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मनु की राजव्यवस्था

मनु की राज्य व्यवस्था और रामभरत संवाद भाग-4

गतांक से आगे……..
एक अध्यापक को अपने उसी शिष्य से विशेष स्नेह होता है जो पढऩे में सदा अग्रणी रहता है, चरित्रवान है, आज्ञाकारी है। जबकि उस अध्यापक को अपने उस शिष्य से कोई स्वार्थ नहीं है पर फिर भी वह उसे ही अधिक स्नेह करता है तो केवल इसलिए कि वह शिष्य कत्र्तव्य परायण है। इसी प्रकार कत्र्तव्य परायण प्रजावत्सल राजा को उसकी प्रजा चाहती है , प्रेम करती है। अत: भाई भरत को राम का उपदेश है कि भैया भरत तुम राजा होकर अपने कत्र्तव्य का पालन करते रहना, अर्थात प्रजावत्सल बने रहना।
अपने संवाद को निरंतर जारी रखते हुए राम आगे कहते हैं :-”चोर और डाकुओं से प्रजा की रक्षा तो तुम अच्छी प्रकार करते हो”
यहां राजा के वास्तविक राजधर्म और राष्ट्रनीति के मर्म को रामजी ने भरत के समक्ष खोलकर रख दिया। सारे उपदेशों को सबसे अधिक स्पष्ट उपदेश राम का यही वाक्य है। इसमें उन्होंने भरत को राजा का राष्ट्रधर्म स्पष्ट कर दिया है कि प्रजाजनों के जानमाल की सुरक्षा करना राजा का कार्य है। (इसे ही आज की राज्य व्यवस्था मानती है) हर एक राजा का चुनाव इसी उद्देश्य से किया जाता है कि वह अपनी प्रजा की समाज के दुष्ट लोगों से रक्षा करेगा और हरसंभव ऐसा प्रयास करेगा जिससे कि जनता को कोई कष्ट ना हो। दुष्टों का अंत करना और प्रजाजनों का कल्याण करना राजा का राष्ट्रधर्म है। राष्ट्रनीति का प्राणतत्व है। यदि राजा अपने इस महान कार्य का निष्पादन नहीं कर पाता है तो वह राष्ट्रधर्म की अवहेलना करता है और ऐसी राष्ट्रनीति जो अपने प्राणतत्व की रक्षा करने में असफल हो जाती है अराजकतावादी हो जाती है। इसलिए तुम्हें चाहिए कि राष्ट्र को अराजकता से बचाये रखने का हरसंभव प्रयास करना।
आगे राम कहते हैं-”अच्छे भोजन अकेले ही तो नहीं खा लेते हो? अपने बांधवों को भी खिलाते हो या नहीं?”
इस अंतिम उपदेश में रामजी भरत को सामाजिक और व्यावहारिक बनने का उपदेश कर रहे हैं। भारत की प्राचीन परंपरा है कि दूसरों को भोजन कराने अर्थात अतिथियों या अन्य आगंतुकों को भोजन कराके ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। अकेले भोजन करना पाप माना जाता है। इस परंपरा को भारत में आज भी लोग अपनाये हुए हैं। भारत के देहात में तो आपको लोग जबरन भोजन (प्रीतिपूर्वक दिया जाने वाला प्रीतिभोज) करा देंगे। भारत की इसी परंपरा का निर्वाह करने के लिए राम भरत को शिक्षा दे रहे हैं। इस प्रकार रामचंद्रजी ने अपने भाई भरत को राजनीति का यह मर्म भरा उपदेश पूर्ण किया। अब बारी भरत की थी। वह जान रहे थे कि पिता तुल्य भाई के उपदेश का अर्थ क्या है? विनम्रता उन्हें मौन रखे हुए थी। इसलिए मर्यादा पुरूषोत्तम के सामने उनके बोलते समय तो चुप रहे पर जैसे ही राम बोलने से बंद हुए तो भरत ने अपने मर्यादित विद्रोह को धर्मसंगत शब्दों में बांधते हुए उल्टे मर्यादा पुरूषोत्तम के सामने ही मर्यादा का प्रश्न खड़ा कर दिया। क्रमश:
हिन्दू विरोध की चल रही है आत्मघाती नीति
 
राजदण्ड का महत्व
राजा के हाथ में दण्ड (डंडा) यदि है तो समाज के दुष्ट और  अत्याचारी लोग अपनी असामाजिक गतिविधियों के प्रति शांत रहते हैं। किंतु यदि राजा देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के साथ घृणित उपहास करते हुए कुछ लोगों की तुष्टि हेतु बहुसंख्यकों के हितों से समझौता करता है, अथवा उनकी उपेक्षा करता है तो राष्ट्र विनाश के भंवर जाल में फंस जाया करता है जैसा कि आज भारत में हो भी रहा है।
भाजपा प्रणीत राजग अर्थात राष्ट्रीय जनता गठबंधन सरकार के द्वारा भारत में पोटा लगाया गया। यह पोटा राजनीतिक विद्वेष को निकालने के लिए राजनीतिज्ञों के विरूद्घ राजनीतिज्ञों के द्वारा ही प्रयुक्त किया जाने लगा। जिन नागों को मसलने और कुचलने के लिए यह लाया गया था वे इसके शिकंजे से मुक्त ही रहे।
अत: पोटा लाकर भी राजशक्ति इच्छाशक्ति और दण्ड शक्ति और भी अधिक हीन और पंगु ही दृष्टिगोचर हुई। इसलिए कांग्रेसनीत यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की सरकार ने अब पोटा को हटा दिया है। वैसे भी यह सरकार तो है ही उन लोगों की जिन्हें राष्ट्र के मूल्यों से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा। इसलिए इनके पास तो पोटा को बनाये रखने तक की भी इच्छा शक्ति का अभाव है।
ये तुष्टिकरण कर सकते हैं-किसी विशेष वर्ग का, और उसके लोगों का। राष्ट्र के मूल्यों का पुष्टिकरण इनके वश की बात नहीं।
 
