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भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 29 संसार के सबसे पहले पत्रकार : महर्षि नारद

संसार के सबसे पहले पत्रकार : महर्षि नारद

मन की गति को जो समझ ले और उस पर अधिकार करके जितनी तीव्रता से कहीं मन पहुंचने में सक्षम हो पाता है ,उतनी तीव्रता से अपने आपको उस स्थान पर उपस्थित करा दे, उसे नारद कहते हैं। महर्षि नारद को संसार का सबसे पहला पत्रकार कहा जाता है। उन्हें पत्रकार की या नारद की उपाधि ऐसे ही नहीं मिल गई थी, इसके लिए उन्होंने घोर तपस्या की थी। सचमुच बड़ी गहन साधना के उपरांत मनुष्य को कहीं जाकर मन की गति पर अधिकार प्राप्त होता है। जिसे हमारे यहां योग दर्शन में ईश्वरप्रणिधान कहा गया है ,उसे हमारे संस्कृति के महानायक राष्ट्रनिर्माता योगेश्वर श्री कृष्ण जी द्वारा गीता में शरणागति कहा गया है। इसी को अनन्य भक्ति कहा गया है तो इसी को महर्षि दयानंद जी महाराज ने उपासना कहा है। जब किसी की अनन्य भक्ति ईश्वरप्रणिधान या शरणागति अथवा उपासना फलीभूत होती है तो उसे अनेक प्रकार के विशेषणों से लोग सम्मानित कर बोलने लगते हैं। कहने का अभिप्राय है कि अपनी अनन्य उपासना से जिस लोक में नारद जी ने जाने का आनंद उठाया उसी के फलस्वरूप लोगों ने उन्हें ‘नारद’ कहकर सम्मान के साथ संबोधित करना आरंभ किया।
देवर्षि नारद का नाम आते ही हमें ऐसा आभास होता है कि जैसे कोई दिव्य पुरुष की दिव्यात्मा धर्म के प्रचार और लोक कल्याण के कार्य में लगी हुई सर्वत्र भ्रमण कर रही है। सर्वत्र घूम घूमकर यह देखना कि कहां धर्म की हानि हो रही है और कहां धर्म के अनुसार आचरण हो रहा है ? – यह किसी नारद का ही कार्य हो सकता है। इसके पीछे केवल घुमक्कड़ प्रवृत्ति ही कारण नहीं है , अपितु इसके पीछे लोक कल्याण की भावना धर्म के प्रचार प्रसार की उत्तुंग हार्दिक पवित्रता और स्वसंस्कृति, स्वधर्म, स्वराष्ट्र और स्वराज्य की उपासना का डिंडिम घोष कार्य करता है। सर्वत्र सभी लोकों में निरुद्देश्य घूमना समय को नष्ट करना होता है, पर जब यह घूमना किसी उद्देश्य के साथ जुड़ जाता है तो इसके साथ सार्थकता स्वयं ही आकर खड़ी हो जाती है। यदि कोई बच्चा भी निरुद्देश्य इधर-उधर घूमता है तो उसे भी परिवार के लोग आवारा कहने लगते हैं ,इसलिए नारद जी जैसे महापुरुषों के विषय में ,उनकी घुमक्कड़ी के विषय में सोचने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि उनका घूमना किसी भी प्रकार की आवारागर्दी ना होकर संसार के कल्याण के पवित्र उद्देश्य के साथ जुड़ी हुई थी। उन्हें ऋषिराज के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वह मुनियों के देवता थे।

लोकसाधना होती ऊंची और लोक का ही चिंतन हो,
लोक का ही हो आराधन और पवित्र सारे साधन हों।
अनुराग धर्म से हो गहरा, संस्कृति का जो साधक हो,
नारद होता है वही जो लोकहित में रहता मगन हो ।।

     श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 26 वें श्लोक में  भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि - "देवर्षीणाम् च नारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं" तो समझ लेना चाहिए कि नारद ऋषियों में कितना ऊंचा स्थान रखते हैं? अपने ज्ञानबल से नारद जी ने सब लोकों में पहुंचने की क्षमता प्राप्त की। उनके ज्ञान की ऊंचाई को समझ कर ही अनेक मनीषी ऋषि उनसे अनेक विषयों पर मंत्रणा किया करते थे । यही कारण है कि उन्हें अक्सर ऋषि मनीषियों से घिरा हुआ दिखाया जाता है।

