फतवों की राजनीति में सुराज्य की कल्पना कैसे साकार होगी

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावों में धर्म, जाति, सम्प्रदाय या वर्ग विशेष के नाम पर वोट मांगने को या वोट देने के लिये प्रेरित करने को भ्रष्ट प्रक्रिया करार देकर भारतीय लोकतंत्र में पहली सबसे खतरनाक बीमारी को दूर करने का प्रयास किया है। बावजूद इसके दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने बहुजन समाज पार्टी को वोट करने की अपील करके न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को हनन किया है बल्कि संविधान की भी अवमानना की है।
बात केवल बुखारी की ही नहीं है, हिन्दू एवं अन्य धर्मगुरु भी ऐसे ही फतवे और अपीलें जारी करके लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करते रहे हैं। पंजाब चुनावों में भी सिख समुदाय के एक प्रभावी एवं अच्छी पकड़ रखने वाले धर्मगुरु की तरफ से भी अकाली दल को समर्थन की बात सामने आई थी। लोकतांत्रित अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा के लिए राजनीति में धर्म का हस्तक्षेप बंद होना चाहिए। भारतीय संविधान में इस तरह के फतवों और अपीलों की कोई जगह नहीं है। फिर इमाम बुखारी को यह अधिकार किसने दिया है? लोकतंत्र में भय कानून का होना चाहिए, व्यक्ति का नहीं।
धर्म जब अपनी मर्यादा से दूर हटकर राजनीति में घुलमिल जाता है तो वह विष से भी अधिक घातक बन जाता है। जब-जब धर्म का राजनीति के साथ गठबन्धन कर उसे चाहे फतवे के रूप में हो या अपील के रूप में जनता पर थोपा गया, तब-तब देश में तबाही मची है। राजनीति अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिये स्वार्थ एवं संकीर्णता के कंधे सवारी कर लेती है, लेकिन धर्म का इनसे दूर का भी रिश्ता नहीं है। इसलिये राजनीति में धर्म की सियासत बंद होनी चाहिए। लोकतांत्रित अधिकारों का गला घोंटने वाले ऐसे लोगों के खिलाफ संवैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए एवं जन-चेतना को जागृत किया जाना चाहिए।
धर्मगुरु अपने अनुयायियों से अपने ही धर्म या स्वार्थ से जुड़े राजनीतिक दलों को वोट देने की अपीलें करने लगे, फतवे जारी करने लगे और राजनीति दल वर्ग, सम्प्रदाय और जातियों के वोट बैंक में आकर सिमटने लगे, तो हमारी धर्मनिरपेक्षता कैसे कायम रहेगी? स्वस्थ लोकतंत्र की परिधि में किसी धर्म विशेष के प्रति लगाव अपेक्षित नहीं होता है और यदि हम ज्यादा गहराई में जाएं तो धर्म का संबंध व्यक्तिगत या निजी पालना से होता है। प्रत्येक व्यक्ति को देश का संविधान अपने धर्म या मजहब का पालन करने या उसके प्रचार-प्रसार का अधिकार तो देता है किन्तु धर्म को सामाजिक चेतना के भाव में अवरोध पैदा करने की इजाजत नहीं देता। लेकिन राजनीति से जुड़ी विसंगतियों ने धर्म को भी नहीं बख्शा है। यही कारण है कि भारत में गॉड और गॉडमैन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं। जो चुनावी आचार संहिता में छेद करने से भी बाज नहीं आते। लगता है किसी भगवान को इस स्थिति से बचाने के लिये आना होगा।
