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विशेष संपादकीय

भारत का अमृत महोत्सव काल अर्थात सजग और सावधान रहने का काल

प्रो. संजय द्विवेदी

अमृतकाल का समय सोते हुए सपने देखने का नहीं, बल्कि जागृत होकर संकल्प पूरे करने का है
एक राष्ट्र के लिए, विशेष रूप से भारत जैसे प्राचीन देश के लंबे इतिहास में, 75 वर्ष का समय बहुत छोटा प्रतीत होता है। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर यह कालखंड एक जीवन-यात्रा जैसा है। हमारे वरिष्ठ नागरिकों ने अपने जीवनकाल में अद्भुत परिवर्तन देखे हैं। वे गवाह हैं कि कैसे आजादी के बाद सभी पीढ़ियों ने कड़ी मेहनत की, विशाल चुनौतियों का सामना किया और स्वयं अपने भाग्य-विधाता बने। इस दौर में हमने जो कुछ सीखा है, वह सब उपयोगी साबित होगा, क्योंकि हम राष्ट्र की यात्रा में एक ऐतिहासिक पड़ाव की ओर आगे बढ़ रहे हैं। हम सब 2047 में स्वाधीनता के शताब्दी उत्सव तक की 25 वर्ष की अवधि यानि भारत के अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं।

हमारे स्वाधीनता संग्राम ने एक राष्ट्र के तौर पर भारत की नई यात्रा की रूपरेखा तैयार की थी। हमारा स्वाधीनता संग्राम उन संघर्षों और बलिदानों की अविरल धारा था, जिसने आजाद भारत के लिए कितने ही आदर्शों और संभावनाओं को सींचा था। पूज्य बापू ने हमें स्वराज, स्वदेशी, स्वच्छता और सत्याग्रह द्वारा भारत के सांस्कृतिक आदर्शों की स्थापना का मार्ग दिखाया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, बाबा साहेब आंबेडकर, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, चंद्रशेखर आजाद जैसे अनगिनत स्वाधीनता सेनानियों ने हमें राष्ट्र के स्वाभिमान को सर्वोपरि रखने की शिक्षा दी। रानी लक्ष्मीबाई, रानी वेलु नचियार, रानी गाइदिन्ल्यू और रानी चेन्नम्मा जैसी अनेकों वीरांगनाओं ने राष्ट्ररक्षा और राष्ट्रनिर्माण में नारीशक्ति की भूमिका को नई ऊंचाई दी। संथाल क्रांति, पाइका क्रांति से लेकर कोल क्रांति और भील क्रांति ने स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी योगदान को और सशक्त किया। सामाजिक उत्थान एवं देश-प्रेम के लिए ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा जी के बलिदान से हमें प्रेरणा मिली।

हमारे पास जो कुछ भी है वह हमारी मातृभूमि का दिया हुआ है। इसलिए हमें अपने देश की सुरक्षा, प्रगति और समृद्धि के लिए अपना सब कुछ अर्पण कर देने का संकल्प लेना चाहिए। हमारे अस्तित्व की सार्थकता एक महान भारत के निर्माण में ही दिखाई देगी। कन्नड़ा भाषा के माध्यम से भारतीय साहित्य को समृद्ध करने वाले महान कवि ‘कुवेम्पु’ ने कहा है:

नानु अलिवे, नीनु अलिवे

नम्मा एलु-बुगल मेले

मूडु-वुदु मूडु-वुदु

नवभारत-द लीले।

अर्थात्

‘मैं नहीं रहूंगा

न रहोगे तुम

परन्तु हमारी अस्थियों पर

उदित होगी, उदित होगी

नए भारत की महागाथा।’

‘कुवेम्पु’ का यह स्पष्ट आह्वान है कि मातृभूमि तथा देशवासियों के उत्थान के लिए सर्वस्व बलिदान करना हमारा आदर्श होना चाहिए। इन आदर्शों को अपनाने के लिए हमें अपने देश के युवाओं से बहुत उम्मीदें हैं। ये युवा ही 2047 के भारत का निर्माण करेंगे।

‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ हो लक्ष्य

एक संसदीय लोकतंत्र के रूप में 75 वर्षों में भारत ने प्रगति के संकल्प को सहभागिता एवं सर्व-सम्मति से आगे बढ़ाया है। विविधताओं से भरे अपने देश में हम अनेक भाषा, धर्म, संप्रदाय, खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाजों को अपनाते हुए ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के निर्माण में सक्रिय हैं। आजादी के 75वें वर्ष के अवसर पर आया ये अमृतकाल भारत के लिए नए संकल्पों का कालखंड है। भारत आज हर क्षेत्र में विकास का नया अध्याय जोड़ रहा है। कोरोना महामारी के वैश्विक संकट का सामना करने में भारत ने जिस तरह का सामर्थ्य दिखाया है, उसने पूरे विश्व में भारत की साख बढ़ाई है। हम हिंदुस्तानियों ने अपने प्रयासों से न सिर्फ इस वैश्विक चुनौती का सामना किया, बल्कि दुनिया के सामने नए मापदंड भी स्थापित किए, जिसमें भारत का कोरोना वैक्सीन की 200 करोड़ डोज़ लगाने का कीर्तिमान भी शामिल है। इस पूरी लड़ाई में भारत के लोगों ने जिस संयम, साहस और सहयोग का परिचय दिया, वो एक समाज के रूप में हमारी बढ़ती हुई शक्ति और संवेदनशीलता का प्रतीक है।

भारत ने इन मुश्किल हालात में न केवल खुद को संभाला, बल्कि दुनिया की मदद भी की। कोरोना महामारी से बने माहौल में, आज दुनिया भारत को नए विश्वास से देख रही है। आज देश में स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था तथा इनके साथ जुड़े अन्य क्षेत्रों में जो अच्छे बदलाव दिखाई दे रहे हैं, उनके मूल में सुशासन पर विशेष बल दिए जाने की प्रमुख भूमिका है। जब ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से कार्य किया जाता है, तो उसका प्रभाव प्रत्येक निर्णय एवं कार्यक्षेत्र में दिखाई देता है। यह बदलाव विश्व समुदाय में भारत की प्रतिष्ठा में भी दिखाई दे रहा है। दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए, सप्लाई चेन की सुगमता के लिए, और वैश्विक शांति के लिए दुनिया को भारत से बहुत उम्मीदें हैं। इसी का परिणाम है कि भारत अपनी अध्यक्षता में G-20 ग्रुप की मेजबानी भी कर रहा है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि देश के युवा जब आगे बढ़ते हैं, तो वे सिर्फ अपना ही भाग्य नहीं बनाते, बल्कि देश का भी भाग्य बनाते हैं। आज हम इसे सच होते देख रहे हैं।

‘औद्योगिक क्रांति 4.O’ की तैयारी

‘वोकल फॉर लोकल’ से लेकर डिजिटल इंडिया तक हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा आज का भारत विश्व के साथ कदम से कदम मिला कर ‘औद्योगिक क्रांति 4.O’ के लिए पूरी तरह तैयार है। रिकॉर्ड संख्या में बन रहे स्टार्ट-अप्स में, नए-नए इनोवेशन में, दूर-सुदूर क्षेत्रों में डिजिटल टेक्नोलॉजी की स्वीकार्यता में भारत के युवाओं की बड़ी भूमिका है। बीते वर्षों में भारत ने जिस तरह महिला सशक्तिकरण के लिए निर्णय लिए हैं, नीतियां बनाई हैं, उससे भी देश में एक नई शक्ति का संचार हुआ है। हम सभी की इच्छा है कि हमारी सभी बहनें और बेटियां अधिक से अधिक सशक्त हों तथा वे देश के हर क्षेत्र में अपना योगदान बढ़ाती रहें। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में स्त्री-पुरुष के आधार पर असमानता कम हो रही है। महिलाएं अनेक रूढ़ियों और बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ रही हैं। सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में उनकी बढ़ती भागीदारी निर्णायक साबित होगी। आज हमारी पंचायती राज संस्थाओं में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या चौदह लाख से कहीं अधिक है। आज देश के युवा न केवल अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, बल्कि भविष्य के भारत की नींव भी रख रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन

विकास और प्रगतिशीलता का अर्थ निरंतर आगे बढ़ना होता है, लेकिन साथ ही अपने अतीत का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है। आज जब पूरा विश्व Sustainable Planet की बात कर रहा है, तो उसमें भारत की प्राचीन परंपराओं, हमारे अतीत की Sustainable Lifestyle की भूमिका और बढ़ जाती है। हम प्रकृति से जरूरी संसाधन लेते हैं और उतनी ही श्रद्धा से प्रकृति की सेवा भी करते हैं। यही संवेदनशीलता आज वैश्विक अनिवार्यता बन गई है। हमें इस बात की प्रसन्नता है कि भारत पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है। हमारा भारत अनेक विविधताओं से भरा देश है। परंतु इस विविधता के साथ ही हम सभी में कुछ न कुछ ऐसा है जो एक समान है। यही समानता हम सभी देशवासियों को एक सूत्र में पिरोती है तथा ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। भारत अपने पहाड़ों, नदियों, झीलों और वनों तथा उन क्षेत्रों में रहने वाले जीव-जंतुओं के कारण भी अत्यंत आकर्षक है। आज जब हमारे पर्यावरण के सम्मुख नई-नई चुनौतियां आ रही हैं, तब हमें भारत की सुंदरता से जुड़ी हर चीज का दृढ़तापूर्वक संरक्षण करना चाहिए। जल, मिट्टी और जैविक विविधता का संरक्षण हमारी भावी पीढ़ियों के प्रति हमारा कर्तव्य है। प्रकृति की देखभाल मां की तरह करना हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। हम भारतवासी अपनी पारंपरिक जीवन-शैली से पूरी दुनिया को सही राह दिखा सकते हैं। योग एवं आयुर्वेद विश्व-समुदाय को भारत का अमूल्य उपहार है जिसकी लोकप्रियता पूरी दुनिया में निरंतर बढ़ रही है।

अमृतकाल का ये समय सोते हुए सपने देखने का नहीं, बल्कि जागृत होकर अपने संकल्प पूरे करने का है। आने वाले 25 साल, परिश्रम की पराकाष्ठा, त्याग, तप-तपस्या के 25 वर्ष हैं। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी में हमारे समाज ने जो गंवाया है, ये 25 वर्ष का कालखंड, उसे दोबारा प्राप्त करने का है। इसलिए आजादी के इस अमृत महोत्सव में हमारा ध्यान भविष्य पर ही केंद्रित होना चाहिए। हमारे समाज में एक अद्भुत सामर्थ्य है। ये एक ऐसा समाज है, जिसमें चिर पुरातन और नित्य नूतन व्यवस्था है। हालांकि इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि समय के साथ कुछ बुराइयां व्यक्ति में भी, समाज में भी और देश में भी प्रवेश कर जाती हैं। जो लोग जागृत रहते हुए इन बुराइयों को जान लेते हैं, वो इन बुराइयों से बचने में सफल हो जाते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन में हर लक्ष्य प्राप्त कर पाते हैं। हमारे समाज की विशेषता है कि इसमें विशालता भी है, विविधता भी है और हजारों साल की यात्रा का अनुभव भी है। इसलिए हमारे समाज में, बदलते हुए युग के साथ अपने आप को ढालने की एक अलग ही शक्ति है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ का निर्माण

हमारे ऋषियों ने उपनिषदों में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय’ की प्रार्थना की है। यानी, हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ें। परेशानियों से अमृत की ओर बढ़ें। अमृत और अमरत्व का रास्ता बिना ज्ञान के प्रकाशित नहीं होता। इसलिए, अमृतकाल का ये समय हमारे ज्ञान, शोध और इनोवेशन का समय है। हमें एक ऐसा भारत बनाना है जिसकी जड़ें प्राचीन परंपराओं और विरासत से जुड़ी होंगी और जिसका विस्तार आधुनिकता के आकाश में अनंत तक होगा। हमें अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपने संस्कारों को जीवंत रखना है। अपनी आध्यात्मिकता को, अपनी विविधता को संरक्षित और संवर्धित करना है। और साथ ही, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन, हेल्थ की व्यवस्थाओं को निरंतर आधुनिक भी बनाना है। आज भारत किसानों को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑर्गेनिक फार्मिंग और नैचुरल फार्मिंग की दिशा में प्रयास कर रहा है। इसी तरह क्लीन एनर्जी के और पर्यावरण के क्षेत्र में भी दुनिया को भारत से बहुत अपेक्षाएं हैं। आज क्लीन एनर्जी के कई विकल्प विकसित हो रहे हैं। इसे लेकर भी जनजागरण के लिए बड़े अभियान की जरूरत है। हम सब मिलकर आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी गति दे सकते हैं।

प्रख्यात कवि भीम भोई जी की कविता की एक पंक्ति है-

“मो जीवन पछे नर्के पड़ी थाउ,जगत उद्धार हेउ”।

अर्थात्, अपने जीवन के हित-अहित से बड़ा जगत कल्याण के लिए कार्य करना होता है। जगत कल्याण की इसी भावना के साथ हमारा कर्तव्य है कि हम सभी को पूरी निष्ठा व लगन के साथ काम करना होगा। हम सभी एकजुट होकर समर्पित भाव से कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ेंगे, तभी वैभवशाली और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण होगा।

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