बहादुरशाह बोला : क्रांति से नहीं था उसका कोई संबंध

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सोशल मीडिया पर आइए पोस्ट मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्री देवेंद्र सिंह आर्य जी ( वरिष्ठ अधिवक्ता एवं चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र) द्वारा मुझे भेजी गई। उस पोस्ट की विषय वस्तु इस प्रकार है: –
‘मुल्क के हालात और मीडिया की दलाली से बेहद दुखी और परेशान हूँ… इसी लिए ये पोस्ट कर रहा हूँ.. ये जो तस्वीर में दो नौ-जवान नज़र आ रहे हैँ ये मशहूर शायर और आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के साहबज़ादे हैँ… मिर्ज़ा शाह अब्बास और मिर्ज़ा जवान बख्त.. अंग्रेज़ों ने इन दोनों के सर काट कर बहादुर शाह ज़फर को थाल में रख कर भेजे थे… साथ में अंग्रेज़ों का एक नुमाइंदा था, जिसने बहादुर शाह ज़फर से कहा था…

दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की .
अय ज़फर ठंडी हुयी अब तेग़ हिन्दुस्तान की .

बहादुर शाह ज़फर ने ये सुन कर जवाब में कहा था..

ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की .
तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की .

आज कितनी आसानी से उसी क़ौम को ग़द्दार कह दिया जाता है..

इस पोस्ट के संबंध में मैं बताना चाहूंगा कि बहादुरशाह जफर को जब हमारे क्रांतिकारियों ने जबरदस्ती क्रांति का नेता बनने के लिए दबाव में ले लिया तो उसने बोला था :-

ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की .
तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की .

पर जब अंग्रेजों से थोड़ी देर युद्ध लड़ लिया तो बादशाह को दिन में तारे दिखाई देने लगे। उसे जबरदस्ती युद्ध के मैदान में लाया गया था,और युद्ध का उसे कोई अनुभव भी नहीं था, इसलिए दोपहर होते-होते उसकी सुबह की बनावटी वीरता समाप्त हो गई । तब उसने बोला :-

दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगूं जान की .
अय ज़फर ठंडी हुयी अब तेग़ हिन्दुस्तान की .

यहां पोस्ट करने वाले ने बड़ी सावधानी से बात को पलट दिया है। जिसको समझने की आवश्यकता है। अब तनिक उस समय की परिस्थितियों पर विचार करते हैं।

मिर्जा गालिब की पीड़ा

जिस समय 1857 की क्रांति दिल्ली में चल रही थी, उस समय उर्दू का प्रसिद्ध शायर मिर्जा गालिब दिल्ली में ही था। अपनी पुस्तक 'दास्ताने गदर' में इस शायर ने लिखा है-'मेरे हजारों दोस्त मौत के घाट उतर चुके हैं। मेरे सामने खून के पोखर भरे पड़े हैं। खुदा ही जाने मुझे अभी और क्या देखना है? शायद मेरी मौत के समय कोई मुझे रोने वाला भी नहीं है.....।'

बादशाह बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी

दिल्ली की वास्तविकता यही थी कि दिल्ली उस समय खून में डूबी पड़ी थी। बूढ़े बादशाह बहादुरशाह को उसकी बेगम जीनत महल ने अंग्रेज अधिकारी हडसन से मिलकर जैसे-तैसे जीवित छुड़वाया था। उसने आत्मसमर्पण से पूर्व अंग्रेजों के सामने यह शर्त रखी थी कि अंग्रेज उसके पिता अहमद कुली खां, पुत्र जवांबख्त और पति बहादुरशाह जफर को प्राणदान देंगे। जीनतमहल की इस शर्त को अंग्रेजों ने स्वीकार किया था। जब हडसन बादशाह बहादुरशाह को गिरफ्तार करने आया तो उस समय उसने बादशाह को यह बताया भी था कि बेगम जीनत महल से किये गये वचन के अनुसार ब्रिटिश सरकार आपके आत्मसमर्पण के पश्चात आपको और बेगम जीनत महल के पुत्र जवांबख्त व पिता अहमद कुली खां को प्राणदान देगी।

तब बादशाह ने अंग्रेज अधिकारी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। बादशाह पर मुकदमा चलाया गया। उस मुकदमे में बादशाह ने अपने विषय में बहुत कुछ स्पष्ट किया। जिसे पढ़ने से पता चलता है कि क्रांति से पूर्व, क्रांति के काल में और क्रांति के पश्चात बादशाह बहादुरशाह जफर को कैसे-कैसे तनावों और मानसिक दबावों से निकलना पड़ा तथा क्रांति और क्रांतिकारियों के विषय में बादशाह के विचार क्या और कैसे थे ?

