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संपादकीय

फ्रांस के दंगों से भारत को कुछ सीखना होगा

हमने इतिहास में पढ़ा है कि मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी नाम का एक विदेशी लुटेरा जो कि मानव की बौद्धिक संपदा का शत्रु था, 1199 में भारत पर हमलावर बनकर आया था। तब उसने नालंदा विश्वविद्यालय जैसे बौद्धिक संपदा के केंद्र को आग के हवाले कर दिया था। कहते हैं कि यह विश्वविद्यालय उस समय 6 महीने तक आग की चपेट में रहा था। इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय इस विश्वविद्यालय में कितनी कीमती पुस्तकें रखी होंगी ? उस मूर्ख और बर्बर विदेशी हमलावर खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को आग के हवाले करने का कारण भी मात्र इतना था कि वह उन दिनों बीमार हो गया था। जिसका कोई उपचार उसके हकीमों के पास नहीं था। तब हमारे एक महान वैद्य आचार्य राहुल को उनके उपचार के लिए नियुक्त किया गया। आचार्य राहुल से खिलजी ने पहले ही शर्त लगा दी थी कि वह किसी भी भारतीय वैद्य के हाथ की कोई औषधि नहीं लेगा। यदि उपचार नहीं कर सके तो तुम्हारी हत्या करा दी जाएगी। तब आचार्य राहुल ने एक विशेष औषधि इतनी बारीक पीसी कि उसे कुरान के कुछ पन्नों पर ऊपर की ओर लगा दिया। इसके बाद उन्होंने खिलजी से कहा कि वह इतनी पृष्ठ संख्या से अमुक पृष्ठ संख्या तक कुरान पढ़ लें तो वह ठीक हो जाएंगे। ऐसा ही हुआ। जब खिलजी को इस बात की जानकारी हुई कि वह भारतीय वैद्य के द्वारा इस प्रकार से ठीक हुआ है तो उसने बजाय भारतीय ज्ञान की प्रशंसा करने के यहां के शिक्षा केंद्रों को ही जलाकर खाक करने की ठान ली।
नालंदा विश्वविद्यालय को जलाए जाने की उस घटना को अब 800 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। कहने के लिए तो वह खिलजी मर गया पर अपने मानस पुत्रों के रूप में वह आज भी जीवित है। यही कारण है कि यूरोप के एक महान देश फ्रांस में खिलजी के द्वारा जलाए गए शिक्षा केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय की तर्ज पर दंगाइयों ने मार्सेल में सबसे बड़ी लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया। ‘शांतिदूतों’ के द्वारा इस प्रकार की घटना यूरोप में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। जिन लोगों ने कभी मुसलमानों को ‘बेचारा’ समझकर अपने यहां आश्रय दिया था वहीं अब ‘बेचारों’ के भाईचारे से परेशान हैं।
फ्रांस की कुल आबादी में से 9% अर्थात 55 लाख मुसलमानों की आबादी है। वहां के अधिकांश मुसलमान मूल रूप में अल्जीरियाई मूल के अरब मुसलमान माने जाते हैं। अब वहां पर अल्जीरियाई मूल के नाहेल फ्रेंच नामक व्यक्ति की मृत्यु एक पुलिसकर्मी के हाथों हो जाने की घटना को मुस्लिम नस्ल भेदी समस्या के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और देश की कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। 27 जून को घटी इस घटना के पश्चात फ्रांस दंगों की आग में जल रहा है। इन दंगों की भयानकता की जानकारी इस बात से हो जाती है कि फ्रांस सरकार को इन दंगों को नियंत्रित करने के लिए लगभग 50 हजार पुलिस बल तैनात करना पड़ा है।
इस समय संपूर्ण संसार इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में है। इस्लाम को मानने वाले लोग जहां-जहां पर भी होते हैं वहां वाहन ये स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष करते देखे जाते हैं। इसका कारण केवल एक है कि इस्लाम को मानने वाले लोग किसी भी देश के मूल समाज में अपनी घुसपैठ बनाने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं। अपना संख्याबल बढ़ाने की योजना के अंतर्गत न केवल अधिक संतान पैदा कर जनसंख्या वृद्धि करते हैं बल्कि स्थानीय लोगों के जनसांख्यिकीय आंकड़े को गड़बड़ाने के दृष्टिकोण से धर्मांतरण की प्रक्रिया को भी अपनाते हैं। इस समय संपूर्ण यूरोप इस्लाम के इसी प्रकार के कुछ आंकड़ों का सामना कर रहा है। अपने वास्तविक एजेंडा से लोगों का ध्यान हटाने के लिए फ्रांस में घटी इस घटना को मुसलमान लोगों ने नस्लभेद का रंग देकर फ्रांस को बदनाम करने का प्रयास किया है।
