मन के संग जब तन जुड़ै, तब होवै तल्लीन

बिखरे मोती-भाग 171

गतांक से आगे….
सूर्य तो निरंतर दीप्तिमान है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण जो भूभाग सूर्य के सामने होता है वहां दिन होता है और जिस भूभाग पर सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाती हैं वहां रात होती है। ठीक इसी प्रकार जीव (मैं अर्थात आत्मा) ब्रह्म, प्रकृति अनादि हैं। इनकी कभी न तो मृत्यु होती है और न ही कभी जन्म होता है। आत्मा जब शरीर धारण करती है तो उसे जन्म कहते हैं, और जब शरीर को त्यागती है तो उसे संसार मृत्यु की संज्ञा देता है। इसलिए मैं अर्थात आत्मा जन्म-मरण से परे है। इसीलिए भगवान कृष्ण ‘गीता’ के द्वितीय अध्याय के तेरहवें श्लोक में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं :-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनंदहतिपावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।

अर्थात आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता क्योंकि शस्त्र की वहां तक पहुंच नहीं है, अग्नि इस आत्मा को जला नहीं सकती क्योंकि अग्नि भी वहां तक पहुंच नहीं सकती है, जल इस आत्मा को गीला अथवा गला नहीं ंसकता क्योंकि जल भी वहां तक पहुंच नहीं सकता है, वायु इस आत्मा को सुखा नहीं सकती क्योंकि वायु भी वहां पहुंच नहीं सकती है। भाव यह है कि जितने भी परिवर्तन होते हैं वे शरीर में होते हैं। शरीरी (मैं अथवा) में नहीं।
मन के संग जब तन जुड़ै,
तब होवै तल्लीन।
मन सोवै जागै पुरूष,
तब हो शोक-विहीन ।। 1100 ।।
व्याख्या :-
जब हमारी मानसिक और शारीरिक शक्तियां किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होती हैं तो उस अवस्था को ‘तन्मयता’ कहते हैं। कोई नर्तकी अथवा नर्तक हो, चिंतक अथवा साधक हो अपने-अपने विषय की गहराई में तब ही उतरता है, जब तन्मय हो जाता है। तब उसे समय, स्वयं तथा स्थान का भी भान नहीं रहता है। तत्क्षण वह अपने विषय अथवा कला के चर्मोत्कर्ष पर होता है। भक्ति की दृष्टि से यदि इसे देखें तो, ‘मीरा’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। ध्यान रहे, भक्ति के क्षेत्र में यह उच्चतम और उत्कृष्टतम अवस्था है। जैसे ही मन उपशम होता है, वह परमात्मा के स्वरूप में ठहर जाता है। इस अवस्था को कोई बिरला ही प्राप्त होता है। यह अवस्था तभी प्राप्त होती है जब मन विषय विकारों से शांत हो जाए और आत्मा स्वविवेक अथवा प्रज्ञा से प्रकाशित हो जाए अर्थात आत्मपरिष्कार हो जाए। जो इस उत्कृष्टतम अवस्था तक पहुंचना चाहते हैं, वे सर्वदा इस क्रम को याद रखें-इन्द्रियों से मन उत्तम है, मन से बुद्घि उत्तम है, बुद्घि से महत तत्त्व उत्तम है, महत तत्त्व से अव्यक्त अर्थात प्रकृति उत्तम है, अव्यक्त से पुरूष अर्थात ब्रह्म उत्तम है, वह व्यापक है, अलिंग है, उसे जानकर जीव शोक विहीन हो जाता है अर्थात दुखों से मुक्त हो जाता है अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है। आत्मा का यह ‘आप्तकाम’ रूप है, जिसमें सब कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। ‘ब्रह्मदारण्यक उपनिषद’ के ऋषि ने इसे ‘अकाम’ रूप और ‘अशोक’ रूप भी कहा है अर्थात जिसमें कोई शोक नहीं रहता है। भगवान कृष्ण ने गीता में इस अवस्था को ब्रह्मनिष्ठ कहा है। ‘छान्दोग्य-उपनिषद’ के ऋषि ने इसे ‘तरित शोकम्आत्मवित्’ कहा है-अर्थात जो आत्मा को जान जाता है, वह शोक-सागर से तर जाता है, यानि कि भव-बंधन से मुक्त हो जाता है। इसलिए हे मनुष्य! अपने मन को समय रहते विषय विकारों से शांत कर और आत्मा की अपरिमित शक्तियों अर्थात ‘दैवी संपदा’ का जागरण कर।
आत्मवित् बन, तभी तुझे सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी, उस प्रेमानंद की रसानुभूति होगी। आत्मवित् बनने के लिए साधक को उपासना अर्थात प्रक्षालन के विभिन्न सोपानों से परिष्कृत होकर गुजरना होगा, इस संदर्भ में पथप्रदर्शक है :-देवऋषि नारद और महर्षि सनत्कुमार का संवाद-छान्दोग्य उपनिषद में आख्यायिका आती है कि एक बार सनत्कुमार अर्थात सदा कुमार रहने वाले ऋषि के पास देवर्षि नारद पहुंचे और उनसे कहा-हे भगवन! मैंने आप सरीखे महात्माओं से सुना है ‘तरित शोकम् आत्मवित्’ अर्थात जो आत्मा को जान जाता है, वह तर जाता है। मैं शोक-सागर में डूबा जा रहा हूं, आप मुझे इससे पार उतारिये।
क्रमश:

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