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राजनीति

मुद्दा विहीन विपक्ष कर रहा है फिल्मों की राजनीति

ललित गर्ग

आजादी के बाद से हमारे देश में हिन्दी सिनेमा का एक चलन-सा हो गया कि हिन्दू धर्म, उसके उच्च मूल्य मानकों एवं संस्कृति को धुंधलाना। लेकिन पूर्व सरकारों की तुष्टिकरण की नीति के कारण उस दौर में ऐसी फिल्मों पर विवाद भी खड़े नहीं होते थे और न ही उन पर बैन लगाने के स्वर उभरते थे। लेकिन अब ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘पद्मावत’, ‘पीके’ और ‘ओ माइ गॉड’ जैसी अनेक फिल्मों पर विवाद की श्रृंखला में ‘द केरल स्टोरी’ पर विवाद खड़ा किया जा रहा है, जबकि इस फिल्म में वास्तविक तथ्यों को दिखाने के बावजूद यह विवाद खड़ा किया जा रहा है। देश में फिल्मों का बॉयकॉट कल्चर भी उग्र है। फिल्मों को समाज का आईना कहा जाता है। लेकिन कई मामलों में इस आईने को कभी विवाद तो कभी टकराव का सामना करना पड़ा। कुछ फिल्मों पर प्रतिबंध भी लगे तो कुछ ने लोगों का गुस्सा भी झेला। राजनीतिक लाभ की रोटियां सेंकने की कुचेष्टाएं भी बहुत हुई हैं, सर्वोच्च न्यायालय को भी बार-बार दखल देना पड़ा है। जबकि फिल्में कला, अभिनय और संगीत का मिश्रण हैं। इन्हें संकीर्ण साम्प्रदायिक रंग देना कहां तक उचित है? प्रश्न यह भी है कि फिल्मों को राजनीति के दलदल में क्यों खींचा जाए? एक देश में, एक फिल्म एक राज्य में बैन और एक राज्य में ‘टैक्स फ्री’, क्यों? ये राजनीति नहीं तो क्या है? देश की सर्वोच्च अदालत ने ‘द केरल स्टोरी’ को पश्चिम बंगाल में बैन करने को गलत ठहराते हुए इसे रिलीज करने के आदेश दिए। अदालत ने साफ किया कि फिल्म के प्रदर्शन से अगर कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है तो उसे संभालना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

वर्तमान में फिल्मों से जुड़े विवाद इसलिये बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे फिल्में कहीं-न-कहीं भारतीय संस्कृति का अपमान कर रही हैं, राष्ट्रीय एकता को खंडित कर रही है या वास्तविक एवं कठोर सत्यों को उद्घाटित कर रही है जैसा कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ एवं ‘द केरल स्टोरी’ फिल्मों में प्रस्तुत हुए देश तोड़क डरावने एवं खौफनाक तथ्यों को देखकर कुछ राजनीतिक दल एवं एक सम्प्रदाय विशेष का बौखला जाना है। इस फिल्म से जुड़ा सम्पूर्ण विवाद, उसकी चर्चा और राजनीतिक एंगल पूर्व-नियोजित षड्यंत्र है। बहुसंख्यक समुदाय की पीड़ा को ध्यान में रख कर बनाई फिल्म में कभी विवाद होते नहीं देखा गया है जबकि अल्पसंख्यक समुदाय एवं मुस्लिम लोगों की तुष्टिकरण के लिये वास्तविक घटनाओं का फिल्मांकन भी विवाद का कारण बनना दुर्भाग्यपूर्ण एवं त्रासद है। यह पाया गया है कि कुछ फिल्म निर्माता और कलाकार किसी बहुसंख्यक समाज की आस्था पर आघात कर न केवल धन कमा रहे हैं बल्कि उस बहुसंख्यक समुदाय के गौरवमय इतिहास को भी धुंधला रहे हैं। फिल्म को विवादित बनाना, अतिवादी संगठनों के माध्यम से फिल्म का विरोध कराना आदि सभी मार्केटिंग के तौर तरीके होने के साथ-साथ भारत विरोधी ताकतों की कुचेष्टा एवं षडयंत्र है। सेक्युलरिज्म, अभिव्यक्ति की आड़ लेकर व्यापक पैमाने पर सिनेमा के माध्यम से हिन्दू धर्म, धार्मिक प्रतीकों, भगवान, पूजा पद्धति, आस्था, हिन्दू ऐतिहासिक वीर नायक/नायिकाओं के विरुद्ध विधिवत षड्यंत्र के तहत फिल्मों व धारावाहिकों, कॉमेडी का निर्माण लम्बे दौर से चल रहा है।

‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्मों को लेकर विभिन्न राज्यों की सरकारें भी बंटी हुई हैं, कला एवं संस्कृति को भी साम्प्रदायिक रंग देने की यह साजिश है। एक विचारधारा को मानने वाली सरकार एक फिल्म को बैन करती है तो दूसरी विचारधारा को मानने वाली सरकार उसी फिल्म को ‘टैक्स फ्री’ कर देती है। एक तरफ हम बात ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की करते हैं, तो दूसरी ओर उसी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर पाबंदियां लगाने के बहाने तलाशते हैं। यह कैसा लोकतांत्रिक एवं साम्प्रदायिक सौहार्द का भारत हम निर्मित कर रहे हैं? आजादी के अमृत काल में भी हम आज इन विवादों से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं, यह चिन्ता एवं चिन्तन का विषय है। यह कैसे मान लिया जाना चाहिए कि महज एक फिल्म देख लेने भर से किसी की विचारधारा बदल सकती है। हमारे आसपास जो कुछ घटित हो रहा है, फिल्म उसका आईना मात्र है। सुप्रीम कोर्ट को पहले भी ऐसे मामलों में दखल देना पड़ा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में ऐसी नौबत न आने पाए।

