सरदार भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरू को लाहौर षडय़ंत्र केस में फांसी की सजा हुई थी। 1928 में लाला लाजपत राय जब लाहौर में साईमन कमीशन के विरोध में सडक़ों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन कर रहे थे, तो क्रांति के उस  महानायक पर पुलिस कप्तान सांडर्स ने लाठियों से निर्मम प्रहार किया था। जिसके कारण लालाजी का देहावसान हो गया था। इस निर्मम घटनाकाण्ड का प्रतिशोध लेने के लिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों-भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, जयदेव कपूर, शिव वर्मा इत्यादि के साथ मिलकर योजना बनाई कि पुलिस कप्तान सांडर्स को निपटाकर लालाजी को पूरे देश की ओर से वीरोचित श्रद्घांजलि अर्पित की जाए। 
लालाजी की मृत्यु के ठीक एक महा पश्चात अर्थात 17 दिसंबर 1928 को पुलिस कप्तान सांडर्स को भारत के इन शेरों ने उस समय निपटा दिया जब वह अपने कार्यालय से बाहर निकलकर अपनी मोटरसाईकिल पर सवार होने ही वाला था। राजगुरू पहले से ही अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की निगरानी कर रहे थे, वह जैसे ही अपने कार्यालय से बाहर आया तो भारत के शेर क्रांतिकारी राजगुरू ने अपने साथी भगत सिंह को संकेत दिया और उन्होंने अपनी गोलियों से उस निर्दयी पुलिस कप्तान को वहीं भून दिया। हैडकांस्टेबल चाननसिंह ने भगतसिंह और उनके साथियों का पीछा करना चाहता तो चंद्रशेखर आजाद ने उसे अपनी गोली का निशाना बनाकर वहीं समाप्त कर दिया।
भारत के इन महान क्रांतिकारियों के द्वारा भारत के पौरूष का जिस प्रकार प्रदर्शन किया गया और जिस प्रकार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत अपने शत्रु का विनाश करते हुए भारतीय क्रांतिकारियों के महान आदर्श लाला लाजपतराय जी को जिस प्रकार श्रद्घांजलि अर्पित की गयी थी उसी को अंग्रेजों ने अपनी भाषा में लाहौर षडय़ंत्र केस के नाम से इतिहास में कुख्यात किया। इस केस में चंद्रशेखर आजाद, दुर्गावती, सुशीला दीदी, वैशंपायन, लेखराम,  सुखदेव राज, हंसराज, सीताराम, प्रेमनाथ, संपूर्णसिंह, छैलबिहारीलाल, यशपाल व प्रकाशवती को फरार घोषित किया गया। जब भी भगतसिंह और उसके साथी न्यायालय लाये जाते थे वह ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा अवश्य लगाते थे। उनके साथ जिन लोगों पर लाहौर षडय़ंत्र केस में सम्मिलित होने का आरोप था-उनमें सुखदेव, किशोरीलाल, शिव वर्मा, गयाप्रसाद, जितेन्द्रनाथ दास, जयदेव कपूर, बटूकेश्वर दत्त, कमलानाथ त्रिवेदी, जितेन्द्र सान्याल, आशाराम, देशराज, प्रेमदत्त, महावीर सिंह, सुरेन्द्र पाण्डे, अजय घोष, विजय कुमार सिंह, राजगुरू, कुंदन लाल का नाम भी सम्मिलित था।
भगत सिंह और उनके साथी न्यायालय परिसर में आने पर देशभक्ति के गीत गाते थे। क्रांति की सफलता के लिए नारे लगाते थे-जिन्हें उस समय के समाचार पत्रों में पर्याप्त स्थान मिलता था। 7 अक्टॅूबर 1930 को इस केस का निर्णय आया था। जिसमें राजगुरू, सुखदेव व सरदार भगतसिंह को फांसी की सजा दी गयी थी। विजय कुमार सिंह, महावीर सिंह, किशोरीलाल, शिव वर्मा, गया प्रसाद, जयदेव तथा कमलनाथ त्रिवेदी को आजीवन काला पानी की सजा, कुंदनलाल को सात वर्ष, तथा प्रेमदत्त को तीन वर्ष की कैद की सजा दी गयी थी। जितेन्द्र नाथ दास (यतीन्द्र नाथ दास) का मुकदमे की सुनवाई के समय 63 दिन के उपवास के पश्चात देहांत हो गया था। बटुकेश्वर दत्त को पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण केस में बरी कर दिया गया था। जय गोपाल और हंसराज वोहरा मुखबिर होने के कारण क्षमा कर दिये गये थे। इस आदेश के विरूद्घ 8 अक्टूबर 1930 को सारे देश के प्रमुख शहरों में हड़ताल की घोषणा की गयी और लोगों ने ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की थी। 
भगत सिंह और उनके साथियों ने बायसराय से दया करने की याचिका करना उचित नहीं माना था। अंत में 23 मार्च 1931 को सायंकाल 7 बजे लाहौर जेल में इन क्रांतिवीरों को फांसी दे दी गयी। तीन वीर पुत्र अपनी भारतमाता की पराधीनता की बेडिय़ों को काटने  के लिए शहीद हुए, और अब तक के लाखों   अमर शहीदों की श्रेणी में जा खड़े हुए। सारे देश ने अपने क्रांतिकारी नवयुवकों के बलिदान पर आंसू बहाये, यद्यपि फांसी प्रात:काल में दी जाती है, परंतु देश में इन क्रांतिकारियों के प्रति लोगों के मन में असीम स्नेह और श्रद्घा का भाव था, इसलिए किसी भी प्रकार के उपद्रव से बचने के लिए अंग्रेजों द्वारा इन्हें सायंकाल में ही फांसी दे दी गयी थी। उस समय जेल में हजारों कैदी बंद थे। फांसी पर जा रहे इन तीनों सपूतों ने अंतिम बार जब ‘इंकलाब जिंदाबाद’ कहा तो अन्य कैदियों ने भी उनके साथ  ‘इंकलाब जिंदाबाद’  का नारा लगाकर मानो अपने वीरों को अपना अंतिम प्रणाम किया। पुलिस ने रातों-रात इन वीरों केे शवों को फिरोजपुर में सतलुज के किनारे जला दिया। इसके उपरांत भी लोगों को जैसे ही इस गोपनीय रूप से किये गये भारत के क्रांतिकारियों के अंतिम संस्कार की सूचना मिली तो वहां हजारों की संख्या में लोग उपस्थित हो गये, और अपनी अंतिम श्रद्घांजलि देने लगे। यहां आजकल एक विशाल स्मारक है। जहां पर प्रतिवर्ष अनेकों लोग अपने श्रद्घासुमन अर्पित करने के लिए पहुंचते हैं। पिछले वर्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां जाकर एक इतिहास बनाया, क्योंकि इससे पूर्व कोई प्रधानमंत्री इन वीरों को पूरे राष्ट्र की ओर से श्रद्घासुमन अर्पित करने कभी नहीं पहुंचा। 23 मार्च वास्तव में भारत का वास्तविक शहीदी दिवस है, क्योंकि यह हमारे उन अमर क्रांतिकारियों बलिदानियों की स्मृतियों को हमें याद दिलाता है जिनके कारण हम वास्तव में स्वतंत्र हुए। क्रांतिकारियों की यह बलिदानी परम्परा वाला स्वतंत्रता संघर्ष ही वास्तव में भारत की स्वतंत्रता का वास्तविक स्वतंत्रता संग्राम है। जिसे हमें आज समझने की आवश्यकता है।

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