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मनु की राजव्यवस्था

मनु की राज्य व्यवस्था और रामभरत संवाद भाग-2

गतांक से आगे……..
यह मिलन पारिवारिक है दो भाईयों का मिलन है, पर इसमें चर्चा ऐसी चली है कि जो परिवार को भी और समाज व राजनीति को भी कुछ संदेश दे रही है कि अपने से छल करने वालों के प्रति भी सहज और सरल रहो, वर्तमान में जीओ, और आये हुए अतिथि का सम्मान करो, इसलिए राम अपने भाई भरत से माता कौशल्या का ही कुशलक्षेम नहीं पूछते हैं, अपितु वे माता कैकेयी और सुमित्रा का भी कुशलक्षेम पूछते हैं। साथ ही भरत को यह राजनीतिक उपदेश भी दे जाते हैं कि राजा को अपने बड़ों का आशीर्वाद ही फलीभूत करता है। अत: गुरू और माताओं का सम्मान करते हुए उनसे आशीर्वाद लेते रहना। कैकेयी माता से कोई विद्वेष मत पाल लेना अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। राम इन शब्दों को सीधे भी कह सकते थे-परंतु वे सीधे न कहकर सांकेतिक भाषा में कह रहे हैं।
राम अपने उपदेश को इसी प्रकार आगे जारी रखते हुए कहते हैं-‘भला अग्निहोत्र के समय को स्मरण कराने के लिए तुमने वेदपाठी ब्राह्मण पुरोहित के रूप में नियत कर लिया है।’
महर्षि मनु की यही आज्ञा है कि राजा को बड़ों का सम्मान करना चाहिए और नित्य प्रति अग्निहोत्रादि वेदविहित कर्म करने चाहिएं। इसी बात को राम अपने भाई भरत को समझा रहे हैं कि अग्निहोत्रादि याज्ञिक कार्यों से राजा के दिन का शुभारंभ अच्छे विचारों से होता है, इसलिए तुम्हें इस दिशा में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए यदि नहीं बरती है तो इस कार्य को अवश्य पूर्ण कर लेना।
राम आगे कहते हैं-‘हे तात! वाण विद्या और सब शास्त्रों के ज्ञाता सुधननवाजी को तुम प्रसन्न रखते हो?’
इसमें राम जी भरत को बताना चाहते हैं कि केवल आध्यात्मिक जगत तक ही सिमटकर मत रह जाना, राज्य की रक्षा के लिए शस्त्रपूजन भी आवश्यक है और यह तभी पूर्ण होगा जब तुम शस्त्रनिर्माण के विशेष ज्ञाता सुधन्वाजी जैसे आचार्यों का सम्मान करते रहोगे। यदि तुमने इस कार्य में प्रमाद किया तो राज्य की सैनिक शक्ति दुर्बल हो जाएगी जिससे हमारे शत्रुओं को लाभ होगा। राज्य की सैनिक उन्नति में ही शांति छिपी है क्योंकि आपकी दण्डशक्ति की प्रबलता से किसी पड़ोसी राजा को हमारे राज्य पर चढ़ाई करने का अवसर नहीं मिल पाएगा।
”भला तुम्हारे मंत्री तुम्हें राजकाज चलाने और प्रजा कपट निवारण के लिए अच्छा परामर्श तो देते हैं।”
इसमें भी राम का उपदेश अति उत्तम है। राज्य की सैनिक उन्नति भी तब धरी की धरी रह जाएगी जब राज्य के मंत्री प्रभारी आलसी और राज्यकर्म से मुंह फेरने वाले हों, अथवा राजा को न्यायपूर्ण परामर्श न देकर उसे पथभ्रष्ट करने का कार्य करते हों। अत: राम का परामर्श है कि भरत तुम राजा होकर उत्तम मंत्रियों नीति निपुण लोगों का चयन अपने लिए करना। ये लोग जनहित के कार्यों को करने कराने के लिए सदा सजग और सावधान रहने वाले हों, और तुम्हें सदा ऐसे कार्यों के लिए प्रेरित करते रहें। आगे राम कहते हैं-”भला तुम्हारे मन की समय से पहले तो कोई नही जान लेता है?” क्रमश:

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