बादशाह का बयान

बादशाह ने यह बयान 9 मार्च, 1858 को दीवाने खास में लगी अदालत के सामने दिया था। बयान इस प्रकार था – ‘सत्य तो यह है कि गदर के संबंध में मुझे पूर्व से कोई सूचना नहीं थी । एकाएक आठ बजे बागी आ गये और महलों की खिड़कियों के नीचे शोर करने लगे। उन्होंने कहा कि वे मेरठ के अंग्रेज को कत्ल करने आये हैं और उसका कारण यह बतलाया गया है कि उन्हें गाय और सूअर की चर्बी मिले कारतूसों को दांतों से काटने के लिए कहा जाता है, जो कि हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों का नाश करने वाली बात है। मैंने यह सुनकर तुरंत किले के फाटक बंद करा दिये और किलेदार को खबर कर दी। वे फौरन मेरे पास आये और जहां बागी एकत्र थे, वहां जाना चाहा और दरवाजा खोल देने को कहा।
मैंने उन्हें मना किया और जब दरवाजा नहीं खुलने दिया तो वे ऊपर आ गये और बरामदे में खड़े होकर सिपाहियों से कुछ कहा, जिसे सुनकर वे लोग चले गये। इसके पश्चात मि. फ्रेजर ने दो तोपों के लिए तथा किलेदार ने दो पालकियों के लिए खबर भेजी। उन्होंने कहा कि उनके पास दो औरतें ठहरी हैं और वह चाहती हैं कि उन्हें शाही महल में पहुंचा दिया जाए। मैंने दो पालकी भेज दीं और तोप भेजने का आदेश दे दिया। इसके पश्चात मैंने सुना कि पालकियां पहुंचने भी नहीं पाई थीं कि फ्रेजर किलेदार और वे औरतें सब मार डाली गयीं। इसके थोड़ी ही देर बाद बागी दीवाने खास में घुस आये और पूजाग्रह में फैल गये और मुझे चारों ओर से घेरकर पहरा बैठा दिया। मैंने उन्हें वहां से चले जाने के वास्ते कहा और यहां आने का कारण पूछा, जिसके उत्तर में उन्होंने चुप रहने को कहा। उन्होंने इसके पश्चात कहा कि हमने अपना जीवन संकट में डाला है तो अब हम सारी बातें अपनी इच्छानुसार ही करेंगे।
मैं मार दिये जाने के डर से कुछ न बोला और अपने कमरे को लौट आया । शाह को वह कई अंग्रेज स्त्री पुरुषों को मैगजीन से गिरफ्तार करके लाये और उन्हें दो बार कत्ल करने का इरादा किया। मैंने उन्हें बचाने का प्रयास किया और सफल हो गया और वे अंग्रेज बच गये। अंतिम समय मैंने उपद्रवकारियों को बहुत कुछ रोकने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने मेरी बात
न मानी और उन बेचारों को कत्ल करने बाहर ले गये। मैंने कत्ल के लिए कोई हुक्म नहीं दिया।
मिर्जा मुगल, मिर्जा खैर सुल्तान, मिर्जा अबूबकर और मेरा एक खास मुसाहिब बसंत सिपाहियों से मिल गये थे, उन्होंने संभव है मेरा नाम लिया हो। मुझे पता नहीं कि उन्होंने क्या कहा? न मैं यही जानता हूं कि मेरे खास मुसाहिब विद्रोही बनकर कत्ल में शरीक हुए थे। यदि उन्होंने ऐसा किया तो मिर्जा मुगल के प्रभाव में आकर किया होगा। कत्ल के पश्चात भी मुझे किसी ने खबर नहीं दी। कुछ गवाह मेरे नौकरों को मि. फ्रेजर व किलेदार के कत्ल में सम्मिलित होना बतलाते हैं, इसका भी वही जवाब है कि मैंने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया। यदि उन्होंने ऐसा किया भी है तो स्वेच्छा से किया होगा। मैं ख़ुदा की कसम खाकर कहता हूं कि मि. फ्रेजर इत्यादि की हत्या करने का हुक्म मैंने नहीं दिया। मुकन्दलाल वगैरह ने जो मेरा नाम लिया है वह झूठा है।
