भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 35 महर्षि दधीचि और वृत्रासुर

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ऋग्वेद के एक मंत्र में इंद्र और वृत्रासुर का उल्लेख मिलता है , जिसका अर्थ का अनर्थ करते हुए लोगों ने इसे एक कहानी का रूप दे दिया है। जिसके अनुसार त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर ने देवों के राजा इन्द्र को युद्ध में निगल लिया। तब सब देवता भयभीत होकर कांपने लगे और वे अपनी प्राण रक्षा के लिए विष्णु के पास गए । उनकी व्यथा – कथा को सुनकर विष्णु ने उन्हें एक उपाय सुझाया कि मैं समुद्र के फेन में प्रविष्ट हो जाऊंगा। तुम लोग उस फेन को उठा कर वृत्रासुर को यदि मारोगे तो वह मर जायेगा।
स्वामी दयानंद इस मंत्र का तार्किक और बुद्धि संगत अर्थ करते हुए कहते हैं कि इन्द्र सूर्य का ही एक नाम है और वृत्रासुर मेघ को कहते हैं। आकाश में मेघ कभी सूर्य को निगल लेते हैं तो कभी सूर्य अपनी किरणों से मेघों को हटा देता है। दोनों के बीच लुकाछिपी का यह खेल तब तक चलता रहता है जब तक मेघवर्षा बनकर पृथ्वी पर बरस नहीं जाते हैं । फिर उस जल की नदियाँ बनकर सागर में जाकर मिल जाती हैं। स्वामी जी ने इंद्र तथा वृत्र, सूर्य तथा मेघ के दृष्टान्त से राजा के गुणों का उल्लेख किया हैं।

सूर्य का एक नाम इंद्र बताया वेदों ने,
वृत्रासुर का अर्थ लगा लो मेरे प्यारे मेघों से।
सूरज को कभी मेघ निगलते कभी सूर्य मेघों को,
लुकाछिपी के खेल का वर्णन मिलता है हमें वेदों में।।

स्वामी जी के द्वारा किए गए इस प्रकार के अर्थ से वेदों की वास्तविक मान्यता का बोध होता है और साथ ही वेदज्ञान की गहराई और गंभीरता का भी पता चलता है कि उसने विज्ञान को भी किस प्रकार हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया है ?
ऋग्वेद के आधार पर एक कथा प्रसिद्द है कि एक बार वृत्र नामक राक्षस ने सारी त्रिलोकी में उपद्रव मचा रखा था। देवता भी उससे तंग आ गए थे। तब सभी देवता विष्णु जी की शरण में गए। विष्णु जी ने उन्हें बताया कि दधीचि ऋषि की हड्डियों से बने वज्र से वृत्र को मारा जा सकता है। तब देवों की प्रार्थना पर दधीचि ने अपना शरीर त्याग दिया। इन्द्र ने उनकी हड्डियों से वज्र तैयार किया, जिससे वृत्र मारा गया।
स्वामी दयानंद द्वारा इस मंत्र का आधिदैविक अर्थ करते हुए स्पष्ट किया गया है कि दधीचि सूर्य का ही दूसरा नाम है ,जबकि किरणें उसकी हड्डियां हैं और वृत्र का अर्थ है मेघ। ऋषि दयानंद जी कहते हैं कि जब सर्वत्र मेघ आच्छादित हो जाते हैं , तब सूर्य अपनी किरणों से मेघों को छिन्न-भिन्न कर वर्षा कर डालता है । इसी मंत्र का एक और अर्थ है , जो इसकी आध्यात्मिक गहराई का बोध कराता है। जिसके अनुसार इन्द्र का अर्थ है आत्मा, दधिची का अर्थ है मन, दधिची की हड्डियां हैं उच्च मनोवृत्तियां । वृत्र का अर्थ है पाप वासना रूपी विचार। आत्मा अपने मन के उच्च विचारों से पापवासना आदि कुविचारों का नाश कर देता है।
जब हम विज्ञान संगत इन अर्थों पर विचार करते हैं तो वेद की वास्तविकता का पता चलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि वेद विज्ञान कितना परिमार्जित शुद्ध और सनातन है ?
हमारे देश में प्राचीन काल से विज्ञान की अनेक खोजें हुई हैं । जितने आविष्कार भारतवर्ष में हुए उतने संसार के किसी अन्य देश में आज तक नहीं हुए। यह तभी संभव हुआ जब हमने वेद के मंत्रों के वैज्ञानिक और बुद्धि संगत अर्थ समझे , निकाले और उनके अनुसार काम करने का या अनुसंधान आदि करने का संकल्प लिया ।
भारत ने बौद्धिक नेतृत्व देते हुए संसार का मार्गदर्शन किया और अपने इसी महान संस्कार के कारण भारत विश्वगुरु के सम्मानपूर्ण स्थान पर विराजमान हुआ । इस प्रकार विज्ञानवाद में विश्वास रखना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर वैज्ञानिक अनुसंधान और आविष्कारों में रत रहना भारत की मौलिक चेतना का एक विशेष गुण है।