राष्ट्र की रक्षा शस्त्र से होती है
कुल मिलाकर ये पोटा आदि की बातें करना तो मात्र जनता को मूर्ख बनाने वाली बातें हैं। पोटा से पहले शस्त्र (दण्ड) की आवश्यकता है-इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। राष्ट्र को चेतन हिंदू के संरक्षण, संवद्र्घन और पोषण की आवश्यकता है। जिस राजा के पास, जिस शासक के पास शस्त्र-दण्ड अर्थात डंडा हाथ में आ जाएगा, उसके रहते शास्त्र (राष्ट्र के जीवन मूल्य, राष्ट्र की चेतना का संरक्षण, संवद्र्घन और पोषण) की रक्षा का सपना स्वयं पूरा हो जाएगा। तभी तो कहा गया है कि-
”शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे, तव शास्त्र चर्चा प्रवर्तते।”
अर्थात शस्त्र से राष्ट्र की रक्षा होती है, तभी शास्त्र चर्चा भी संभव है। अत: पोटा लाने या पोटा हटाने का नाटक अब समाप्त होना चाहिए। व्यवहारिक बातें की जाएं। भारत के बहुसंख्यकों की बातें की जाएं। भारत के बहुसंख्यकों के हितों से खिलवाड़ करने का खेल बंद होना चाहिए। हमें ज्ञात होना चाहिए कि जब शासक लोग अपनी चेतना से ही खेलने लगते हैं तो उन्हें समाज और संसार मूर्ख कहता है। क्योंकि वे लोग अपने अस्तित्व को मिटाने का आत्मघाती कार्य कर रहे होते हैं। अत: हिंदू की उपेक्षा उसके हितों के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन कर और इस राष्ट्र की चेतना का प्रतीक उसको मानने के स्थान पर उसकी उपेक्षा व तिरस्कार करने का सरकारी दृष्टिकोण अब बंद होना चाहिए, अन्यथा अलीगढ़ विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर दलवाई द्वारा दिया गया यह बयान यहां एक दिन अवश्य ही गुल खिलाएगा-
‘यदि आज’ नहीं तो 50 वर्ष में, यदि 50 में नहीं तो 100 वर्ष में यह देश अंत में इस्लामी बाढ़ में डूब जाएगा। हमें दलवाई के इस बयान पर भी ध्यान देना होगा-इस प्रकार के बयानों को इक्के-दुक्के लोगों का विचार कहकर उपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। मैं जिन लोगों से मिला हूं उसमें दस में से नौ लोगों का चिंतन यही था।’
हमें मानवतावाद की बात निश्चित रूप से करनी चाहिए, वैसे भी मानवतावाद इस देश की संस्कृति का मूल तत्व है, और हमें इस तत्व से बाहर जाने का कोई अधिकार भी नही है, परंतु अपनी संस्कृति को बचाये रखना और उसके ऊपर मंडरा रहे खतरों पर विचार करना हर विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है। इस विचार को करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम अनावश्यक किसी विपरीत मजहब के लोगों के प्रति अनावश्यक घृणा की बात न करने लगें, इस देश में रहने का सबको अधिकार है, किसी को  भी किसी के अधिकारों का दलन और दमन करने का या ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने का अधिकार नहीं है, जिससे कि किसी एक वर्ग का या तो जीना कठिन हो जाए, या धीरे-धीरे देश से उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।
 
मुस्लिम संख्या के खतरे
आज भारत में मुस्लिम जन्म दर हिंदुओं की अपेक्षा बहुत ऊंची है। जो लोग इसे एक इस आकस्मिक संयोग मानते हैं, वे भूल में हैं। इसके पीछे हिंदू विरोध की वह राजनीति और षडय़ंत्र कार्य कर रहा है, जिसके चलते एक दिन यह राष्ट्र हिंदूविहीन होकर मुस्लिम देश में परिवर्तित हो जाएगा। अत: यह ऊंची मुस्लिम जन्म दर आकस्मिक न होकर पूर्व नियोजित है।
भारत सरकार इस विषय में पूर्णत: निष्क्रिय है, वह इस ऊंची जन्म दर के सच को सदा की भांति कुछ सिरफिरे लोगों की इस सोच का परिणाम मान रही है कि इससे इस देश का देर सवेर इस्लामीकरण हो जाएगा। किंतु उसे ज्ञात होना चाहिए कि जमाते इस्लामी का मुखपत्र रेडियन्स क्या मानता है?

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