मिर्जा मुगल व खैर सुल्तान ने हुक्म दिया हो तो कोई ताज्जुब नहीं, क्योंकि वे सिपाहियों से मिल गये थे। इसके पश्चात सिपाहियों ने मिर्जा मुगल खैर, सुल्तान मिर्जा अबूबकर को मेरे सामने लाकर कहा कि वे इन लोगों को अपना अफसर बनाना चाहते हैं। मैंने उनकी बात नहीं मानी, लेकिन जब सिपाहियों ने जिद की और मिर्जा मुगल क्रोधित होकर अपनी मां के पास चला गया तो डर से मैं चुप हो गया और इधर दोनों ओर की रजामंदी से मिर्जा मुगल कमांडर इन चीफ बनाये गये।
मेरी मुहर और दस्तखतों के संबंध में असली बात यह है कि जिस रोज बागी आये उन्होंने अंग्रेजों को मार डाला और मुझे कैद कर लिया, मैं उनके बस में रहा, जैसा कि अब हूं। जो कागज वे मुनासिब समझते, मेरे पास लाते और मुहर लगाने को मजबूर करते। कभी-कभी हुक्मनामों के मसविदे लाते और मेरे सेक्रेटरी से लिखवाते। कभी असली कागज लाते, और उनकी नकलें दफ्तर में रखते। इस प्रकार वह एक फाइल सी बन गयी। बहुत बार उन्होंने सादे लिफाफे मेरे सामने पेश किये, उनमें कौन से कागज कहां भेजे गये- मुझे नहीं पता।
अदालत में एक अर्जी पेश हुई है जो मुकंद लाल की ओर से किसी बेनामी व्यक्ति के नाम है जिसमें एक दिन में निकाले गये हुक्मनामों की सूची है। उसमें साफ लिखा है कि इतने हुक्म फलां के कहने से निकले हैं और इतने अमुक के कहने से निकले हैं। लेकिन कहीं भी मेरी आज्ञा से लिखे जाने का जिक्र नहीं है। इससे स्पष्ट है कि मेरी बिना सम्मति के जब मिर्जा खैर सुल्तान, मिर्जा जितने लेख चाहे गये-लिखे गये, और मुझे उनकी खबर भी नहीं हुई। मैं और मेरा सेक्रेटरी प्राणों के डर से चुप रहे। ठीक यही बात उन अर्जियों की है जिनमें मेरे हाथ की लिखावट है। जब मिर्जा मुगल, अबूबकर को कुछ लिखवाना होता तो फौजी अफसरों को साथ लेकर आते और अर्जियों पर हुक्म लिखने को मजबूर करते। वह प्रायः अपने प्रभाव में लाने के लिए मुझे सुनाकर कहते कि जो उनकी बात न मानेगा वह मार डाला जाएगा। इसके सिवाय मेरे नौकरों पर अंग्रेजों से संबंध रखने और उनके पास पत्र भेजने का जुल्म लगाते, विशेषकर हकीम अहसान उल्लाखां, महबूब अली खां और मलिका जीनतमहल पर षड्यंत्र का दोष लगाया गया और कहा जाता कि अब अगर ऐसा सुनने को मिला तो कत्ल कर दिये जाओगे। इसी प्रकार एक बार हकीम साहब का मकान लूट लिया और कत्ल की नीयत से उन्हें कैद कर लिया गया। उसके पश्चात और नौकरों को भी गिरफ्तार किया गया, जैसे शमशादुद्दौला मलिका जीनत महल इत्यादि को। फिर यह भी कहा जाता कि मुझे हटाकर मिर्जा मुगल को बादशाह बनाएंगे। यह बात विचार करने की है कि मेरे पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जो उन्हें प्रसन्न कर सकती थी?
फौज के अफसर इतने सिर चढ़ गये थे कि कहते थे कि जीनतमहल को मेरे हवाले कर दो, मैं एहसान उल्लाखां और महबूब खां को कैद होने देता या हकीम साहब के मकान को लूटने देता ? बागी सैनिकों ने एक अदालत बनाई थी जिसमें तमाम मामले तय होते थे। जिन मामलों को तय किया जाना होता था उन्हें उन लोगों की काउंसिल अधिकार देती थी। मैंने कभी उसमें भाग नहीं लिया। उन्होंने मेरी मर्जी के विरुद्ध मेरे नौकरों को ही नहीं लूटा, बल्कि मेरे कई महलों को भी लूट लिया था। चोरी करना, हत्या करना, कैद करना उनके वास्ते साधारण बात थी, जो भी चाहते करते । जबरदस्ती शहर के रईसों और व्यापारियों से जितना धन चाहते, वसूल करते और यह सब अपने निजी खर्चे के लिए करते। यह जो कुछ हुआ है, वह सब उपद्रवी सेना का किया हुआ है। मैं उनके वश में था और कर भी क्या सकता था?
