हमारे हिन्दू समाज में तैंतीस करोड़ देवों की कल्पना की गयी है। विद्वानों की अपनी-अपनी व्याख्याएं इस विषय में उपलब्ध हैं। हमें इस प्रकरण में प्रचलित व्याख्याओं का उल्लेख यहां विषयांतर के कारण नहीं करना है। आज हमें देवों के भी देव की आराधना करनी है, उसी की उपासना करनी है उसी की आरती उतारनी है ये कहकर कि-”त्वमेव सर्वम् मम् देव: देवा”। वह देवों का भी देव महादेव ‘राष्ट्रदेव’ है। आइये-इस लेखनी की इस पीड़ा पर विचार करें और इस देश का उद्घार करें-
मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारों में, सब पूजा पाठ अलग धर दें।
आज टूटी वीणा के तारों में, आओ नया सुर भर दें।।
हम राष्ट्रदेव की सुनें पुकार, यही उसका मूक आह्वान।
हर शत्रु को मार दूर करें, ले गीता का हम अवलंबन।।
हर वेद मंत्र का संदेश यही, और ऋषियों का उपदेश यही।
परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्कृताम का आदेश यही।।
आज हमें उसी राष्ट्र देव की आराधना करनी है, उसी को भोग लगाना है। उसी के प्रति कृतज्ञ होकर विनम्रता के साथ अपने श्रद्घा पुष्प उसके श्री चरणों में अर्पित करने हैं। क्यों करना है हमें ऐसा?

विश्व की पवित्रतम् भूमि है भारत
इस राष्ट्र की भूमि संसार की पवित्रतम भूमि है। इसकी संस्कृति संसार की पवित्रतम संस्कृति है। इसका दर्शन और वैदिक ज्ञान संसार में अनुपम है। इसलिए हमारी आराधना, उपासना और वंदना का परम केन्द्र यह ‘राष्ट्रदेव’ ही है। 
इसी की मिट्टी में हम खेले हैं, 
इसी मिट्टी में लोटकर हम पले हैं,
इसी ने हमारे सब नाज नखरे झेले हैं, 
यहीं पर हमारे सपने फले और फूले हैं। 
अत: हमारी राष्ट्रभक्ति ही देव भक्ति बन जाए, हमारी आस्था और निष्ठा का केन्द्र राष्ट्रदेव बन जाए-इससे बड़ा जीवनोद्देश्य और कोई नहीं हो सकता।

