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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से राजनीति

मणिपुर में भाजपा सरकार का गठन

पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य में भाजपा ने पहली बार अपनी सरकार बनाई है। यहां पर यद्यपि कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, परंतु भाजपा का उछाल यह स्पष्ट कर रहा था कि यहां की जनता ने अपना समर्थन भाजपा को दिया है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भाजपा और कांग्रेस से अलग जितने भी राजनैतिक दल रहे लगभग उन सभी ने अपना समर्थन भाजपा को देकर उसकी पहली सरकार इस प्रांत में बनवाना सुनिश्चित कर दिया। 
मणिपुर राज्य का अपना स्वर्णिम इतिहास है। पांडव जब अपना 12 वर्षीय वनवास भोग रहे थे तो इस अवसर का सदुपयोग उन्होंने भारत भ्रमण में किया। अपनी यात्राओं के क्रम में वे  पूर्वोत्तर भारत भी गये थे। महाभारत की साक्षी है कि पांडवों ने नागा-प्रदेश और मणिपुर की यात्रा भी की थी। मणिपुर प्रवास के समय में पांडव वीर अर्जुन ने वहां की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था, उन दोनों को बभ्रुवाहन नाम का एक पुत्र हुआ जो बड़ा पराक्रमी था। अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन बाद में कई वर्षों तक मणिपुर के शासक रहे। पांडववंशी शासक के वहां राज करने का प्रभाव भी स्पष्ट दिखता है, मणिपुरी भाषा साहित्य की दृष्टि से अत्यंत प्रभावी मानी जाती है, इतना ही नहीं मणिपुर की नृत्य शैली, वहां की सामाजिक व्यवस्था और महिला प्रधान समाज भी अत्यंत रोचक प्रभाव उत्पन्न करता है। इस प्रकार भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पूंजी को सहेजने में इस मणिपुर राज्य का महत्वपूर्ण योगदान है। यह अत्यंत गौरव का विषय है कि भारत के पिछले लगभग सवा पांच हजार वर्ष के इतिहास की खट्टी मीठी स्मृतियों को इस प्रांत ने बड़ी उत्तमता से सहेजकर रखा है। 
मणिपुर का प्राकृतिक सौंदर्य भी देखते ही बनता है, इसके प्राकृतिक सौंदर्य ने ही इस प्रांत को मणियों अर्थात चमकीली धातुओं का प्रदेश बनाया है अर्थात एक ऐसा प्रदेश जो किसी भी आगंतुक को अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। मणिपुर पूर्वोत्तर में वैष्णव पंथ प्रसार का भी बड़ा केंद्र रहा है, वहां के एक जिले का नाम विष्णुपुर है जहाँ भगवान विष्णु का छ: सौ वर्ष पुराना मंदिर है। इम्फाल में गोविन्द देव जी का एक विशाल मंदिर है जहाँ हर वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
गौरवान्वित करने वाली इतनी चीजों से भरा मणिपुर भी दुर्भाग्य से उन्हीं संकटों से घिरा है जिससे आज पूरा का पूरा पूर्वोत्तर जूझ रहा है। मणिपुर भौगोलिक रूप से पहाड़ी तथा मैदानी दो हिस्सों में बंटा है और संविधान के कुछ प्रावधानों के अनुसार पहाड़ी लोगों को मैदानी लोगों की तुलना में कुछ विशेष सुविधायें प्राप्त हैं, इसलिये राष्ट्रविरोधी शक्तियों ने इस बात को आधार बना लिया और वहां मैदानी और पहाड़ी का संघर्ष खड़ा कर दिया। फिर इनकी शह पर चर्च ने पहाड़ी इलाकों में जमकर धर्मांतरण करवाया। जब धर्मान्तरितों की संख्या बढ़ गई तो भाषा विवाद पैदा कर दिया। मैदानी लोगों की इच्छा थी कि राज्यभाषा के रूप में मणिपुरी स्वीकृत की जाये वहीं चर्च के बहकावे पर धर्मान्तरित हो चुके लोगों ने ये स्थान अंग्रेजी को देने की मांग उठा दी। जिसके कारण संघर्ष बढ़ता ही चला गया। जब पहाड़ी लोगों का धर्मांतरण पूरा हो गया तो फिर चर्च ने अपनी दृष्टि मैदानी क्षेत्रों की ओर कर दी। सदियों से हिन्दू धर्म के वैष्णव पंथ को मान रहे भोले-भाले लोगों को ये सिखाया गया कि तुम लोग हिन्दू नहीं हो, अपितु मैतीयी हो। उन्हें यह भी बताया गया