वे (क्रांतिकारी) एकदम से आ गये और मुझे कैद कर लिया था। मैं लाचार था और डर के कारण वह जो कहते थे, करना पड़ता, नहीं तो मैं भी मार डाला जाता।
यह सभी जानते कि मैं जीवन से निराश हो गया था और मेरे दूसरे नौकरों की भी जान बचने की आशा नहीं थी। मैंने फकीर हो जाने का निश्चय कर लिया था और गेरूए रंग की साधुओं वाली पोशाक पहननी शुरू कर दी।
मेरा यहां से कुतुब साहिब वहां से अजमेर शरीफ और वहां से मक्का मुअज्जमा जाने का विचार था, लेकिन सेना ने मुझे आज्ञा नहीं दी। जिस सेना ने खजाना और मैगजीन लूटा, उसी ने जो चाहा वही किया और मैंने किसी से कुछ नहीं कहा, और न इन लोगों में से किसी ने लूट का माल लाकर मुझे दिया। एक रोज यही लोग जीनत महल का महल लूटने गये थे, मगर उन लोगों से दरवाजा नहीं टूटा। अब ध्यान देने योग्य है कि यदि ये लोग मेरे अधीन होते या मैं उनके षड्यंत्र में सम्मिलित होता तो ये सब बातें क्यों होती? यहां तक कि वे लोग औरतें मांगते और कहते हमें दे दो हम कैद करेंगे।
हाजी कब्ज की बाबत मुझे यह कहना है कि उसने मक्का जाने के वास्ते मुझसे छुट्टी मांगी थी। मैंने उसे ईरान नहीं भेजा और न शाह ईरान के पास कोई पत्र ही भेजा। यह बात किसी ने गलत उड़ाई है। मुहम्मद दरवेश की दरख्वास्त मेरी नहीं है , जिस पर विश्वास किया जा सके। संभव है कि किसी मेरे या मियां अस्करी के दुश्मन ने यह भेजी हो । बागी सेना के संबंध में मैं यह बताता हूं कि उसने मुझे सलाम तक नहीं किया, न मेरा किसी तरह का अदब ही रखा। ये ‘दीवाने खास’ और ‘दीवाने आम’ में बिना धड़क जूतियां पहने चले आते थे। मैं उस सेना पर कैसे विश्वास करता, जिसने अपने ही मालिक को मार डाला हो। जिस तरह उन्होंने उसका कत्ल किया उसी तरह मुझे भी कैद किया, मुझे अपनी आज्ञा से रखा तथा मेरे नाम से लाभ उठाया। जिससे मेरे नाम के कारण उनका काम हो। जबकि सेना ने सशक्त अफसरों को मार डाला, तब मैं जिसके पास न खजाना, न फौज, न तोपखाना था, उन लोगों को कैसे रोक सकता था? या कैसे उनके विरुद्ध खड़ा हो सकता था? लेकिन मैंने उनकी सहायता नहीं की। जब बागी सेना किले के पास आयी तो यही मेरे बस में था कि दरवाजे बंद कर दिये जाएं, फिर जो कुछ हुआ बता दिया। कुछ को बागियों से मिलने को रोक सका। मैंने स्त्रियों के लिए दो पालकी और फाटक की रक्षा के लिए दो तोपें मि. फ्रेजर और कप्तान डगलस की प्रार्थना पर भेज दीं। इसके सिवाय तेज ऊंट सवार दूत के द्वारा पूरा समाचार उसी रात को आगरा के लेफ्टिनेंट गवर्नर की सेवा में भेज दिया। मुझसे जो कुछ हो सका किया। मैंने अपनी इच्छा से कोई हुक्म नहीं दिया। मैं सिपाहियों की कैद में था और उन्होंने लाचार करके जैसा चाहा कराया।
मैंने कुछ नौकर रखे थे, वे बलवाइयों से डरकर और अपनी जान बचाने के लिए रखे थे। जब ये लोग जान के डर से भाग गये तो मैं किले से निकलकर हुमायूं के मकबरे में जाकर ठहर गया। बागी सेना मुझे ले जाना चाहती थी, लेकिन मैं नहीं गया और उसी जगह से अपने को सरकार से जान न लिये जाने का वचन पाकर सरकार के सुपुर्द कर दिया।
उपरोक्त बयान मेरा स्वयं का लिखा हुआ है और अत्युक्ति रहित सत्य है जरा भी झूठ नहीं है, ईश्वर मेरा गवाह है, जो सच था और मुझे याद था वह मैंने लिखा है। शुरू में ही मैंने कसम लेकर सत्य लिखने का वायदा किया था। वैसा ही मैंने किया है।’

