ने के लिए दी,जो कि माऊण्टबेटन द्वारा प्रधानमंत्री एटली को लिखी गई थी। उसमें माऊण्टबेटन ने एटली को सूचित किया था कि जवाहरलाल से निम्नलिखित विषयों पर सन्धि (treaty) हो गई है और यह सन्धि 50 साल के लिए है :-

1.भारत पाकिस्तान पर आक्रमण कर कभी उसे जीतने की कोशिश नहीं करेगा।

  1. पाकिस्तान चाहे तो आक्रमण करके भारत की भूमि जीत सकता है।
  2. यदि भारत की सेना रक्षात्मक युद्ध में पाकिस्तान को पीछे खदेड़ कर पाकिस्तान की भूमि पर कब्जा कर लेती है, तो वह भूमि भारत पाकिस्तान को वापिस करेगा।

( ध्यान देने की बात है कि 1965 व 1971 के युद्धों में भारत द्वारा जीती हुई भूमि पाकिस्तान को वापिस दी गई।)

  1. भारत के मुसलमानों और ईसाइयों का विशेषाधिकार सुरक्षित रखा जाएगा।
  2. सुभाषचन्द्र बोस को पकड़ कर भारत ब्रिटेन को सौंपेगा।
  3. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ रहेगा।
  4. हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी की वरीयता रहेगी।
  5. संविधान और प्रशासन-तन्त्र में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होगा।
  6. शिक्षा पद्धति नहीं बदली जाएगी।
  7. सैन्य विकास पर पाकिस्तान से अधिक खर्च नहीं किया जाएगा, ताकि पाकिस्तान डरे नहीं।
    इस प्रकार के 40-50 बिन्दु उस पत्र में थे। शेष मुझे याद नहीं।

पत्र के अन्त में लिखा था- “This treaty should be kept secret. It is not to be published, “

पत्र पढ़ने के बाद मैंने सरीला को कहा कि विश्वास नहीं होता कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह सब स्वीकार किया होगा।इस पर सरीला मुस्कराए और फिर गम्भीर हो कर बोले-

“पहले तो जवाहर लाल को ‘पंडित’ कहना बन्द करो, क्योंकि वह मुसलमान था।“

इसकी पुष्टि में उन्होंने एक प्रसंग बताया :-

“जवाहर और माऊण्टबेटन की बातचीत चल रही थी। मैं साथ के ही अपने कक्ष में उनकी वार्ता सुन रहा था। जवाहर जब विभाजन के लिए तैयार नहीं हुआ, तो माऊण्टबेटन ने उसे कहा- ठीक है, हमने (अंग्रेजों ने) यहाँ की सत्ता मुसलमानों से ली थी और अब हम उन्हीं को वापिस देकर चले जाएँगे। हम सत्ता जिन्नाह को सौंप देंगे।’
“ मैंने देखा, यह सुनते ही जवाहर का चेहरा फक्क हो गया था। उसे लगा, उसके हाथ से सत्ता गई। थोड़ी देर में वह संभला और बोला- ‘Originally I am also a muslim (मूलत: तो मैं भी मुसलमान हूँ।) यह मैने अपने कानों से सुना था।“
प्रिंस सरीला नें अपना कथन चालू रखा। “ जहाँ तक इस पत्र – प्रतिलिपि की प्रामाणिकता की बात है, इसकी मूल प्रति भी तुम लंदन की ब्रिटिश लायब्रेरी के ‘ओरियण्टल एण्ड इंडियन कलेक्शन खण्ड’ के अभिलेखागार में देख सकते हो। वहाँ ब्रिटिश प्रधानमन्त्रियों के भारत सम्बन्धी पत्राचारों की फाइलें संचित हैं। भारत सम्बन्धी सूचनाओं को ब्रिटिश प्रधानमंत्री अमरीकी राष्ट्रपति से भी साझा करते थे, वह भी उन फाइलों में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त साउथैम्पटन की हर्टले लायब्रेरी में माउण्टबेटन के पत्राचारों के सभी अभिलेख कियू (Kew) के पब्लिक रिकार्ड आफिस में भी प्रदर्शित हैं।”
बाद में जब वर्ष 2000 में मैं (लेखक)इंग्लैंड गया, तो साउथैम्पटन की हर्टले लायब्रेरी में मुझे माउण्टबेटन के पत्राचारों की फाइलों में वह मूल पत्र मिल गया, जिसकी प्रतिलिपि प्रिंस सरीला ने दिखायी थी। मै लन्दन की ब्रिटिश लायब्रेरी में भी गया। वहाँ मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा अमरीकी राष्ट्र को लिखे पत्रों में वह सब कुछ मिला,जिसका उल्लेख प्रिंस सरीला ने किया अर्थात् ब्रिटिश अमरीकी दुरभिसंधि।इंगलैंड के बाद मैं अमरीका गया तो वहाँ भी वाशिंगटन के अभिलेखागार में वह सारा पत्र व्यवहार विद्यमान था।
उक्त लेख के लेखक प्रो0 सुरेश्वर शर्मा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय,जबलपुर के कुलपति भी रहे।
यदि यह सब कुछ सत्य है तो देश के पहले प्रधानमंत्री का भारत ,भारतीयता, भारत की चेतना और भारत की आत्मा के साथ क्या संबंध रहा होगा ? या इन सबको वह कितना समझ पाए होंगे ? या उनके बारे में उनकी क्या मानसिकता रही होगी ? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उनकी दृष्टि ,उनके दृष्टिकोण, भारत और भारतीयता के साथ उनके बौद्धिक समन्वय को समझने और समझाने के लिए ही मेरे द्वारा यह पुस्तक लिखी गई है।
मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि किसी भी प्रकार की दलगत राजनीति से प्रेरित होकर या किसी व्यक्ति या संगठन के भावों या भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए यह पुस्तक नहीं लिखी गई है। जो कुछ लिखा गया है वह प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर लिखा गया है । इस दृष्टिकोण से लिखा गया है कि देश की आने वाली पीढियों को सत्य को बिना लाग लपेट के सत्य रूप में ही प्रस्तुत किया सके।
पाठकवृंद ! आशा है मेरे इस प्रयास को सार्थक रूप में लिया जाएगा और आप सबका आशीर्वाद मुझे प्राप्त होगा।
विदुषामनुचर:

दिनांक : 9 सितंबर 2024

डॉ राकेश कुमार आर्य

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