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आतंकवाद विशेष संपादकीय

सांप्रदायिक दंगे और हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य

कुछ लोग भारत में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए यह तर्क देते हैं कि भारत में प्राचीन काल से ही सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के प्रति लोगों में सतर्कता बनी रही है । इस बात से किसी सीमा तक हम भी सहमत हैं , परंतु हमारी सहमति वहीं तक है जहां तक देश की एकता और अखंडता को बनाए रखकर और देश के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति एकमत बने रहकर लोग कार्य करने के स्वभाविक अभ्यासी होते हैं । साथ ही किसी विपरीत सम्प्रदाय के लोगों के अधिकारों का शोषण न करते हैं और ना ही दूसरे सम्प्रदाय पर जबरन शासन करके उन्हें लूटते , काटते या मारते हैं – वहीं पर यह साम्प्रदायिक सद्भाव इस प्रकार जीवित रह सकता है।
जहाँ एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय के सांस्कृतिक मूल्यों से घृणा करता है या उन्हें नष्ट कर अपने साम्प्रदायिक सांस्कृतिक मूल्यों को दूसरे सम्प्रदाय पर थोपने का प्रयास करता है या देश को तोड़ने की गतिविधियों में संलिप्त मिलता है या दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का नरसंहार कर उन पर शासन करने की तिकड़में बैठाता है , वहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव को बनाए रखना बड़ा कठिन होता है। वहाँ पर साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रति सतर्कता की भावना और भी अधिक बढ़ जानी चाहिए। वहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव तभी विकसित हो सकता है जब या तो दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने की नीति पर काम किया जाए या कठोर कानून बनाकर सरकार ऐसे लोगों को देश की मुख्यधारा के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए बाध्य करे जो किसी भी प्रकार से साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देते हुए लोगों के अधिकारों का हनन करते हों ।
भारत के विषय में यह सच है कि ये देश सांप्रदायिक संकीर्णता को अपनाने वाला देश कभी नहीं रहा। परंतु यह अपनी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति सदैव सतर्क रहा है , इसलिए इसने साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देने वाली शक्तियों का सैकड़ों वर्ष तक जमकर सामना किया है। आज भी साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देने वाली शक्तियां देश के भीतर सक्रिय हैं । जो देश की एकता और अखण्डता को तार-तार कर देना चाहती हैं और किसी भी प्रकार से किसी सम्प्रदाय विशेष का शासन स्थापित कर एक सम्प्रदाय को समूल नष्ट कर देने के षडयंत्रों में संलिप्त हैं।
संसदीय लोकतंत्र में अपनी गहन आस्था और प्रतिबद्धता के लिए विख्यात भारत विविधता में एकता का अनूठा संगम माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि आधुनिक भारत के निर्माताओं की बौद्धिक सूझबूझ एवं प्रयासों का ही परिणाम है कि स्वतंत्रता के बाद हम अपने देश की विविधता और अखण्डता की रक्षा करने में सफल रहे। इस पर हमारा मानना है कि हम देश में साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रति पूर्णतया सतर्क व सावधान रहने के साथ – साथ हम अपने देश की एकता और अखंडता के प्रति शत्रुभाव रखने वाले लोगों के प्रति भी सावधान और सतर्क रहें। जो भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत को तो नष्ट करना ही चाहते हैं साथ ही इस देश को तोड़ देने का विचार भी रखते हैं और सनातन मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों का सामूहिक नरसंहार कर सत्ता को कब्जाने की चालों में फँसे रहते हैं।