-दस्तखत

बहादुरशाह बादशाह

इस बयान के निहित अर्थ

बादशाह के बयान से स्पष्ट है कि बादशाह पर क्रांति का नेतृत्व थोपा गया था, उसकी अपनी इच्छा क्रांति में भाग लेने की नहीं थी। वैसे भी बहादुरशाह का युद्ध आदि में जाने का कोई अनुभव नहीं था। वह भीतर से अंग्रेजों से डरा हुआ था और उन्हें भारत की सरकार मानने लगा था। इतना ही नहीं, वह अंग्रेजों को अब अपराजित शक्ति मानने लगा था। उसे हर स्थिति में अपने प्राण प्रिय थे, इसके लिए उसे चाहे जितना अपमान सहना पड़े, यहां तक कि बादशाहत भी जाती हो तो चली जाए, पर बूढ़े बादशाह की जान और बेगम ‘जीनत’ नहीं जानी चाहिए। उसका मनोबल टूट चुका था और हमारे क्रांतिकारी उसे उत्साहित कर करके क्रांति का नेता बना रहे थे। जो व्यक्ति मकबरे में जाकर छुप गया हो, उससे आप युद्ध की अपेक्षा नहीं कर सकते।
अब प्रश्न है कि क्रांतिकारियों के सामने ऐसी क्या विवशता थी कि वह बहादुरशाह को अपना नेता बनायें? इस पर भी तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करना पड़ेगा। एक तो यह था कि बादशाह को अपना नेता बनाने से क्रांति में हिंदू-मुस्लिम की संयुक्त उपस्थिति और सहभागिता सुनिश्चित करने में सहायता मिलनी संभावित थी। दूसरे, अंग्रेज मुगल बादशाह को प्रतीक के रूप में ही सही, पर अभी भी देश का बादशाह मानते थे, इसलिए भारत के क्रांतिकारियों ने भी चाहे प्रतीक रूप में ही सही बादशाह को ही अपनी क्रांति का नायक बनाने का प्रयास किया। तीसरे बादशाह के रूप में क्रांतिकारियों को एक चेहरा मिल गया था जो किसी भी संगठन के लिए आवश्यक होता है।

बादशाह को किया गया ‘जलावतन’

तीन सप्ताह के मुकदमे की औपचारिकताओं को पूरा करके 9 मार्च, 1858 को बादशाह को अपराधी घोषित कर ‘जलावतन’ का दण्ड दिया गया। यह दण्ड एक प्रकार से बादशाह के लिए दण्ड न होकर पुरस्कार था। क्योंकि बादशाह को जीवित रहना अच्छा लगता था, उसके लिए चाहे अपमानित होना पड़े. यह उसके लिए अधिक विचारणीय बात नहीं थी।
अप्रैल, 1858 को उक्त निर्णय पर एन पैनी मेजर जनरल कमांडिंग ऑफिसर मेरठ ने सहारनपुर कैंप में मोहर लगाकर पुष्टि की। फलस्वरूप बादशाह को ‘राजद्रोही’ सिद्ध किया गया। अब बादशाह के लिए सब कुछ पराया और बेगाना हो चुका था। उसकी शेरो शायरी में भी इस बेगाने हो जाने की पीड़ा फूटने लगी । उसने कहा-

‘तख्तो ताज गया वतन भी हो गया बेगाना।
जफर कहा ठिकाना तेरा जबां पर यही फसाना॥’

जो लोग कभी मुगल बादशाह की आज्ञा पालन करने को अपना सौभाग्य माना करते थे, आज समय के परिवर्तन के अनुसार वही लोग बादशाह की ओर देखना तक उचित नहीं मान रहे थे। सचमुच बादशाह का संसार लुट चुका था, वह मुगलवंश का अंतिम दीपक था, जो अब बुझ रहा था। संयोग की बात देखिये कि 1526 की अप्रैल में ही बाबर ने दिल्ली में मुगलवंश की स्थापना की थी और इसी माह में दिल्ली से मुगलवंश का अंतिम बादशाह अपना बोरिया बिस्तर बांध रहा था। पश्चिम की ओर से मुगल वंश भारत में घुसा था और पूरब की ओर (रंगून) को निकलकर चला गया। अदालत ने अपने आदेश में कहा था-