लोकतांत्रिक मूल्यों एवं उसकी व्यवस्थाओं का गला क्यों घोंटा जाता है? आचार संहिता का अनुपालन कराने वाली संस्थाएं मौन क्यों हो जाती हैं? धर्मगुरुओं के खिलाफ कानूनी हथौड़ा कमजोर क्यों पड़ जाता है? ये सवाल जब-जब चुनाव होते हैं और जब-जब धर्मगुरु राजनीति में जबरन हस्तक्षेप की कोशिश करते हैं, खड़े होते हंै। हर बार अनुत्तरित इन सवालों के जबाव आखिर कौन देगा? राजनीतिक संस्थाओं का पतन हो चला है। उनके भीतर इतना आत्मबल नहीं है कि वह अपनी नीतियों और विचारों से लोगों को प्रभावित कर एक अच्छे लोकतंत्र की स्थापना में भूमिका निभाएं। धर्म, वर्ग और जाति से लोकतंत्र का भला होने वाला नहीं है। बुखारी को जिस काम के लिये शाही इमाम बनाया गया है, उसकी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
धर्मगुरुओं की तथाकथित राजनीतिक जिजीविषा ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर किया है। जिसका नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में एक तरफ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का क्षरण हुआ तो दूसरी तरफ वर्गवाद और जातिवाद का बोलबाला शुरू हो गया। हद तो यह हुई कि कुछ राजनीतिक दल खुलेआम कुछ विशिष्ट जाति, धर्म एवं वर्ग के लोगों को ही सम्बोधित करके कहने लगे कि उन्हें दूसरी जाति, धर्म एवं वर्ग के वोट?नहीं चाहिएं। यह देश को जोडऩे का नहीं, तोडऩे का षडयंत्र है। इस षडयंत्र को निस्तेज करने के लिये सबसे पहले चुनाव आयोग को ध्यान देना चाहिए था। चुनाव आयोग की कोशिशें भी तब मात्र दिखावा बन जाती है जब न केवल चुनाव बल्कि मंत्री पदों का वितरण भी जाति और धर्म के आधार पर धडल्लेे से होता है।
धर्मगुरु हो या राजनीति के शीर्ष व्यक्तित्व- ये लोग जानते नहीं कि वे क्या कह रहे हैं। उससे क्या नफा-नुकसान हो रहा है या हो सकता है। वे तो इसलिए बोल रहे हैं कि वे बोल सकते हैं, यह बताने के लिए कि उनको बोलने की आजादी प्राप्त है, यह बताने के लिए कि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए। और आज जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं वे तथाकथित ताकतवर हैं। जिनके पास खोने के लिए बहुत कुछ मान, प्रतिष्ठा, छवि, सिद्धांत, पद, सम्पत्ति, सज्जनता है, वे कमजोर हैं। यह वक्त की विडम्बना है, यह राजनीति की विडम्बना है।
तथाकथित ताकतवर किस्म के लोग राजनीति में हैं, सत्ता में हैं, सम्प्रदायों में हैं, धर्म में हैं, पत्रकारिता में हैं, लोकसभा में हैं, विधानसभाओं में है, गलियों और मौहल्लों में तो भरे पड़े हैं। आये दिन ऐसे लोग, विषवमन करते हैं, प्रहार करते रहते हैं, चरित्र- हनन करते रहते हैं, सद्भावना और शांति को भंग करते रहते हैं, फतवे जारी करते हैं। उन्हें भाईचारे और एकता से कोई वास्ता नहीं होता। ऐसे घाव कर देते हैं जो हथियार भी नहीं करते। किसी भी टूट, गिरावट, दंगों व युद्धों तक की शुरूआत ऐसी ही बातों से होती है।
आज बुखारी,, मायावती, मुलायम सिंहज्ज् ये तो कुछ नाम हैं जो अखबारों में छपते हैं। इनका प्रतीक के रूप में उल्लेख कर दिया वरना ऐसी शख्सियतें तो थोक के भाव बिखरी पड़ी हैं। हर दिखते समर्पण की पीठ पर स्वार्थ चढ़ा हुआ है। इसी प्रकार हर अभिव्यक्ति में कहीं-न-कहीं स्वार्थ है, किसी न किसी को नुकसान पहुंचाने की ओछी मनोवृत्ति है। आज हम राजनीति में नायक कम खलनायक ज्यादा हैं। इन्हीं लोगों ने वोट बैंक की राजनीति का श्रीगणेश किया। इसके बाद राजनीति का स्तर और इसमें प्रवेश करने वाले लोगों का