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भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 36, संसार के पहले कुलपति : शौनक ऋषि

संसार के पहले कुलपति : शौनक ऋषि

नैमिषारण्य का भारतीय वांग्मय में विशिष्ट स्थान है। यहां पर अनेक ऋषियों ने तपस्या की और मोक्ष पद प्राप्त किया। जिन ऋषियों ने यहां पर दीर्घकाल तक तपस्या की है, उनमें ऋषि शौनक का भी नाम सम्मिलित है। ऋषि शौनक एक वैदिक आचार्य थे, जो भृगुवंशी शुनक ऋषि के पुत्र थे। इनका पूरा नाम इंद्रोतदैवाय शौनक था। इन्होंने एक विशाल गुरुकुल की स्थापना करके उसके माध्यम से प्राचीन काल में भारतीय धर्म ,संस्कृति और वैदिक मान्यताओं के प्रचार-प्रसार में अपना अनुपम योगदान दिया। मान्यता है कि इनके गुरुकुल में दस हजार विद्यार्थी विद्या ग्रहण करते थे। इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के जीवन निर्माण से राष्ट्र निर्माण और विश्व निर्माण के अपने पवित्र कार्य का संपादन ऋषि शौनक बड़ी शालीनता के साथ करते थे।

धर्म के प्रचार में ,जुटे रहे दिन रात।
शिक्षा के प्रसार में, दिन देखा ना रात।।

विद्याध्ययन के केंद्र के रूप में विकसित हुए नैमिषारण्य ने ऋषि शौनक के इस प्रकार के पवित्र और महान कार्य से पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त की थी। मान्यता यह भी है कि ऋषि शौनक से भी पहले से नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषि अलग-अलग काल खंडों में तपस्या करते चले आए थे । इस प्रकार नैमिषारण्य ऋषियों की पवित्र भूमि होने के कारण पवित्रता ,शांति और अध्यात्म का केंद्र बन गया था। इतनी बड़ी संख्या में ऋषि महात्माओं की तप:स्थली के रूप में मान्यता प्राप्त रही नैमिषारण्य की पवित्र भूमि ने राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 

ऋषियों ने यहां तप किया, जीवन दिया खपाय।
मोक्ष पद को पायकर किया जीवन का कल्याण।।

ऋषि शौनक को संसार का पहला कुलपति होने का सम्मान भी प्राप्त है। उससे पहले ऋषिगण जिस प्रकार विद्यादान किया करते थे उसका ढंग दूसरा होता था। ऋषि शौनक ने अपने समय में विद्या दान की प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। उन्होंने बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को एक स्थान पर रखकर उनके लिए वे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराईं जो आज के विद्याध्ययन केंद्रों के पास उपलब्ध होती हैं। यद्यपि आज के विद्याध्ययन केंद्रों और ऋषि शौनक या उनसे पूर्व के ऋषियों के विद्याध्ययन केंद्रों अर्थात गुरुकुलों के परिवेश में जमीन आसमान का अंतर है। जहां हमारे प्राचीन ऋषियों के गुरुकुल या विश्वविद्यालय या शिक्षा केंद्र पूर्णतया सात्विक और आध्यात्मिक परिवेश से परिपूर्ण होते थे, वहीं आज के तथाकथित शिक्षा केंद्रों में विलासिता सर चढ़कर बोलती है। नैमिषारण्य में स्थापित किए गए उस शिक्षा केंद्र को ऋषि शौनक ने जिस प्रकार आध्यात्मिकता के रंग से रंगा उससे पता चलता है कि वे भारत के प्राचीन वैदिक ऋषियों की चिंतनधारा को आगे बढ़ाने का ही कार्य कर रहे थे।

अध्यात्म के परिवेश में, सतोगुण का प्रभाव।
ढूंढे से भी ना मिले, विलासीपन का भाव।।

ऋषि शौनक यज्ञ याग के भी बहुत बड़े मर्मज्ञ थे। उन्होंने महाभारत काल में राजा जनमेजय का अश्वमेध और सर्पसत्र नामक यज्ञ संपन्न करवाया था। ऋष्यानुक्रमणी ग्रंथानुसार, असल में शौनक ऋषि अंगिरस् गोत्रीय शनुहोत्र ऋषि के पुत्र थे, परंतु बाद में भृगु-गोत्रीय शनुक ने इन्हें अपना पुत्र मान लिया था। जिस कारण इन्हें शौनक पैतृक नाम प्राप्त हुआ था। 

उन्होंने ऋक्प्रातिशाख्‍य, ऋग्वेद छंदानुक्रमणी, ऋग्वेद ऋष्यानुक्रमणी, ऋग्वेद अनुवाकानुक्रमणी, ऋग्वेद सूक्तानुक्रमणी, ऋग्वेद कथानुक्रमणी, ऋग्वेद पादविधान, बृहदेवता, शौनक स्मृति, चरणव्यूह, ऋग्विधान आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने ही शौनक गृह्सूत्र, शौनक गृह्यपरिशिष्ट, वास्तुशा्सत्र ग्रंथ की रचना भी की थी।
शिक्षा केंद्र के कुलपति के रूप में यदि ऋषि शौनक को विशेष सम्मान के दृष्टिकोण से देखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का परिशीलन किया जाए तो पता चलता है कि उनके पश्चात जब भारतवर्ष में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई तो उनके मूल प्रेरणा स्रोत के रूप में ऋषि शौनक का ही नाम लिया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोषों को थोड़ी देर अलग कर और आधुनिक शिक्षा केंद्रों में व्याप्त विलासिता पूर्ण परिवेश को भी कुछ देर के लिए उपेक्षित करके देखा जाए तो पता चलता है कि ऋषि शौनक द्वारा स्थापित किए गए भव्य भवन की आधारशिला पर ही उसकी अनुकृति के रूप में ये शिक्षा केंद्र आज काम कर रहे हैं।

आज हमारे पास में, जो कुछ भी है दिव्य।
ऋषियों का पुरुषार्थ ही उसे बनाता भव्य।।

कहने का अभिप्राय है कि ऋषि शौनक जहां प्राचीन काल में शिक्षा महारथी के रूप में सम्मानित हुए वहीं वे आज की शिक्षा और शैक्षणिक क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं। उनके चिंतन दर्शन को यदि आज अपना लिया जाए तो जहां कुलपति अपनी पवित्र भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम हो सकते हैं, वहीं शिक्षा राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त और उपयोगी माध्यम भी हो सकती है। पुराणों में ऐसा भी उल्लेख है कि कलियुग के दोषों का दहन करने के लिए नैमिषारण्य में ऋषि शौनक ने 12 वर्ष तक निरंतर विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। इस प्रकार ऋषि परमार्थ के लिए जीवन भर कार्य करते रहे। प्राचीन काल में शिक्षा का उद्देश्य परमार्थ के लिए ही युवाओं को तैयार करना होता था। ऋषि शौनक स्वयं परमार्थ का प्रतीक बन चुके थे। परमार्थ के लिए तपस्या करने वाले इस ऋषि ने अपने गुरुकुल से जिन हजारों युवाओं का निर्माण कर संसार के उपकार के लिए निकाला था उनका वह कार्य ही उनको मान्यता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने और उसे सर्वग्राही बनाने में ऋषि शौनक के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने गुरु शिष्य परंपरा का विस्तार किया। इसे संसार के लिए उपयोगी बनाकर यज्ञ परंपरा का भी विशेष विस्तार किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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