राष्ट्रवादी लेखक और चिंतक विनोद सर्वोदय जी का यह कथन बहुत ही प्रासंगिक है :– “आज समाज जागरुक हो गया है। अब असत्य व अन्याय सहकर प्रताड़ित होंते रहने का समय नहीं, हिंदुओं ने एक तरफा हुए अपने ही सगे-संबंधियों के भीषण कत्लेआमो को झेला है । उन्होंने अपनी भीरुता और कायरता से हज़ारों मंदिरो को विंध्वस होते देखा है और साथ ही अपनी व देश की अनन्त सम्पदा को लुटवाया है। अत्याचारों से चीखती -विलखती बहन बेटियों की चीत्कार को आज भी भुलाया नहीं जा सकता। कब तक इतिहास के काले पन्ने सार्वजनिक नहीं किये जायेंगें ? एक वर्ग दूसरे वर्ग को लूटता रहें , उनकी बहन बेटियों को उठाता रहें, उसकी दुकान -मकान आदि सम्पति को जलाता रहे तो वो कब तक चुप रहकर क्यों कर सद्भाव की बड़ी बड़ी बातें कर पायेगा ? जबकि “द पॉलिटिक्स ऑफ कम्युनिलिज्म 1989″ की लेखिका एवं मुस्लिम स्कॉलर जैनब बानो के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि 75% साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत मुसलमान ही करते है । दशकों पूर्व जब भिवंडी ( महाराष्ट्र) में हुए दंगो पर 14 मई 1970 को जनसंघ के नेता के रुप मे श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा उसके कुछ अंश… ” डेढ साल में हुए प्रमुख दंगो के कारणों की जांच एवं उसके विवरण भारत सरकार के द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में उपलब्ध हैं। उस काल में 23 दंगे हुए और मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार उन 23 दंगों में से 22 दंगों का प्रारंभ उन लोगों ने किया जो अल्पसंख्यक समुदाय के माने जाते है।” (वही पृष्ठ-254)। ऐसे में साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका से अधिक और कुछ नही। ”
केन्द्र सरकार ने आतंकवादी और साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों की सहायता के लिए केन्द्रीय योजना आरम्भ की है। इसके अन्तर्गत प्रभावितों को मुआवजे के अलावा एक बार तीन लाख रुपए की सहायता दी जाती है। सरकार ने ‘धार्मिक संस्थान (दुरुपयोग की रोकथाम) कानून, 1988’ बनाया है। जिसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक स्थल की पवित्रता को बनाए रखना तथा राजनीतिक, आपराधिक एवं विध्वंस या साम्प्रदायिक कार्यों के लिए दुरुपयोग किए जाने पर रोक लगाना है। इस कानून में किसी भी धार्मिक स्थल के भीतर हथियारों एवं आग्नेयास्त्रों के भण्डारण पर पाबन्दी है। इसमें प्रबन्धकों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे ऐसी किसी भी स्थिति के उत्पन्न होने पर धर्मस्थल का दुरुपयोग रोके जाने के लिए पुलिस को जानकारी दें।
पूजा स्थल (विशेष स्थान) कानून, 1991 में पूजा के किसी भी स्थल की स्थिति, जो 15 अगस्त 1947 को विद्यमान थी, को बदलने पर पाबन्दी लगाई गई है। इस कानून के अनुसार किसी भी धार्मिक संस्थान या उसके प्रबन्धक द्वारा ऐसे किसी भी परिसर का उपयोग किसी राजनीतिक गतिविधि या किसी अपराधी को शरण देने के लिए नहीं किया जा सकता है। बिना किसी वैध लाइसेंस या अनुमति के किसी भी धार्मिक स्थल मे किसी तरह का नया निर्माण न तो किया जा सकता है और न ही विद्यमान निर्माण में किसी भी तरह से फेरबदल/हटाने  का काम किया जा सकता है। ऐसे स्थलों का उपयोग किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जाना तथा विभिन्न धार्मिक समुदायों, नृजातियों, भाषाओं, जातियों, धर्मों या क्षेत्रीय समूहों के बीच किसी भी तरह की दुर्भावना फैलाने के लिए नहीं कर सकते हैं।
हमारा मानना है कि हम अपने देश में किसी भी व्यक्ति से इस आधार पर घृणा न करें कि वह हमसे अलग पूजा पद्धति रखता है – यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए । साथ ही हम स्वयं को राष्ट्र के सुरक्षा प्रहरी मानकर इस बात के प्रति भी सतर्क रहें कि कोई भी व्यक्ति साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से इतना ग्रसित ना हो जाए कि वह देश की एकता और अखण्डता को या इस देश के सांस्कृतिक मूल्यों को या संवैधानिक परम्पराओं को नष्ट करने की सोचता हो । ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति समूहों के प्रति भी हमारा कर्तव्य है कि उन्हें हम कठोर दंड दिलाने के लिए कानून के हाथों में सौंपें । साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के नाम पर प्रत्येक व्यक्ति को सहन करना या फिर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सहिष्णुता का भाव रखना भी आत्मघाती होता है । अतः ऐसी प्रवृत्ति से बचना ही उचित सतर्कता को अपनाना माना जाना चाहिए।
(मेरे द्वारा लिखित पुस्तक : “हमारे मौलिक अधिकार और कर्तव्य” से)

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं “भारत को समझो” अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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