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विश्वगुरू के रूप में भारत

भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 39 गायत्री मंत्र दृष्टा महर्षि विश्वामित्र

महर्षि विश्वामित्र प्राचीन काल में शस्त्र विद्या के ज्ञाता के रूप में जाने जाते थे। उनके बारे में अनेक प्रकार की किंवदंतियां प्रचलित हैं। हम उन किंवदंतियों के आधार पर बनी कहानियों का उल्लेख यहां पर नहीं करेंगे।
इतिहास की साक्षी है कि प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि हुए। विश्वामित्र जी गाधि के पुत्र थे। इन्होंने अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के आधार पर अपने काल में विशिष्ट कार्य संपादित किए और इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। विश्वामित्र के पिता ने वयोवृद्ध होने के उपरांत वानप्रस्थ में जाने का निर्णय लिया। फलस्वरूप उन्होंने अपना राज्य सिंहासन अपने पुत्र विश्वामित्र को सौंप दिया। विश्वामित्र बहुत ही सुयोग्य युवक थे । उन्होंने अपने पिता के वन चले जाने के उपरांत बहुत ही कुशलतापूर्वक और प्रजाहितचिंतन करते हुए राज्य कार्य संभाला। कहते हैं कि एक बार वह अपनी पत्नी के साथ पासा अर्थात गोटी खेल रहे थे।
जिसमें उनकी पत्नी की विजय होने के उपरांत पत्नी को उन पर हंसी आ गई। क्रोधी स्वभाव के विश्वामित्र पत्नी को इस प्रकार अपने ऊपर हंसते देखकर अपने आप को अपमानित अनुभव करते हुए गोटी को क्रोध में फेंककर राज दरबार में पहुंच गए। वहां पर उपस्थित उनके राजदरबारी उनके इस प्रकार आगमन के उपरांत उनकी जय-जयकार करने लगे । इस पर उन्होंने कहा कि मैंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया है, जिससे मेरी जय जयकार हो।

जय जयकार अच्छी लगे, जब हो काम महान।
आचरण जब तक है नहीं, फीका लगता ज्ञान।।

अब ऋषि विश्वामित्र ने भूमंडल के अन्य राजाओं को परास्त कर अपने अधीन करने के लिए प्रस्थान किया और अनेक राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया। जब वह अपने इस विजय अभियान से लौट रहे थे तो वह ऋषि वशिष्ठ के आश्रम के निकट रुके हुए थे। ऋषि विश्वामित्र के पास अनेक प्रकार की शस्त्र विद्या का ज्ञान था। जिससे उनकी सेना के पास अपरिमित शक्ति थी। उस शक्ति का सामना करने का साहस कोई राजा नहीं कर पाया । फलस्वरूप वह अपने राज्य का विस्तार करने में सफल हो गए।
जब वह ऋषि वशिष्ठ के आश्रम के निकट रुके हुए थे तो ऋषि वशिष्ठ ने उनके बारे में जानकारी होने पर उन्हें अपने आश्रम में विनम्रता पूर्वक आमंत्रित किया। कहा जाता है कि विश्वामित्र ने ऋषि वशिष्ठ का आतिथ्य तो स्वीकार कर लिया पर वे उनकी नंदिनी नामक गाय को बलात छीनकर ले जाने लगे। ऋषि वशिष्ठ स्वयं भी शक्ति संपन्न थे, पर उन्होंने अपने अतिथि विश्वामित्र के साथ किसी भी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करना उचित नहीं माना। इस संबंध में जो भी कहानी मिलती है उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ऋषि वशिष्ठ के गौ रक्षक गोपालों से विश्वामित्र के सैनिकों का संघर्ष हुआ, जिसमें वे विजयी हुए। अपने पिता विश्वामित्र को इस प्रकार पराजित हुए देखकर उनके अनेक पुत्रों ने भी ऋषि वशिष्ठ के योद्धा सैनिकों को चुनौती दी। पर ऋषि विश्वामित्र के उन अनेक पुत्रों में से एक पुत्र को छोड़कर शेष सभी मृत्यु को ही प्राप्त हुए। कहा जाता है कि इसके उपरांत ऋषि विश्वामित्र ने अपना राज्य सिंहासन अपने बचे हुए एकमात्र पुत्र को सौंप दिया और वे स्वयं वनों में जाकर तपस्या करने लगे। उन्होंने अनेक अस्त्र शस्त्रों पर गहन अनुसंधान किया और उनकी प्राप्ति करने में सफल हुए।

