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बिखरे मोती

संपत्ति संचित करी, रहा बहुत परेशान

बिखरे मोती-भाग 180

वास्तव में ऐसा व्यक्ति ही परमात्मा का सबसे प्रिय होता है, उसका खजाना कभी खाली नहीं होता है- क्योंकि उसके सिर पर परमात्मा का वरदहस्त होता है। गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं-हे पार्थ! ‘आप्त बांधव: अर्थात जो दूसरों को आपत्ति से निकालते हैं-वे मेरे रिश्तेदार हैं।’ भाव यह है कि ऐसे पुण्यशील व्यक्ति मुझे अत्यंत प्रिय हैं। पुण्यात्मा वास्तव में महान आत्मा होती है। उसके द्वारा किये गये सत्कर्मों (पुण्यों) के कारण उसके यश की सुगंधित समीर धरती और आकाश में मंद-मंद बहने लगती है-जो बड़ी ही मनभावन (लोकप्रिय) होती है। सब दिशाएं उसके पुण्यों का यशोगान करने लगती हैं। ऐसा व्यक्ति कस्तूरी की खुशबू की तरह महकता है, वह छिपाये नहीं छिपता है। वह भूसुर कहलाता है-अर्थात पृथ्वी का देवता कहलाता है। पुण्यशील व्यक्ति कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होता है। उसका आभामंडल दिव्यता से भरपूर होता है और दिव्य कार्यों का निष्पादन करता है। उसके द्वारा किये गये  पुण्यों को देखकर ऐसे लगता है जैसे मानो परमात्मा ने उसे स्वर्गलोक से पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कोई विशेष ‘देवदूत’ (फरिश्ता) बनाकर भेजा हो। इसलिए हे मनुष्य! तू धनार्जन तो कर किंतु अपनी नेक कमाई (धन) से पुण्य भी कमा। यह पुण्य कमाई ही मृतक के साथ जाया करती है। भौतिक संपदा तो यहीं पड़ी रह जाती है। पुण्यशील व्यक्ति ही सबसे बड़ा धनवान है। ध्यान रहे, पुण्यशील व्यक्ति को पृथ्वी पर ही नहीं, अपितु स्वर्ग में भी ऊंचा स्थान मिलता है। इसलिए संसार से जाने से पहले पुण्य कमाओ-पुण्य।
जब संपत्ति विपत्ति बनती है :-
संपत्ति संचित करी,
रहा बहुत परेशान।
रोग-बुढ़ापे ने घेरा,
घर में रहै घमासान ।। 1111।।
व्याख्या :-
कैसी विडंबना है मनुष्य इस संसार में पैदा होता है-बचपन आता है, बचपन से किशोरावस्था आती है, किशोरावस्था से युवावस्था आती है, युवावस्था से प्रौढ़ावस्था आती है, प्रौढ़ावस्था से वृद्घावस्था आती है, वृद्घावस्था से जरावस्था आती है और जरावस्था से वह एक दिन मृत्यु का ग्रास बन जाता है। संसार के सारे संबंध चिता की लाल पीली लपटों के किनारे धरे रह जाते हैं-बचती है तो केवल दो मुट्ठी राख बचती है, उसे भी किसी दरिया में बहा दिया जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन की सारी अवस्थाएं देखते ही देखते ऐसे चली जाती हैं जैसे वर्ष में ऋतुएं चली जाती हैं। यह परिवर्तन और विवर्तन का क्रम अनवरत रूप से चलता रहता है। बेचारा मनुष्य संपत्ति का संचय तो ऐसे करता है जैसे इस संसार में सदा रहना है। यहां तक कि कभी-कभी तो संपत्ति के लिए वह हत्या तक करता है, भाई-भाई का गला घोंटता है, ईश्वर के न्याय को भूल जाता है, आत्मा का हनन करता है, अपने ईमान को गंवाता है, मन के चैन को गंवाता है, अपनी सेहत को गंवाता है फिर जीवन भर डाक्टरों के चक्कर लगाता है, दवाई खाता है, शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान रहता है, नींद की प्यारी आगोश में सोने के लिए तरसता है, उसका मन अवसाद से भरा रहता है, जो चिंताओं का जंक्शन बन जाता है। रोग और बुढ़ापे का भयानक हिमपात होता है, जिसमें वह अपने आपको घिरा हुआ पाता है, परिजनों में संपत्ति को लेकर कलह-क्लेश शुरू हो जाती है।    क्रमश:

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