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विशेष संपादकीय

‘न्यू इंडिया’ और गांवों की समृद्घि का रास्ता

‘भारत गांवों का देश है’-ऐसा कहा जाता है। पर आज हम देख रहे हैं कि गांवों से भारत शहरों की ओर भाग रहा है। मानो, वह इस कहावत को अब बदल देना चाहता है कि ‘भारत गांवों का देश है।’ भारत शहरों का देश बनता जा रहा है। लोगों का मिट्टी से लगाव कम होकर कंकरीट से लगाव बढ़ता जा रहा है। मिट्टी अर्थात संवेदनशील और जीवन्तता की प्रतीक, और कंकरीट अर्थात हृदयहीन, पत्थर असंवेदनशील और सर्वथा मृत समान-पर क्या करें? जब युग धर्म (जमाने का दौर) ही ऐसा बन गया हो तो हर व्यक्ति गांव को यथाशीघ्र छोड़ देना चाहता है।
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने गांवों की समृद्घि को भारत की समृद्घि का प्रतीक मानकर देश की पंचवर्षीय योजनाओं को ग्रामोन्मुखी बनाने पर बल दिया था। परंतु व्यवहार में वे अपनी योजना को मूत्र्तरूप नहीं दे पाये। व्यवहार में विकास का सारा ध्यान शहरों की ओर केन्द्रित हो गया और बहुत शीघ्र ही नेताओं, अधिकारियों और भूमाफिया बिल्डरों ने एक गठबंधन किया और शहरों के विकास के नाम पर गांवों को गटकना आरंभ कर दिया। गांवों के गांव कुछ मुट्ठी भर लोगों ने खरीदे और जितना पैसा गांव के काश्तकारों को दिया गया उससे दो गुणा-चार गुणा ये मुट्ठी भर लोग स्वयं डकार गये। आज बहुत सारे गांव बड़े-बड़े नगरों की ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं की कैद में पड़े हैं। बड़े शहरों के बीच रहकर भी उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। जो सुविधाएं सैक्टरवासियों को उपलब्ध हैं, वे उन ग्रामवासियों को उपलब्ध नहीं है-जो शहरों के बीच आ गये हैं। उनका अपराध ये है कि वे इस देश की मिट्टी से जुड़े हैं और उन्होंने अपने ही कुछ भाइयों को अपने ही गांव की जमीन में बसने के लिए अवसर उपलब्ध करा दिया।
अब प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुन: ग्रामोन्मुखी विकास की बात कर रहे हैं। उनकी योजना भी स्वागत योग्य है। पर हमें डर है कि कहीं उनकी योजना भी पंडित नेहरू की योजना की भांति दिशा विहीन होकर विकास के नाम पर गांव के विनाश की कहानी न लिखने लगे?
‘न्यू इंडिया’ के अपने संकल्प को मोदी ने भाजपा के हर नारे की भांति अंग्रेजी में व्यक्त किया है। इससे पूर्व ‘फीलगुड’, शाइनिंग इंडिया जैसे कई नारे भाजपा अंग्रेजी में दे चुकी है। अब पुन: ‘न्यू इंडिया’ को भी अंग्रेजी में अभिव्यक्ति देना जंचता नहीं है। फिर भी ‘न्यू इंडिया’ अर्थात ‘नव भारत’ के निर्माण में गांव की भूमिका पर हम केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों से निवेदन करेंगे कि इस कार्य के लिए गांव को गंवारों का या पिछड़े लोगों का झुण्ड मानने की मानसिकता से इस देश के शिक्षित वर्ग को निकालने का प्रयास किया जाए। गांव के विकास की बात यहीं से प्रारंभ हो। देश का शिक्षित वर्ग आज भी गांव के लोगों से और गांव के परिवेश से वैसी ही घृणा करता है जैसी अंग्रेज किया करते थे। विदेशी शिक्षा को देश में लागू करोगे तो ऐसे ही परिणाम आएंगे। गांव के प्रति ऐसी घृणास्पद मानसिकता के परिवर्तित करने के लिए शिक्षा का भारतीयकरण किया जाए।