अल्जीरिया के अतिरिक्त ट्यूनीशिया और मोरक्को से इस्लाम को मानने वाले लोग फ्रांस में पहुंचे। उस समय फ्रांस ने इन्हें मानवता के आधार पर शरण दी थी और आज परिणाम दूसरे आ रहे हैं। हमें यह जानकारी होनी चाहिए कि फ्रांस में कानून व्यवस्था में किसी भी प्रकार का व्यवधान करने वाले व्यक्ति पर पुलिस को कोई चलाने का अधिकार है। फ्रांस के दंगों के बारे में यह भी एक तथ्य है कि 2021 से ही वहां की सेना देश की सरकार को इस बात के लिए आगाह कर रही थी कि इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण देश में गृह युद्ध की स्थिति आ सकती है। सेना का सरकार से यह भी आग्रह रहा कि समय रहते कठोर कदम उठाए जाएं, पर सरकार ने सेना की इस प्रकार की चिन्ता पर विशेष ध्यान नहीं दिया। इस समय भी फ्रांस का पुलिस बल यह मान रहा है कि देश में इस समय सांप्रदायिक दंगे नहीं बल्कि गृह युद्ध आरंभ हो चुका है।
पुलिस बल इस बात को लेकर चिंतित है कि फ्रांस की सरकार समय रहते उचित कदम नहीं उठा रही है। पुलिस बल और देश की सरकार के बीच के इस प्रकार के अविश्वास के से वातावरण का लाभ दंगाई उठा रहे हैं।
फ्रांस में इस समय जो कुछ भी चल रहा है उसके बीच सोशल मीडिया पर इस्लामी मौलाना मोहम्मद तौहिदी का एक पुराना बयान वायरल हो रहा है। अपने इस वीडियो में मौलाना मोहम्मद तौहीदी चेतावनी दे रहे हैं कि कैसे किसी देश में इस्लामी प्रवासियों को जगह देना खतरनाक होता है? इंटरव्यू 9 सितंबर 2022 का है। अपने इस बयान में मौलाना ने इस्लाम के वास्तविक चरित्र का चित्रण किया है और स्पष्ट किया है कि इस्लामिक आतंकवादियों को वह देश भी शरण देना उचित नहीं मानते जो स्वयं को इस्लामिक देश के रूप में मानते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे कट्टरपंथियों का पश्चिमी देश स्वागत करते हैं और बाद में उन्हें अंजाम भुगतना पड़ता है।
इसका अर्थ है कि मौलाना साहब इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट हैं कि इस्लामिक कट्टरपंथियों को किसी भी देश की सरकार को मानवीय आधार पर अपने यहां शरण नहीं देनी चाहिए। निश्चित रूप से भारत के नेताओं और तथाकथित सेकुलर राजनीतिक दलों को मौलाना की इस वीडियो को अवश्य सुनना चाहिए और अपने देश में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को एक संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए। यदि समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो जिस प्रकार आज फ्रांस सहित संपूर्ण यूरोप इस्लामिक आतंकवाद से जूझ रहा है उससे भी बुरी स्थिति भारत की हो सकती है। क्योंकि इस्लाम में भारत में इस्लाम को मानने वालों की संख्या यूरोप की अपेक्षा बहुत बड़ी है। इस्लाम के नाम पर गुप्त रूप से जिस प्रकार सेना तैयार की जा रही हैं और उनके संकेत या खबरें समाचारपत्रों में स्थान पा रहे हैं उनको बहुत अधिक गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
देश के राजनीतिक लोगों को इस समय प्रत्येक प्रकार के पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर देश की सुरक्षा के प्रति संयुक्त रणनीति बनाने की आवश्यकता है। देश में जिस प्रकार रोहिंग्या, पाकिस्तानी और बांग्लादेश घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है वह आने वाले समय की भयावहता को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है। मौलाना अपनी उपरोक्त वीडियो में स्पष्ट पूछ रहे हैं कि आखिर इन कट्टरपंथियों के बारे में किसी को भी कैसे पता नहीं चला कि इनकी विचारधारा रक्तपात करना और लोगों को काटना है ?
(फोटो नवभारत टाइम्स से साभार)

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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