आज भूमंडल का अस्तित्व लगा है दांव पर

बिखरे मोती-भाग 183

भाव यह है कि भगवान से ऊर्जान्वित  होते रहने से मनुष्य जीवन की समर्थता है अन्यथा नहीं। दूध विभिन्न सोपानों से गुजर कर भक्ति की उत्कृष्टता और उच्चतम अवस्था को प्राप्त होता है। इसलिए भक्ति का मानव जीवन में विशिष्ट स्थान है। भक्ति के कारण मनुष्य ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है। 

हम भक्ति क्यों करें?
साधारणतया लोग इस प्रकार के प्रश्न करते हैं-जब हमारे कर्म अथवा प्रारब्ध के आधार पर ही हमें सब कुछ प्राप्त होता है तो हम भक्ति क्यों करें? हमारे ऋषि इसका उत्तर देते हुए कहते हैं-भक्ति से अहंकार शून्यता आती है, कर्ता होने का भाव मिटता है, प्रभु का सामीप्य प्राप्त होता है, दिव्य गुण मुखरित होने लगते हैं, सदभाव स्थायीभाव बनने लगते हैं, दुर्भाव ऐसे भागने लगते हैं जैसे प्रकाश को देखते ही अंधेरा भागने लगता है, दुर्गुण और दुव्र्यसन दूर होने लगते हैं, सदगुण और सत्कर्म का स्वर्णिम सवेरा होने लगता है। मन व बुद्घि की शुद्घि होती है, धर्म की अभिवृद्घि होती है, जिसके कारण इस लोक का कल्याण और परलोक की सिद्घि होती है। मन को तुष्टि (सुकून) और आत्मा को संतुष्टि (परमानंद) मिलती है, आत्मबल मिलता है।
उस ज्योति (परमपिता-परमात्मा) के समीप पहुंचने के लिए मन, बुद्घि, चित्त को एक आश्रय चाहिए। यह आधार है प्रेम और भक्ति। हे मनुष्य! तू अपने ज्ञान और बल पर अहंकार मत कर। कोरा ज्ञान तुझे कुमार्ग पर भी ले जा सकता है। ये एटम बम, हाइड्रोजन बम दूसरे प्राणघातक हथियार ज्ञान से ही तो बने हैं, किंतु इनमें प्रेम और भक्ति की भावना लेशमात्र भी नहीं है, इनमें करूणा के स्थान पर क्रूरता ही भरी है, प्रेम के स्थान पर ईष्र्या भरी है, जो हंसती खेलती दुनिया को चंद मिनटों में समाप्त कर देगी। इनके निर्माता यह भूल गये कि जीवन का अस्तित्व ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्घांत पर टिका है। याद रखो, हिंसा का रूप क्रूरता होती है, जबकि करूणा का रूप अहिंसा होती है। आज संसार को हिंसा की नहीं अहिंसा की आवश्यकता है। इसलिए भक्ति की पहले से भी आज अधिक आवश्यकता है क्योंकि 
रक्त की नदी बहाने को,
लगी होड़ है विनाश की।
रोक सको तो रोको कोई
हुई आशा क्षीण विकास की।।
दानवता के भंवर बढ़े,
आज मानवता की नाव पर।
सच पूछो तो भूमंडल का,
अस्तित्व लगा है दांव पर।।
हमारे ऋषियों का दर्शन देखिये, उनके हृदय की विशालता देखिये-वे समस्त पृथ्वी को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का दर्शन दे गये। हृदय और आत्मा को पवित्र करने वाला यह उपदेश दे गये :-
धर्मार्थकाममोक्षाणां ज्ञान वैराग्योरपि।
अंत:करणशुद्घिश्च भक्ति: परमसाधनम्।।
अर्थात धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार वस्तुओं की मनुष्य इच्छा करता है।  इनको प्राप्त करने का मार्ग है-ज्ञान और वैराग्य। ज्ञान और वैराग्य का मार्ग है-अंत:करण की शुद्घि और शुद्घि का सबसे बड़ा साधन है-भक्ति। यह पृथ्वी सर्वदा सुख समृद्घि से ओत-प्रोत रहे, इसके लिए सीधा और सरल उपदेश देते हुए हमारे ऋषियों ने कहा-धर्म है मानव जीवन के लिए, अर्थ है-संसार के लिए, काम है- मन के लिए और मोक्ष है-आत्मा के लिए और इन सबका साधन है भक्ति।
क्रमश:

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