‘दिल्ली के माजूल बादशाह मुहम्मद बहादुरशाह पर जो इल्जाम लगाये थे-बाज उनमें बिलकुल साबित हैं, इसलिए यह मुजरिम
हैं। इन कर्मों के सबूत के सबब से बहादुरशाह को जलावतन किया जावे।’ बादशाह सिर झुकाये खड़ा रहा और कुछ भी न बोल सका। बस इतना कहा-

‘जाते हैं तेरे कूचे से जालिम खफा न हो।’

अक्टूबर माह की गुलाबी सर्दी आरंभ हो चुकी थी। दिन शुक्रवार तिथि 17 को बादशाह को अपने परिवार सहित कलकत्ता के लिए भेजे जाने की तैयारी की गयी। बहुत से लोग अपने बादशाह को विदाई देने आये। बादशाह ने दिल्ली की अंतिम नमाज अदा की, बाहर निकला तो तुरंत डोली में बैठने का हुक्म उसे दे दिया गया। इस दृश्य को देखकर बहुत से लोगों की आंखें सजल हो उठी थीं। लोगों को अपने बादशाह का यूं जाना अच्छा न लगा। बादशाह ने लालकिले की ओर एक बार देखा और कहा-

‘दरो दीवार को हम हसरत से नजर करते हैं।
खुश रहो, अहले वतन अब हम तो सफर करते हैं।’

बादशाह की आंखों में भी अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। उसकी सफेद दाढ़ी गीली हो चुकी थी। बहुत से लोग अपने बादशाह को आज भी नजराने दे रहे थे। लोग बादशाह की ओर देखकर मुस्कराने का प्रयास भी करते पर, मुस्कराने के स्थान पर रो पड़ते थे। कहते हैं कि उस दिन दिल्ली के अनेक घरों में चूल्हे नहीं जले थे। 7 नवंबर, 1862 ई. को 89 वर्ष की अवस्था में बादशाह का रंगून में देहावसान हो गया था।
20वीं सदी में वहां लिखा गया-

‘दिल्ली का माजूल बादशाह- बहादुरशाह 7 नवंबर, 1862 ई. को रंगून में मरा और इस जगह के करीब दफन हुआ।’

 बादशाह के मुगल या मुसलमान होने के कारण बहुत लोग गंगा जमुनी संस्कृति का राग अलापते हुए अक्सर यह भी कहते मिलते हैं कि बादशाह बड़ा बदनसीब था जिसे अपने अंतिम क्षणों में अपने वतन को देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ और ना ही उसे हिंदुस्तान की मिट्टी में दफन होने का ही मौका मिला।

ऐसे लोगों के लिए हम बताना चाहते हैं कि उस समय रंगून या बर्मा भारत का ही एक अंग था। अतः यह कहना कि वह अपने मुल्क अर्थात हिंदुस्तान या भारत से कहीं दूर था, पूर्णतया मूर्खतापूर्ण है।

दूसरी बात हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि यदि बादशाह को अपने मुल्क से दूर हो जाने का बड़ा गम था और वह अपने आप को बदनसीब समझता था तो ऐसे ही बदनसीब तो इस देश में अनेक हुए हैं, जिन्हें काले पानी की सजा दी गई और वे वहीं पर मर गए। यदि हम इस संबंध में स्वतंत्र वीर सावरकर जी को पढ़ हैं तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। काले पानी की सजा भोग रहे उन अनेक कैदियों को जिन्हें अपनी जन्मभूमि से दूर मरना पड़ा,
क्या हम इसलिए भूल जाएं कि वह हिंदू थे ?
अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर के क्षेत्र के राजा रहे राजा जयपाल खटाणा और उनकी वंश परंपरा के अनेक राजाओं को क्या हमने आज इसलिए भुला दिया है कि वह हिंदू थे ? क्या हिंदू होने के कारण ही उनकी समाधि या उनसे जुड़े पवित्र स्थल हमारे लिए कोई मायने नहीं रखते ? यदि रखते हैं तो बहादुर शाह की कथित पीड़ा के साथ दुख व्यक्त करते समय अपने इन नाम अनाम बलिदानों को ही स्मरण करने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं.)

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