मानव और दानव में संघर्ष
मेरे प्यारे देशवासियों सुनो और बड़े ध्यान से सुनो। दुनिया में मंदिर वाले प्रसाद बांटते हैं-मंदिर वालों के लिए, मस्जिद वाले प्रसाद बांटते हैं, खैरात बांटते हैं-मस्जिद वालों के लिए किंतु हमारी राष्ट्रभूमि अन्न बांटती है तो वह न तो मंदिर वालों को देखती है और न मस्जिद वालों को-अपितु सभी को बिना किसी पक्षपात के मौन रहकर अन्न दे देती है। एक मां की भांति, ममतामयी हृदय से अपने पुत्रों का ध्यान रखती है। इसलिए कोई ‘आजम’ इसे ‘डायन’ कहकर इसकी कोख को लज्जित न करे, क्योंकि ये मां है। इसे मां जैसा सम्मान दीजिए। युगों-युगों से यह भारत माता हमारा ध्यान रखती आयी है और युग युगांतर तक रखती रहेगी।
हम रहकर भी न रहें, किंतु ये हमारे होने की साक्षी बनी रहेगी, यह हमारे सुकृतों का गुणगान करती रहेगी, आने वाली संतति को हमारे सुकृतों से परिचित कराती रहेगी। जब तक इसका अस्तित्व रहेगा तब तक यह हमारी मातृ-भक्ति को संसार के समक्ष उद्घाटित करती रहेगी, परंतु यह तभी संभव होगा जब हम इसके ऋण से उऋण होने के लिए प्रयास करेंगे, इसके पुत्रों का सम्मान करना सीखेंगे। इसके अतीत के गौरव को संसार के समक्ष रखेंगे और मंदिरों में उसी स्वर्णिम और गौरवमयी अतीत का संकीर्तन करना आरंभ करेंगे।
हम स्मरण रखेंगे कि राम और कृष्ण की यह भूमि गौतम, कणाद, कपिल की भूमि भी है। उनके सुकृतों को उद्घाटित करना आज हमारा परमपुनीत कत्र्तव्य है। यह भारतमाता का मौन आह्वान भी है। आज का हमारा यह कत्र्तव्य आने वाले कल में हमारा अधिकार बन जाएगा तो किसी का कत्र्तव्य बन जाएगा। बात स्पष्ट है कि बीते हुए कल की गौरवमय विरासत को आज हम जीवित रखने का सुकृत यदि करेंगे और उसे शाश्वत आने वाली संतति को सौंपेंगे तो आने वाले कल में हमारे प्रयास को भी कोई नमन करेगा।
इतिहास साक्षी है। इस राष्ट्रदेव की आराधना जिस किसी ने इस रूप में की है उसकी झोली में यश, कीर्ति और प्रसिद्घि के बहुमूल्य मोती इस राष्ट्रदेव ने असंख्य डाले हैं। इतने डाले हैं कि मूल्य का कोई आंकलन नहीं कर सकता। यहां तक कि संख्या और गणना में कंप्यूटर (गणक) तक असफल हो जाएंगे। फिर भी इस राष्ट्रदेव की आराधना को जो लोग घाटे का सौदा मानते हैं वो निरे अज्ञानी हैं और अज्ञांधकार में भटकने वाले निरीह प्राणी हैं। किंतु जो इसकी आराधना को पाप मानते हैं वे पापी तो हैं ही क्योंकि वे नहीं जानते कि कृतज्ञता क्या होती है? राष्ट्राराधना के वास्तविक अर्थ और संदर्भ क्या हैं? हमारा राष्ट्रदेव के प्रति कत्र्तव्य क्या है?
सारा समाज जिस दिन एक राष्ट्रदेव की आराधना में निमग्न हो उसकी आरती उतारने लगेगा-उसी दिन भारत विश्वगुरू बनने की अनिवार्यता को पूर्ण कर लेगा। सवा अरब देशवासियों के ढाई अरब हाथ यदि एक साथ एक दिशा में उठेंगे और एक दिशा में आगे बढ़ेंगे तो निश्चय ही हम अपने हर लक्ष्य को भेद डालेंगे। कहने का अभिप्राय है कि एकता के लिए कार्य किया जाना समय की आवश्यकता है। जिन लोगों ने साम्प्रदायिक आधार पर देश के वातावरण को दूषित और प्रदूषित करने का पाप किया है उन्होंने हमारी एकता को और राष्ट्रीय अखण्डता को भारी क्षति पहुंचाई है। अब समय आ गया है कि हमें ऐसी मानसिकता के लोगों के उद्देश्यों को असफल करने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। ये वही लोग हैं जो हमसे आसाम को अलग करना चाहते हैं, काश्मीर को अलग करना चाहते हैं और कभी ये पंजाब में देश की एकता और अखण्डता को चोट करते दीखते हैं तो कभी ये देश के दूसरे प्रदेशों में ऐसी ही राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में हमें लगे दिखाई देते हैं। इन्हें अलग-थलग करने के लिए हर व्यक्ति को अपना राष्ट्रीय दायित्व पहचानना चाहिए-मेरा मानना है कि यह अपने राष्ट्रीय दायित्व को समझ लेना और हृदय से उस पर अमल करना कि एक राष्र्ीदेव की आराधना करना होगा। हमें देखना चाहिए कि व्यक्तिगत स्तर पर मैं स्वयं इस दिशा में कितना कार्य कर रहा हूं?

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