शिक्षा के भारतीयकरण में घनी आबादी के बड़े शहरों की घुटनभरी जीवनशैली और गांव की शुद्घ और ताजा वायु को प्राप्त करके स्वास्थ्य लाभ देने वाली जीवन शैली के बीच के अंतर को स्पष्ट किया जाए। गांव को गांव में ही रोकने के लिए उसकी मूलभूत समस्याओं यथा-चिकित्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, सडक़ और बिजली का निराकरण करने की ओर ध्यान दिया जाए। गांवों को खरीदकर कालोनी काटने वाले बिल्डरों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और सरकार यह सुनिश्चित करे कि गांव का विकास करने के लिए कौन सी रणनीति अपनायी जाए?
गांव को गांव में रोकने के लिए एक विद्यालय (गुरूकुलीय संस्कारों  से युक्त) प्रत्येक गांव के स्थापित किया जाए। जहां योग, प्राणायाम, यज्ञ-हवन आदि करने सिखाये जाएं। इससे उन लोगों का मानसिक स्तर ऊंचा होगा और उनमें जो छोटी-छोटी बातों पर लडऩे की प्रवृत्ति देखी जाती है- उस पर अंकुश लग सकेगा। उन्हें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया जाए और उन्हीं लोगों के मध्य से ‘ग्रामीण विकास, समस्याएं और समाधान’ जैसे विषय को लेकर एक समिति का गठन किया जाए। इस समिति का कार्य प्रत्येक गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, सडक़, अस्पताल आदि को लेकर किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना या इस संबंध में हो गयी उन्नति की समीक्षा करना और विकास कार्यों की कमियों को प्रदेश सरकार के संज्ञान में लाना होना चाहिए। यदि यह ग्राम्य विकास समिति मुख्यमंत्री को शिकायत करती है तो उस पर तुरंत ध्यान दिया जाए।
हम अभी तक देख रहे हैं कि शासन और ग्रामीण लोगों के बीच में प्रशासन एक दीवार बना खड़ा है। इस प्रशासन को अपने लिए अंग्रेजों ने अनिवार्य माना था। इसके कई कारण थे। यथा-उन्हें ग्रामीण लोगों की भाषा समझ नही आती थी। दूसरे, उन्हें भारत की भौगोलिक जानकारी नहीं थी, तीसरे-वह अपनी लूट को कलैक्टर (यह अधिकारी हमारे काश्तकारों से बलात् राजस्व वसूलता था, इसीलिए कलैक्टर कहलाता था) के माध्यम से लेते थे। इसलिए उस लुटेरे कलैक्टर को वह शक्ति संपन्न रखना चाहते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी डीएम जिले में  सदा एक प्रशासक की भूमिका में रहता है। लोग इस ‘अधिनायक’ का हर दिन ‘भारत भाग्य विधाता’ मानकर गुणगान करने के लिए  अभिशप्त हैं। स्वतंत्रता के 70 वर्ष बीत जाने पर भी हमारे लोग अपने सांसद और विधायक का महत्व नही समझ पाये हैं और ये सांसद और विधायक भी इतने निकम्मे रहे हैं कि इन्होंने भी लोगों को अपना महत्व समझाया नहीं है। ‘न्यू इंडिया’ में इस व्यवस्था को परिवर्तित करना होगा। शासन को लोगों के प्रति उत्तरदायी बनाया जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि लोग अपने जनप्रतिनिधि को ‘जनलोकपाल’ समझें और यह जनलोकपाल भी स्वयं को जनलोकपाल ही सिद्घ करने का कार्य करे तो ‘न्यू इंडिया’ में भारत का गांव चमक सकता है, अन्यथा हम महानगरों की गली सड़ी जीवनशैली के बीच घुटनभरी गलियों के घुटनभरे कमरों में सड़ सडक़र मरने के लिए तैयार रहें। महानगर हमारे विकास का नहीं विनाश का कारण बनकर उभरे हैं। इसलिए छोटी-छोटी आबादी वाले गांवों को गांव में रोकने की ओर कार्य करने की आवश्यकता है।

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