उनका दृष्टिकोण हुआ करता था कि पैसा यदि लिया भी जाए तो सही काम का लिया जाए, फिर ऐसी स्थिति आयी कि जो भी दे जाए उसी का काम कर दो। इसका अभिप्राय था कि दो पक्षों में एक गलत पक्ष का व्यक्ति यदि दे जाए तो उसी का काम कर दो। किंतु आज स्थिति इन दोनों ही स्थितियों के विपरीत है।
अब कार्य उसका होता है जो अधिक देता है। दो पक्ष देने वाले हैं-उन्हें अधिकारी बोलता है कि कौन सा अधिक देने वाला है, जो अधिक देने में समर्थ है काम उसी का हुआ मानो।
कितनी बदल गयी नैतिकता की परिभाषा
कितनी बदल गयी हमारी कार्य के प्रति निष्ठा, और कितनी बदल गयी हमारी मूल्यों के प्रति आस्था? इसी प्रकार की परिवर्तित परिस्थितियों में एक अधिकारी मुझसे कह रहे थे कि मेरा अपनी नौकरी का यह नियम है कि अन्याय करो लेकिन कानून और नियमों का उस पर इतना आवरण चढ़ा दो कि वह अन्याय होकर भी न्याय सा लगने लगे। सारे देश में हर विभाग में हर अधिकारी ऐसा ही कर रहा है। अत: ‘राज भी गहरा है और षडय़ंत्र भी गहरा है।’
इन्हें कौन पकड़ेगा
भारत में अड़ंगा शब्द बड़ा लोकप्रिय है। हर कार्य में अड़ंगा डालना, दूसरे की टांग खींचना, किसी के बनते काम को बिगाडऩा जैसे गुण हमारे व्यवहार का अंग बन चुके हैं। अभी हमारे देश के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री पीवी नरसिंहराव का देहांत हुआ। चाटुकार भारतीय नौकरशाही ने इस अवसर पर एक बहुत निकृष्ट उदाहरण विश्व समुदाय के समक्ष प्रस्तुत किया। दिवंगत नेता के लिए पार्थिव शरीर के दाह संस्कार हेतु पर्याप्त लकड़ी भी उपलब्ध नहीं हो सकी।
रात्रि में जब टीवी चैनलों के द्वारा इस धृतराष्ट्र आचरण का प्रचार हुआ तो उत्तरदायी व्यक्तियों में हडक़ंप मच गया। सभी क्रियाशील हो उठे। दुबारा लकडिय़ों की व्यवस्था की गयी और तब दिवंगत नेता की शेष रही अस्थियां व शव के कुछ अंग भस्म हो सके। यहां प्रश्न विचारणीय यह है कि यदि यह प्रधानमंत्री नेहरू परिवार से रहा होता तो क्या ऐसा होता?
जब एक व्यक्ति विषम परिस्थितियों में राष्ट्र की नाव को संभालकर पूर्ण मनोयोग से किनारे खोज रहा हो, उस समय उसका ध्यान भंग करने के लिए यहां कई प्रकार की अप्सराएं नृत्य करती हैं। इन अप्सराओं में नौकरशाही भी सम्मिलित है। पार्टी के लोग भी सम्मिलित हैं, विपक्ष भी सम्मिलित है, विदेशी शक्तियां भी सम्मिलित है, कई उग्रवादी शक्तियां भी सम्मिलित हैं। 
देश के भीतर की व्यापारिक लॉबियां भी सम्मिलित हैं कई उग्रवादी संगठन भी सम्मिलित हैं। पद पर एक व्यक्ति और टांग खींचने वाले असंख्य होते हैं। सब इस प्रकार का वातावरण बनाने का प्रयास करते जान पड़ते हैं कि इस पद वाले का धैर्य उत्तर दे और हमें या हमारे अनुकूल मन स्थिति वाले व्यक्ति को अवसर मिले। लोगों की इस देशद्रोहीपूर्ण मन: स्थिति को देश का कौन सा विधान और संविधान पकड़ेगा? हमारा विधान और संविधान तो इस विषय में मौन है। कितने तनाव और दबाव में लोग इन षडय़ंत्रों और कुचक्रों के मध्य कार्य करते हैं और ऊपर से धैर्य बनाये रखने का प्रदर्शन भी करते हैं वे वही जानते हैं जो ऐसे गुरूतर दायित्व और भूमिका को निभा रहे होते हैं।
यदि कहीं उनका धैर्य छलक जाए या तनाव और कुण्ठा में कोई गलत निर्णय ले जाएं, या इन षडय़ंत्रों और कुचक्रों को निष्फल करने के लिए कोई ऐसा निर्णय ले जाएं कि जो राष्ट्रहित में होकर भी अनैतिक हो (जैसा नरसिम्हाराव ने अपनी सरकार गिराने के प्रयासों को धत्ता लगाने के लिए सांसदों को रिश्वत देकर किया था) तो हमारा विधान अपने लंबे हाथों में हथकड़ी लेकर नरसिम्हाराव की ओर बढ़ेगा। 
वास्तविक अपराधी तो एक विशाल जुलूस के साथ उस विधान के साथ नारे लगाते चल रहे होंगे। राष्ट्रहित में अनैतिक अपराध करने वाला हर नरसिम्हाराव तब कत्र्तव्यबोध और राष्ट्रबोध के बीच झूलता हुआ मौन साथ लेगा,  तब वास्तविक अपराधी उसे नाम देंगे-मौनी बाबा।
स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश की राजनीति की दिशा और दशा यही रही है। यहां वास्तविकता अपराधी विधान की पकड़ से बच निकलते हैं। क्योंकि विधान अपूर्ण है। यहां का विपक्ष विरोध पक्ष है-विशेष पक्ष नहीं है, अपितु विपरीत पक्ष है। उसे सत्ताधारी दल के विपरीत बोलना है, उसे समीक्षा करने के अपने राष्ट्रबोध का ज्ञान नहीं है। केवल आलोचना को ही उसने अपना हथियार एवं धर्म बना लिया है। ऐसी स्थिति भी तो ठीक नहीं। 
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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