विश्वास किया विज्ञान में मेरे भारत देश ने,
आविष्कार किए थे ढेरों मेरे भारत देश ने।
अनुसंधानों में रत रहकर सोच बदल दी दुनिया की,
नेतृत्व दिया था दुनिया को मेरे भारत देश ने।।

हमने सदैव प्रकाश की अर्थात ऊर्जा की साधना की। हमने तेज को अपना आदर्श माना और सत्य को अपने जीवन का आधार बनाया । वैज्ञानिक उन्नति के साथ – साथ हमने आध्यात्मिक उन्नति भी की। आध्यात्मिक उन्नति का परिणाम यह निकला कि हमारा विज्ञान हमारे लिए कभी भस्मासुर नहीं बना और वह सदा सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रवाहित होता रहा । कहने का तात्पर्य है कि हमने विनाशकारी भौतिक विज्ञान को नहीं अपनाया जैसा कि आज का यूरोप अपना रहा है।
इसका कारण यह है कि भारतीय मनीषा सदा सात्विक रही । उसने सात्विक आहार-विहार तथा आचार – विचार पर ध्यान दिया । अपने आहार – विहार व आचार – विचार को सात्विक बनाकर सात्विक विज्ञान के माध्यम से भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का समन्वय कर जीवन जीने की कला विकसित की । विज्ञान को सात्विकता के साथ मानव हित और प्राणीमात्र के हित में प्रयोग करना और उस पर मनुष्य का नियंत्रण भी स्थापित रखना यह केवल भारतीय मनीषा का और भारतीय चेतना का ही विषय है । शेष संसार आज तक विज्ञान पर शासन नहीं कर पाया । विज्ञान ने ही संसार पर शासन किया और विनाश मचाया ।
आज के संसार को भी हिंदुत्व की मौलिक चेतना के इस संस्कार स्वर को स्वीकार करना होगा कि विज्ञान को सात्विकता के साथ समन्वित कर प्राणीमात्र के हितानुकूल प्रयोग करना मनुष्यमात्र का उद्देश्य होना चाहिए । हमारे ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि भारत ने दुष्ट और पापाचारी का विनाश करने के लिए अस्त्र-शस्त्र की खोज की। उसने कभी शरीफ और गरीब को सताने के लिए तलवार का प्रयोग नहीं किया ।
ये ही विज्ञान का सात्विक सदुपयोग करना है। जितना जिसका अपराध हो उसको उसके अपराध के अनुपात में उतना ही दण्ड हो । विज्ञान अपराध के अनुपात में दंड देने में सहभागी हो ना कि निर्बल और सज्जन शक्ति के विनाश के लिए आइंस्टीन के परमाणु बम की भांति विनाशकारी स्वरूप में लोगों के सामने आए । विज्ञान भय दूर करने वाला हो न कि भय फैलाने वाला हो। विज्ञान आतंकी के हृदय में भय पैदा करने वाला और सज्जन शक्ति के हृदय में से भय को भगाने वाला हो। जब इस प्रकार का विज्ञान हमारे सामने आता है तो वह सात्विक बौद्धिक शक्तियों के द्वारा दोहा गया विज्ञान होता है और यह तभी संभव है जब वेद जैसे पवित्र शास्त्रों की यौगिक व्याख्या हो और इस यौगिक व्याख्या के आधार पर विज्ञान को सहज रूप में प्रवाहित होने दिया जाए।
जिन्होंने दधीचि और वृत्रासुर के गुण, कर्म, स्वभाव को अंगीकार किया, लोगों ने उन देहधारी व्यक्तियों को किसी काल विशेष में इसी नाम से पुकार कर सम्मानित किया। यदि उनका कभी भौतिक अस्तित्व भी रहा है तो इतने ऊंचे चिंतन वाले अपने ऋषि दधीचि और वृत्रासुर का भी हम हृदय से स्मरण करते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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