व्यक्तिगत स्तर इसी अनुपात से घटने की बजाय और बढ़ा, वैसे-वैसे ही राजनीति में भी धर्म का हस्तक्षेप बढ़ा और हालात यह हो गए हैं कि एक ही धर्म के मानने वालों के बीच बनी जातियों और उपजातियों के नाम पर भी राजनीति शुरू हो गई। परिणामस्वरूप जाति आधारित दल गठित होने लगे, वर्ग आधारित, सम्प्रदाय आधारित सियासी पार्टियां चुनावी मैदान में कूदने लगीं और हद तो यह हो गई कि समाज के विभिन्न वर्गों के आधार पर ही राजनीतिक दल गठित होने लगे, जिससे भारत की संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का कलेवर पूरी तरह बिखर गया।
कुछ समस्याएं पुरानी हैं, कुछ मुद्दे पुराने हैं पर उन्होंने नए आकार-प्रकार ले लिए हैं। उनमें से एक है-साम्प्रदायिकता। संविधान में धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना का जिक्र है, पर वास्तविक रूप में यह स्थापित हो नहीं सका। संविधान का यह शब्द पारिभाषित तो कई प्रकार से हुआ पर इसे सही अर्थ कभी नहीं मिला और न ही इस शब्द की भावना संविधान के बाहर निकल कर राष्ट्रीय जीवन में प्रतिष्ठापित हो सकी। पहले जुलूसों, पार्टियों तक साम्प्रदायिक कट्टरता सीमित थी। फिर इसी आधार पर देश का विभाजन हुआ। तब सडक़ों पर इसने खुली हिंसा का रूप ले लिया। तब से आज तक यह आग सुलगती रही, धुंआ उठता रहा। आजादी के बाद लाखों लोगों की धर्म और जाति के नाम पर हत्या कर दी गई या जीते-जी मरे समान होकर रह गए हैं पर यह आग बुझने का नाम नहीं ले रही है। और अब यह चुनाव जीतने का सशक्त आधार भी बनता जा रहा है। जबकि हमारे कानून में धर्म के प्रचार की छूट है, अधिकार है पर धर्म के नाम पर, साम्प्रदायिकता के आधार पर वोट लेने या मांगने की नहीं। साम्प्रदायिकता से कोई राजनैतिक दल भी शुद्ध रूप से परे रहीं है। कितने भी ऊंचे आदर्शों वाली पार्टी हो, हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए प्रत्याशी चुनने का मापदंड सम्प्रदाय व जाति ही होती है। अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिये किसी-न-किसी धर्मगुरु से फतवे एवं अपील जारी करवाने का प्रचलन-सा चल पड़ा है, देश के विभाजन का जो आधार रहा, वह विभाजन के साथ समाप्त नहीं हुआ अपितु अदृश्य रूप में विभाजन का बड़ा रूप लेकर करोड़ों के दिमागों में घुस गया। इसलिए आज जितने दंगे सडक़ों पर होते हैं, उससे ज्यादा दिमागों में होते हैं। ऐसे दिमाग नये-नये नारे गढक़र साम्प्रदायिकता और जाति के आधार पर राजनीति चला रहे हैं। न नेता इनको छोड़ पाये हैं, न मतदाता समझ पाये हैं। अब जबकि पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, सोचा था कि इन पांच राज्यों के चुनाव अधिक स्वच्छ एवं धर्म-जाति मुक्त होंगे पर जिस प्रकार पार्टियों ने अपने परचमों पर रंग चढ़ाना शुरू किया है, जिस प्रकार विचारों के दो सिरों को मिलाना शुरू किया है, जिस प्रकार सिद्धांतों को तिलांजलि देकर गठबंधनों का दौर शुरू किया है, जिस प्रकार धर्मगुरुओं से फतवे एवं अपीलें जारी करवाई जा रही है, लगता नहीं कुछ नया उभरकर आयेगा। लोक राज्य, स्वराज्य, सुराज्य, रामराज्यज्.. का सुनहरा स्वप्न ऐसी नींव पर कैसे साकार होगा? यहां तो सब अपना-अपना साम्राज्य खड़ा करने में लगे हैं।

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