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राजस्थानी को कब हासिल होगा निज भाषा का गौरव?

देवेन्द्रराज सुथार
जालौर, राजस्थान

मातृभाषा किसी भी देश या क्षेत्र की संस्कृति और अस्मिता की संवाहक होती है. इसके बिना मौलिक चिंतन संभव नहीं है. नई शिक्षा नीति में कक्षा 5 तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में रखने की बात कही गई है, लेकिन राजस्थान के लोग मातृभाषा में शिक्षा पाने से वंचित हैं. अभी तक राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है यानी इसे आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं दिया गया है. ग़ौरतलब है कि 1936 में राजस्थानी को पहली बार संवैधानिक दर्जा देने की मांग उठी थी, लेकिन 2003 में राज्य विधानसभा में इस पर सहमति बनी और प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया. केंद्र ने ओडिशा के वरिष्ठ साहित्यकार एस.एस. महापात्र के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया. उन्होंने दो साल बाद रिपोर्ट सौंपी. इसमें राजस्थानी और भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने योग्य घोषित किया गया. 2006 में तत्कालीन गृह मंत्री ने चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल में राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा देने का आश्वासन दिया. लिहाजा बिल भी तैयार कर लिया गया. लेकिन आज तक पेश नहीं किया गया.

संविधान की मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में राजस्थानी 17 भाषाओं से बड़ी है. सिंधी केवल 10 लाख लोगों द्वारा बोली जाती है जबकि राजस्थानी बोलने वाले 14 करोड़ लोग हैं. राजस्थानी भाषा को नेपाल, पाकिस्तान आदि देशों में मान्यता है. शिकागो, मॉस्को, कैम्ब्रिज जैसे नामी विश्वविद्यालयों समेत दुनिया के कई और विश्वविद्यालयों में राजस्थानी पढ़ाई जाती है. राजस्थानी में एक-एक शब्द के 500-500 पर्यायवाची शब्द मिलते हैं. उदाहरण के लिए पति-पत्नी के 500-500, ऊंट के 150, बादल के 200, लाठी के 60, भैंस के 50 पर्यायवाची शब्द हैं. कृष्ण भक्त मीराबाई राजस्थानी में ही लिखती थीं. विचित्र बात है कि राजस्थान को मीरा की धरती तो कहते हैं, लेकिन उस मीरा का यश बढ़ाने का काम जो भाषा करती है उसे ख़ारिज कर दिया जाता है. इस कारण नई पीढ़ी राजस्थानी को भूलती जा रही है.

30 मार्च, 1949 को राजस्थान एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आ तो गया, लेकिन इतने सालों के बाद भी राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिली है. ‘एक और अंतरीप पत्रिका’ के संपादक एवं साहित्यकार अजय अनुरागी कहते हैं कि, ‘राजस्थानी भाषा पांच उप-भाषाओं का समन्वित रूप है. मेवाड़ी, मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाती और हाड़ौती. इसके अलावा राजस्थान के कुछ हिस्से में ब्रज, पंजाबी आदि भी बोली जाती है. इसका मानक व्याकरण न होना भी इसका न्यून पक्ष रहा है.’ कवि एवं ग़ज़लकार सोमप्रसाद साहिल लंबे समय से राजस्थानी भाषा में लेखन कर रहे हैं और कई पुस्तकें भी लिख चुके हैं, वे बताते हैं कि, ‘राजस्थानी को मान्यता न मिलने के कारणों में सबसे बड़ा कारण राजस्थानी लिपि का अभाव है. साथ ही प्रत्येक क्षेत्र की अपनी बोली हैं, जैसे हाड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, ढूंढाड़ी इत्यादि. इसीलिए संपूर्ण राजस्थान राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर संगठित नहीं है. जिस दिन राजस्थान एक स्वर में राजस्थानी की मान्यता को लेकर आवाज़ उठाएगा, उस दिन मान्यता का स्वप्न साकार हो जाएगा.’ अजमेर की साहित्यकार डाॅ. पूनम पांडे कहती हैं कि, ‘राजस्थानी विविधता से भरी है मगर एक ही कमी है कि इसकी लिपि नहीं है. लिपि का न होना एक संवैधानिक बाधा बना हुआ है, लेकिन आज तो कहने-सुनने का समय फिर से आ गया है. आज सोशल मीडिया के कितने माध्यम बस बोलकर और सुनकर अपना उद्देश्य न केवल निभा देते हैं वरन सार्थक भी कर देते हैं. लेकिन संविधान की सजी हुई महफ़िल में भी उसे एक भाषा के रूप में आना ही चाहिए.’

जयपुर के साहित्यकार मोहन मंगलम बताते हैं कि, ‘यह हर भाषा प्रेमी के लिए अत्यंत कष्ट का विषय है कि राजस्थानी भाषा वर्षों से मान्यता के लिए तरस रही है. सरकार का अपना रुख़ है, अपनी सीमाएं हैं, मगर हम नागरिकों का भी कुछ कर्त्तव्य बनता है. क्या हम सभी राजस्थानी भाषा का प्रयोग अपने दैनंदिन के कार्यों में करते हैं? क्या हम अपनी संतानों को राजस्थानी भाषा बोलने के लिए प्रेरित करते हैं? जब तक हम खुद राजस्थानी भाषा को अपने दैनंदिन जीवन में अनिवार्यतः उपयोग करने के बजाय वैकल्पिक भाषा की तरह बरतेंगे, सरकार भी इसकी मान्यता के प्रति गंभीर नहीं होगी.’

हाल ही में राज्य की विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने राजस्थानी भाषा को राजभाषा बनाने और राजस्थानी भाषा को माध्यमिक शिक्षा मंडल में शामिल करने की मांग की. इस पर राजस्थान सरकार में शिक्षा मंत्री डॉ. बीडी कल्ला ने समर्थन करते हुए कहा कि, ‘राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए इसे आठवीं अनुसूची में जोड़ना होगा. इसके लिए केंद्र सरकार को कई पत्र लिखे जा चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार गंभीर नज़र नहीं आ रही है. यह राज्य के 10 करोड़ लोगों की भावनाओं का सवाल है. यह समझना होगा कि राजस्थानी भाषा को मान्यता न मिलने के कारण यहां की कला, संस्कृति, विरासत और संस्कार जड़ से नष्ट हो रहे हैं. राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से राजस्थान राज्य के प्रत्येक जिले के लोगों को शिक्षा और रोज़गार प्राप्त करने में मदद मिलेगी. (चरखा फीचर)

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