क्रोध के कारण खो दिया, बना बनाया राज।
भयंकर विषधर क्रोध है, डस लेता है ताज।।

इसके पश्चात विश्वामित्र ने ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में पहुंचकर उनके योद्धा सैनिकों को चुनौती दी। इस बार वशिष्ठ जी ने अपना धनुष संभाल लिया और स्वयं उनकी चुनौती को स्वीकार किया। क्रोधावेश में जल रहे विश्वामित्र ने एक के बाद एक आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, रुद्रास्त्र, इन्द्रास्त्र तथा पाशुपतास्त्र आदि अस्त्र शस्त्रों को प्रयोग में लेना आरंभ कर दिया।

चिंतन दूषित हो गया, व्यर्थ गया उपदेश।
ऋषिगण को लड़ते हुए देख रहा था देश।।

विश्वामित्र जिन अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे उनको वशिष्ठ जी ने अपने मारक अस्त्रों से मार्ग में ही नष्ट कर दिया। ऋषि विश्वामित्र के लिए वशिष्ठ जी की धनुर्विद्या और तपोबल का सामना करना कठिन हो गया था। तब उन्होने और भी अधिक क्रोधित होकर मानवास्त्र, मोहनास्त्र, गान्धर्वास्त्र, जूंभणास्त्र, दारणास्त्र, वज्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, पिनाक धनुष , दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र , क्रौंचास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मंथनास्त्र , कंकाल, मूसल, विद्याधर, कालास्त्र आदि बहुत ही विनाशकारी अस्त्रों का प्रयोग करना आरंभ कर दिया। वशिष्ठ जी भी युद्ध विद्या में पूर्णतया पारंगत थे।
अपने विरोधी और क्रोधी विश्वामित्र को इस प्रकार विनाशकारी अस्त्रों का उपयोग करते देखकर उन्होंने भी अपनी शस्त्र विद्या का प्रयोग करना आरंभ कर दिया। जिसका परिणाम यह निकला कि विश्वामित्र के उन सभी भयंकर विनाशकारी हथियारों का कोई प्रभाव ऋषि वशिष्ठ पर नहीं हुआ। इसके पश्चात ऋषि वशिष्ठ ने उन पर ब्रह्माण्ड अस्त्र छोड़ दिया। ब्रह्माण्ड अस्त्र के भयंकर गगनभेदी नाद से सारा संसार पीड़ा से तड़पने लगा। इसके पश्चात ऋषि मनीषियों की एक सभा हुई और उसमें निर्णय लिया गया कि इस युद्ध में वशिष्ठ ने विजय प्राप्त की है। फलस्वरूप उन सभी ऋषि महर्षियों ने ऋषि वशिष्ठ से अनुरोध किया कि वे अपने इस अस्त्र के प्रयोग से हुई विनाशलीला का उपचार करने का उपाय खोजें। तब ऋषि वशिष्ठ ने अपने योगबल से उस विनाशलीला के तांडव को समाप्त करने की प्रक्रिया आरंभ की। यहां पर यह समझने की आवश्यकता है कि हमारे ऋषि लोग यदि विनाशकारी हथियारों का प्रयोग करना जानते थे तो उसका प्रभाव सीमित या समाप्त करने का उपाय भी जानते थे।

लीला हुई विनाश की , कांप रहे त्रिलोक।
लोगों में भय छा गया फैल गया था शोक।।

इसके उपरांत ऋषि विश्वामित्र फिर अपने आप को अपमानित सा अनुभव कर वनों में जाकर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें ब्रह्मा जी ने राजर्षि का सम्मान प्रदान किया।
इस सम्मान से ऋषि विश्वामित्र अधिक प्रसन्न नहीं थे। वह चाहते थे कि उन्हें ब्रह्मर्षि का सम्मान प्रदान किया जाए। काल विशेष पर उन्होंने अपने भीतर बैठे क्रोध नाम के शत्रु पर विजय प्राप्त कर ऋषि वशिष्ठ से क्षमा याचना की। तब उन्हें ऋषि वशिष्ठ ने ब्रह्मर्षि का सम्मान प्रदान किया।
ऋषि विश्वामित्र को गायत्री का मंत्र दृष्टा ऋषि भी कहा जाता है। अपने जीवन में इतने उत्पातों के उपरांत भी उन्होंने अपनी बुद्धि को सन्मार्ग में ले चलने की कठोर साधना की। यही गायत्री का वह रहस्य था जो उन पर प्रकट हुआ। गायत्री के इस महान रहस्य को समझकर उनके जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। इसलिए उनको गायत्री का मंत्र दृष्टा ऋषि कहा जाता है। उन्होंने इस मंत्र के रहस्य को जाना और अपने जीवन में अंगीकार किया। इसके पश्चात उन्होंने गायत्री के फल को भोगकर अपने जीवन को सार्थक बनाया। ऋषि विश्वामित्र का प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हम सबके लिए प्रेरणादायी है। उनके जीवन से हम यही प्रेरणा ले सकते हैं कि प्रत्येक प्रकार के उत्पात को समाप्त करने के लिए गायत्री का जप अर्थ सहित करना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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