कि मैतीयी हिन्दू धर्म से न केवल भिन्न है, अपितु अपनी अलग  परंपरा और संस्कृति भी रखता है, हिन्दू हमलावरों ने तुम पर हिन्दू धर्म थोप रखा है। अपने इस विषैले प्रचार को फैलाने के लिये इन्होनें मैतीयी मरुप नाम से एक संस्था बना रखी है-जो दिन-रात हिन्दू विश्वासों पर आधात करती है तथा वहां के वैष्णवों को हिन्दू धर्म के विरूद्घ भडक़ाती है। इस संस्था के उकसावे पर वहां 60 के दशक में भगवत गीता जलाने की भी घटनायें हुई थीं। राष्ट्रवादी विचार वाले लोग मणिपुर की समस्याओं को न तो समय रहते पहचान पाये और न ही उसके लिये कुछ करने को आगे आ सके। इसलिये मैतीयी मरुप का विष मणिपुर में निरंतर फैलता ही चला गया, जिसकी परिणति अलगाववाद और भारत-विरोध के रूप में सामने आयी। मणिपुर पूर्वोत्तर का सबसे अशांत प्रदेश है जहाँ आज कम से कम दो दर्जन आतंकी संगठन सक्रिय हैं, यहाँ संभवत: ही कोई बैंक शाखा होगी जिसे लूटा न गया हो, ये उग्रवादी संगठन हर विकास कार्य में रोड़ा डालते हैं और उद्योग-धंधे लगने नहीं देते। 
मणिपुर की समस्याओं का अंत यहीं नहीं है, नागालैंड में सक्रिय एन0 एस0 सी0 एन0 का उग्रवादी नेता मुइवा मणिपुर का ही रहने वाला है जिसे चर्च ने खड़ा किया था। एन0 एस0 सी0 एन0 की गतिविधियों के चलते आये दिन मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी रहती है जिसके कारण दैनिक आवश्यकताओं के सामानों के दाम आसमान छूते रहते हैं, पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों की तरह मणिपुर भी बांग्लादेश से हो रही निरंतर घुसपैठ से अभिशप्त है, जिनकी कुल आबादी आज मणिपुर में 25 प्रतिशत से भी अधिक हो चुकी है। मणिपुर की अधिकांश उपजाऊ भूमि अब इन घुसपैठियों के कब्जे में है। अवैध आव्रजन के चलते यहाँ आई0एस0आई0 भी अपना व्यापक आधार बना चुकी है।
कभी द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण मणिपुर में स्यमंतक मणि की खोज करते हुए आये थे और जब यहाँ से गये थे तो इस प्रदेश से वैष्णव भक्ति धारा बह निकली थी अब कृष्ण के राज्य में जन्मे एक राजनेता ने पूरब के इस स्वर्ग में कमल खिलाया है तो आशा है कि अशांत मणिपुर फिर से शांत होगा और अपने उसी गौरव को पुन: प्राप्त करेगा जिसकी कामना हर राष्ट्रप्रेमी को है। 
ऐसी परिस्थितियों में हमें अपेक्षा करनी चाहिए कि भाजपा की मणिपुर में बनी पहली सरकार भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास की विकृतियों को शुद्घ करने की दिशा में ठोस कार्य करेगी, और स्वतंत्रता के उपरांत भारत के इस महत्वपूर्ण प्रांत में जितनी क्षति ईसाई मिशनरीज कर चुकी हैं, उसकी पूर्ति करने का गंभीर प्रयास किया जाएगा। बहुत ही गहरे षडय़ंत्र के अंतर्गत पूर्वोत्तर के इस प्रांत में हिंदू को अल्पसंख्यक करके इसका धर्मांतरण कर यहां राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को पनपाया गया है। इन गतिविधियों से राष्ट्र की एकता और अखण्डता को खतरा बढ़ता ही गया। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश की जनता ने साहसपूर्ण राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए भाजपा को एक अवसर दिया है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की भांति इस प्रांत में भाजपा के पक्ष में आये जनसमर्थन को भी राष्ट्रवाद की जीत मानना ही उचित होगा। राष्ट्रवाद की बह रही इस बयार के सुखद झोंके मणिपुर की जनता ने अनुभव किये और मणिपुर की ओर से दिल्ली आने वाली हवा के प्रत्येक झोंके पर अपना संदेश लिख दिया कि हम अपने दिल अर्थात दिल्ली के साथ हैं, हमारी धडक़न दिल्ली की धडक़न के साथ है और अब हमें किसी प्रकार के षडय़ंत्र से छलना या ठगना किसी के वश की बात नहीं है।

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