किसी भी फिल्म को देखने या नहीं देखने को लेकर फैसला लेना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसीलिए शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोगों के भड़कने या उनकी भावनाएं आहत होने को आधार बनाकर पूरे राज्य के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बाधित नहीं किया जा सकता। ऐसे में किसी फिल्म को लेकर राज्य सरकारों के बेवजह पार्टी बनने की वजह समझ से परे है। फिल्म प्रदर्शन से पहले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) यानी सेंसर बोर्ड के पास जाती है। सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रदर्शन, उसे रोकने अथवा कुछ दृश्यों को काटने का अधिकार है। जब बोर्ड की ओर से फिल्म के प्रदर्शन के लिए अनुमति दे दी जाती है तो राज्य सरकारों को उसके प्रदर्शन को रोकने का अधिकार कैसे मिल जाता है? इसी तरह फिल्म को ‘टैक्स फ्री’ करने के पीछे भी कोई ठोस कारण होना चाहिए। जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और हरियाणा में फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को ‘टैक्स फ्री’ किए जाने के पीछे वोट बैंक की राजनीति के अलावा कोई अन्य कारण समझ में नहीं आता।

हमारे देश में सियासत भी अतरंगी है। राजनीति में नित नए आयाम जुड़ते जा रहे हैं। सियासत के ठेकेदारों ने धर्म को भी अपने राजनीतिक फायदे के अनुसार उपयोग करना सीख लिया है। यहां तक कि हमारी सभ्यता एवं हमारी संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक रोटियां सेकने में इन्हें कोई परहेज नही होता है। उन्हें तो बस अपना राजनीतिक लाभ दिखता है। फिर चाहे उसके बदले उन्हें अपने धर्म के खिलाफ ही क्यों ना बोलना पड़े। राजनीति में ईमान, धर्म, मान, मर्यादा और आस्था जैसे शब्द बेमानी से लगने लगे हैं। ऐसे में कैसे यह उम्मीद की जाए कि राजनीति के रणबांकुरे हमारी संस्कृति, हमारी आस्था, हमारे वसुधैव कुटुम्बकम एवं सर्वधर्म सद्भाव की आदर्श परम्परा को बनाए रखने का, उसे सहेजकर रखने का प्रयास करेंगे। आज के वर्तमान दौर में यह हमें ही तय करना है कि तकनीकी के इस दौर में सकारात्मकता भी है और नकारात्मकता भी। ऐसे में हमें अपने मूल्यों को खुद समझना होगा और यह हमें ही तय करना होगा कि हम समाज को किस दिशा में लेकर जाए। समाज में फैली बुराई को किस प्रकार खत्म कर सकें। इस दिशा में हमें और हमारे समाज को ही सोचना होगा और इसमें फिल्मों की भूमिका महवपूर्ण है। इन फिल्मों को राजनीति का एवं साम्प्रदायिक कट्टरता का रंग देना नये भारत, सुदृढ़ भारत की सबसे बड़ी बाधा है।

हमारे देश की विडंबना देखिए कि यहां अभिव्यक्ति की आजादी भी धर्म विशेष के लिए अलग-अलग परिभाषित की जाती है। जब 2015 में फ्रांस में पैग़म्बर मोहम्मद का कार्टून एक समाचार पत्र ने प्रसारित किया गया तो उस समाचार पत्र में काम करने वाले 12 लोगों की हत्या कर दी गई थी। वहीं साल 2020 में फ्रांस के टीचर का गला रेत दिया गया क्योंकि उसने पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून बच्चों को दिखाया था। लेकिन जब हमारे देश मे एम.एफ. हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं का नग्न चित्र बनाया तो उनका समर्थन करने वालों की लंबी फ़ौज खड़ी हो गई। कोई मां दुर्गा को सिगरेट पीटे हुए दिखा रहा है तो कोई गणेशजी, शिवजी और हनुमानजी की छवि को आघात पहुंचा रहे हैं, लेकिन इसका कहीं कोई विरोध नहीं हुआ। जबकि यही बातें किसी और धर्म के लिए होती तो हाहाकार मच गया होता। नूपुर शर्मा विवाद का ही जिक्र करें तो एक तरफ एक धर्म विशेष की धार्मिक किताब के पन्ने पर लिखी बात का जिक्र करने भर से विदेशों तक से विरोध के स्वर उठ खड़े हुए यहां तक कि नूपुर शर्मा का समर्थन करने वाले लोगों तक की जान ले ली गई और दुनिया मूकदर्शक बनकर तमाशा देखती रही। एक धर्म की आस्था का समर्थन और दूसरे धर्म का विरोध करना कहां तक सही कहा जा सकता है? ऐसे में यह अपने-आपमें बड़ा सवाल बन जाता है। हिन्दू देवी-देवताओं की आपत्तिजनक प्रस्तुति जानबूझकर लोकप्रियता हासिल करने के साथ-साथ धर्म-विशेष के असंख्य लोगों की भावनाओं को आहत करने का जरिया है। इस तरह की हिन्दू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार करने की सुदीर्घ परम्परा रही है, सदियों से हिंदू धर्म का मजाक बनाया जाता रहा है, लेकिन कभी-न-कभी तो वाजिब विरोध के स्वर उभरेंगे ही।

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