हमारे यहां मन के विज्ञान को नापने के लिए विभिन्न कालखंडों में अनेक ऋषियों ने गहन तपस्या की है। इसलिए नारद किसी एक काल में हुए हों, यह नहीं कहा जा सकता। नारद हर वह ऋषि बन जाता था जो अपनी साधना में नारद की पात्रता को प्राप्त कर लेता था। यही कारण है कि अनेक काल खंडों में हमें कई नारद दिखाई देते हैं।
‘महाभारत’ के सभापर्व के पांचवें अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है – “देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानों की शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबल से समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, क‌र्त्तव्य-अक‌र्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं।”

दिव्य गुणों के भंडार हमारे नारद थे,
सदाचार के आधार हमारे नारद थे।
सबके हितकारी योगी और उपदेशक,
जग के पहले पत्रकार हमारे नारद थे।।

महाभारत में नारद के जिस दिव्य स्वरूप की झलक उपरोक्त विशेषणों के माध्यम से दिखाई गई है, उनसे पता चलता है कि उनका व्यक्तित्व कितना दिव्य और भव्य था ? वे वेद-ज्ञान के दिव्य दिवाकर थे। वे उपनिषदों के प्रकांड पंडित थे और उनके ब्रह्म ज्ञान के प्रचारक और प्रसारक थे। उनके भीतर न्याय और धर्म के तत्व को समझने और उसका यत्र- तत्र – सर्वत्र प्रसार करने की अद्भुत क्षमता थी। वे शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकांड पंडित थे। उनकी वक्तृत्व शक्ति अत्यंत गजब की थी। उनका महा मेधावी व्यक्तित्व उन्हें एक अलग ही आभा प्रदान करता था। आज की युवा पीढ़ी के समक्ष नारद जी को एक विदूषक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे आगे उनके दिव्य व्यक्तित्व के विषय में कुछ नहीं बताया जाता। भारत की संस्कृत और संस्कृति को मिटाने के अभियान में लगे जिन लोगों के द्वारा ऐसा किया जा रहा है , वह वास्तव में राष्ट्र के शत्रु हैं।
‘नारदसंहिता’ के नाम से उपलब्ध इनके एक ग्रन्थ में ज्योतिषशास्त्र पर गहनता से प्रकाश डाला गया है। देवर्षिनारद भक्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। ‘छान्दोग्यपनिषद्’ में नारद के बारे में बताते हुए उनका नाम सनत्कुमारों के साथ लिखा गया है। कुछ स्मृतिकारों ने नारद का नाम सर्वप्रथम स्मृतिकार के रूप में माना है।
महर्षि नारद के ग्रंथों का निचोड़ निकालते हुए विद्वानों की मान्यता है कि इनके द्वारा रचित ‘नारद स्मृति’ में व्यवहार मातृका अर्थात न्यायिक कार्यवाही और सभा अर्थात न्यायालय सर्वोपरि माना गया है। इसके अतिरिक्त इस स्मृति में ऋणाधान ऋण वापस प्राप्त करना, उपनिधि अर्थात जमानत, संभुय, समुत्थान या सहकारिता, दत्ताप्रदानिक अर्थात करार करके भी उसे नहीं मानने, अभ्युपेत्य-असुश्रुषा अर्थात सेवा अनुबंध को तोड़ना है।
वेतनस्य अनपाकर्म अर्थात काम करवाके भी वेतन का भुगतान नहीं करना सम्मिलित है। ‘नारद स्मृति’ में अस्वामी विक्रय अर्थात बिना स्वामित्व के किसी चीज का विक्रय कर देने को दंडनीय अपराध माना है। विक्रय संप्रदान अर्थात बेच कर सामान न देना भी अपराध की कोटि में है। इसके अतिरिक्त क्रितानुशय अर्थात खरीदकर भी सामान न लेना, समस्यानपाकर्म अर्थात निगम श्रेणी आदि के नियमों का भंग करना, सीमाबंद अर्थात सीमा का विवाद और स्त्रीपुंश योग अर्थात वैवाहिक संबंध के बारे में भी नियम-कायदों की चर्चा मिलती है। नारद स्मृति में दायभाग अर्थात पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार और विभाजन की चर्चा भी मिलती है। इसमें साहस अर्थात बल प्रयोग द्वारा अपराधी को दंडित करने का विधान भी है। ‘नारद स्मृति’ वाक्पारूष्य अर्थात मानहानि करने, गाली देने और दण्ड पारूष्य अर्थात चोट और क्षति पहुँचाने का वर्णन भी करती है। नारद स्मृति के प्रकीर्णक में विविध अपराधों और परिशिष्ट में चौर्य एवं दिव्य परिणाम का निरूपण किया गया है। नारद स्मृति की इन व्यवस्थाओं पर मनुस्मृति का पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।”

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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