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भयानक राजनीतिक षडयंत्र संपादकीय

गांधीवाद की परिकल्पना – 3

कमीशन की राजनीति
कमीशन के नाम पर जिन बड़ी महत्वाकांक्षी योजनाओं और उद्योग नीति का श्रीगणेश यहां पर किया गया उसकी परिणति यह हुई है कि कमीशन आधारित राजनीति का शिकंजा पूरे देश पर कसा जा चुका है। इसे राजनीतिक पार्टियां चंदे का नाम देती हैं।
वास्तव में यह चंदा राजनीतिज्ञों की खरीद फरोख्त का धंधा है। जिससे बहुत से राजनीतिज्ञों की अंतरात्मा को यह व्यापारिक घराने चांदी के चंद टुकड़ों के बल पर खरीद लेते हैं। हमारे सांसदों के (विशेषत: ऐसे सांसद जो पहली बार संसद में जा रहे हैं) फर्नीचर व घर की साज सज्जा का सारा साजो सामान रातों-रात बदल जाता है। लाखों रूपये का ये सामान लाखों वोटों से चुनकर पहुंचे सांसद की नीयत को बदल देता है। वह स्वयं भी नहीं समझ पाता है कि अब वह अपनी क्षेत्रीय जनता का प्रतिनिधि है अथवा किसी विशेष व्यापारिक घराने का प्रतिनिधि है। यही काम भारत में लोकतंत्र की पहली प्रभात से ही होता आ रहा है। राम राज्य के गांधीवादी दर्शन में निर्धन के हित और अधिकार कब, कहां और कैसे नीलाम हो गये? यह आज तक किसी को पता ही नहीं चल पाया। क्या गांधीजी का गांधीवाद निर्धन के नाम पर मात्र सस्ती राजनीति करने का ओछा हथकंडा बनकर नहीं रह गया है? यदि नहीं तो तथाकथित गांधीवादी स्पष्ट करें कि फिर आपके पास रामराज्य स्थापना की ऐसी कौन सी आदर्श राजनीतिक व्यवस्था है, जिस व्यवस्था का आज तक स्पष्टीकरण नही किया गया है?
यदि हमारे उक्त प्रश्न का उत्तर हां में है तो यह स्पष्ट किया जाए कि यह ओच्छी राजनीति अभी और कब तक जारी रहेगी? इन प्रश्नों का उत्तर दिया जाए क्योंकि ये प्रश्न राष्ट्र की आत्मा से निकले हुए प्रश्न हैं। वास्तव में गांधीजी का रामराज्य का सपना गांधीजी के उत्तराधिकारियों ने ही दफन कर दिया है। पहले सपनों का दफन किया फिर स्वयं गांधी को और फिर भी बोल रहे हैं-महात्मा गांधी की जय।
गांधीजी के रामराज्य का सपना
राष्ट्र की युवा पीढ़ी बुद्घिजीवी और निर्माणात्मक सोच के अच्छे लोग गांधीवादियों से ऐसा पूछें-यह आज की राजनीति का यक्ष प्रश्न है, अन्यथा गांधीवाद का यह रामराज्य का कथित सपना इस राष्ट्र को बहुत देर तक छलता रहेगा। क्योंकि गांधीजी के कुछ आदर्शों की हत्या करके भी कुछ लोग उन्हें मात्र इसलिए जीवित रखना चाहते हैं कि उनके आदर्शों के नाम पर उनकी राजनीतिक दुकानदारी चलती रहे। अब यह इस देश की जनता को देखना है कि वह इन राजनीतिक नायकों के झांसे में कब तक और कहां तक आती है? वास्तव में गांधीजी का रामराज्य का सपना भी उनका मौलिक चिंतन नहीं था। राजनीतिक आदर्श व्यवस्था की स्थापना के लिए हमारे प्रत्येक हिंदू राजा का आदर्श रामराज्य ही रहा है। किंतु फिर भी यदि इसे गांधीजी का मौलिक चिंतन मान भी लें तो चंूंकि इसे गांधीजी के उत्तराधिकारी ही दफन कर चुके हैं-तो इसका अनर्गल और अतार्किक शोर कांग्रेसियों की ओर से अब बंद हो जाना चाहिए। इसे गांधीवाद में गौ प्रेम और उनके कथित ‘गीता प्रेम’ के खोखलेपन की श्रेणी में ही स्थान देना चाहिए।
महापुरूषों की अमरता उनके आदर्शों पर चलते रहने पर निर्भर करती है यदि किसी महापुरूष के अच्छे काम और आदर्शों को अलग रखकर उस महापुरूष के चित्र के साथ उन आदर्शों को भी खूंटी पर टांग दिया जाए तो समझो कि उसकी विचारधारा खोखली सिद्घ हो रही है।
गांधीजी के आदर्श और अहिंसा प्रेम
गांधीजी राजनीति में आदर्शों की बात करते थे। स्वच्छ व्यक्ति राजनीति के लिए और स्वच्छ राजनीति व्यक्तियों के लिए हो यह उनकी सोच थी।
छान्दोग्य उपनिषद का यह कथन हमारे राजनीतिज्ञों के लिए गांधीवाद का प्रेरणा स्रोत बनना चाहिए था-”मेरे राज्य में चोर नहीं, कृपण नहीं, शराबी नहीं, अग्निहोत्र न करने वाला नहीं, अशिक्षित निरक्षर नहीं, स्वैर आचरण करने वाला नहीं, फिर स्वैरिणी स्त्री कहां से लाऊं” इस कथित गांधीवाद से लाखों और करोड़ों वर्ष पूर्व से यह भारतीय राष्ट्र विश्व का राजनीतिक मार्गदर्शन करता आया है।
मनु महाराज, मांधाता, विष्णु विवस्वान जैसे कितने ही ऐसे राजा यहां थे जो प्रजापालन में अपनी तत्परता के कारण विख्यात थे। ये लोग न केवल राजनीति के कुशल खिलाड़ी थे अपितु धर्म के मर्म को समझने वाले भारतीय संस्कृति के महान शिल्पी भी थे। अपने महान भारत की इस गौरवपूर्ण लंबी राज श्रंखला से हमें विमुख करते हुए भारत का जन्म सन 1947 ई. से हुआ दिखाया जाने लगा। इसके कारण एक भ्रांति बन गयी कि गांधीजी के अतिरिक्त राजनीति को आदर्शवादी बनाने वाला भरत में कोई व्यक्ति आज तक पैदा नही हुआ, जबकि यह हमारी भयंकर ऐतिहासिक भूल है।
भगवान राम जब सब विद्याओं का अध्ययन करके वापस अपने पिता के पास आये तो उन्होंने एक वर्ष तक सभी ऋषियों के आश्रमों का निरीक्षण किया वे यह देखकर बड़े दुखी हुए कि राज्य में सर्वत्र राक्षसों का उपद्रव है, किंतु उनका समुचित प्रतिकार नहीं किया जा रहा है। रामचंद्रजी इस प्रकार की घटनाओं से ऊबकर स्वयं भी दैववादी बन गये और इस संसार के विषय में पूर्णरूपेण उदासीन बन गये, तब उन्हें वशिष्ठ ऋषि ने इस उदासीनतापूर्ण दैववादी दृष्टिïकोण को त्यागने का उपदेश दिया, जिसे सुनकर वह राक्षसों का दमन करने को उद्यत हुए।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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