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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से मुद्दा विशेष संपादकीय

आवश्यकता जलस्रोतों के बचाव की

देश व प्रदेश में जलस्तर गिरता जा रहा है, जो कि एक चिंता का विषय है। उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने प्रदेश में जलस्रोत के नीचे खिसकने पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि खेत तालाब योजना के अंतर्गत 3338 तालाब खोदे जाएंगे। श्री शाही एक सुलझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वह ठीक दिशा में सोच रहे हैं। यदि हमने उन्हें जल स्रोत बनाकर नही दिये तो हम आने वाली पीढ़ी को विनाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सौंपेंगे।
श्री शाही को हमारा सुझाव है कि उत्तर प्रदेश में ‘जमींदारी विनाश अधिनियम-1950’ से लागू हुआ था तब उत्तर प्रदेश के तालाबों की राजस्व अभिलेखों में और भूचित्र में जैसी स्थित थी वैसी ही मौका पर स्थापित कराने की दिशा में कार्य किया जाए। इसके लिए प्रत्येक जिलाधिकारी से प्रत्येक गांव, नगर और कस्बे के तालाबों की विवरणिका उपलब्ध करा ली जाए और उन्हें 1950 की स्थिति में लौटाया जाए। हम जितना शीघ्र अपने तालाबों को 1950 की स्थिति में स्थापित कर देंगे उतना ही उचित होगा।
तालाबों को 1950 की स्थिति में स्थापित कराना और उन्हें खोदकर पानी से भरना कोई बड़ा कार्य नहीं है, अपितु यह एक वर्ष में पूर्ण हो सकता है। आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति के प्रदर्शन की है। वैसे प्रदेश में 80 हजार से अधिक गांव हैं और शहर व कस्बे अलग हैं, इसलिए यदि सही प्रकार से सर्वेक्षण कराया जाए तो पता चलेगा कि तालाबों पर अवैध अतिक्रमण लगभग हर गांव, शहर व कस्बे में हुआ मिलेगा। इसलिए 3338 तालाबों के स्थान पर हो सकता है 33380 तालाब खोदने पड़ जाएं, पर फिर भी यह कार्य कोई बड़ा कार्य नहीं है। मानवाधिकारवादी संगठन इस दिशा में सरकार का सहयोग करें। इन संगठनों का उद्देश्य किसी आतंकी की फांसी रूकवाना नहीं है, अपितु मानव स्वास्थ्य व सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव डालने वाले प्रत्येक स्थिति परिस्थिति से मानव समाज की रक्षा करना है। यदि जीना मनुष्य का अधिकार है तो स्वच्छ पानी प्राप्त करना भी उसका अधिकार है। इसलिए समाज के उन दबंग लोगों से जल स्रोतों को मुक्त कराने में सहायता देना मानवाधिकारवादी संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए जिनके कारण न केवल मानवजीवन के लिए संकट उत्पन्न हो गया है अपितु अन्य पशुपक्षियों के लिए भी जीवन का अस्तित्व बचाये रखना कठिन हो चुका है। 
श्री शाही को चाहिए कि ‘गांव का पानी गांव में’ रोकने की व्यवस्था की जाए। वर्षाजल संचय पर जोर दिया जाए, और जितना संभव हो सके-उतना वर्षा जल को गांव में रोका जाए। वर्षा जल हमारे लिए प्रकृति की और परमेश्वर की व्यवस्था की दी हुई अनमोल निधि है। यह पानी हमें पूर्णत: शुद्घ रूप से मिलता है जिसकी रही सही कमी को भूगर्भ स्वयं ठीक कर लेता है और जब हम उसे नल, कुंआ या ट्यूबवैल से पीने के लिए प्राप्त करते हैं तो उस समय वह हमारे लिए पूर्णत: पीने योग्य हो चुका होता है। उसे किसी आर.ओ. से निकालने की आवश्यकता नहीं होती। अत: वर्षाजल संचय की ओर ध्यान दिया जाए। बड़े-बड़े तालाबों में वर्षाजल संचय करने से खेती की भी भराई की जा सकती है। इससे छोटी-छोटी गूलें बनाकर इनसे खेती में प्रयोग किया जा सकता है। ऐसा करके हम भूगर्भीय जल दोहन से बच सकेंगे। ईश्वर ने हमें वर्षाजल भूगर्भ में भरने के लिए दिया है और हम अपने दरवाजे बरसी ईश्वरीय कृपा को नदी नालों में बह जाने देते हैं-इससे पता चलता है कि मानव समाज अपने ही भविष्य के प्रति कितना असावधान हो चुका है।
यदि हम वर्षाजल संचय की ओर ध्यान दें तो इससे नदियों का जलस्तर भी ऊंचा रहेगा। क्योंकि तब हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए नदियों पर अपनी निर्भरता को कम करने का अवसर मिलेगा और वे बेहिचक बह सकेंगी, अन्यथा ये बहुत शीघ्र सूखकर हमारे विनाश की दस्तक देने जा रही हैं। बड़ा दुख होता है जब किसी जीवित नदी में छिलछिला पानी दिखायी देता है और वह भी किसी गंदे नाले का होता है-जो कुछ दूर चलकर धरती के गर्भ में समा जाता है, और इस प्रकार वह गंदे नाले का पानी भूगर्भीय जल को भी प्रदूषित करता है।
स्वच्छता अभियान के अंतर्गत हमें यह भी व्यवस्था करनी चाहिए कि नदी स्रोतों को सुखाने में सहायक हो रहे गंदे नालों की धारा इन नदियों की ओर से मोड़ दी जानी चाहिए। जिस नदी में शहरों के गंदे नाले आकर पड़ रहे हैं उन नालों का पानी नदी की मुख्यधारा में न मिलाकर बड़े बड़े पाईपों के माध्यम से नदी के साथ नदी के भीतर चलने चाहिएं और शहरों से बाहर जाकर वे नहरों में डालकर खेती की सिंचाई के लिए प्रयोग किये जायें। इससे नदियों की धारा की निर्मलता व पवित्रता बनी रहेगी। साथ ही नालों के साथ आने वाली गंदगी से नदियों का भराव होने से बचेगा और नदी अपने प्राकृतिक रूप में गहराई में बहती रहेगी। ये नाले आदि ही अपने साथ गंदगी को लाकर नदी का भराव करके उसे ऊंचा करते जाते हैं-जिससे नदी के लिए धरती से मिलने वाले जलस्रोतों का मुंह बंद हो जाता है।
इस व्यवस्था को सही प्रकार से लागू कराने के लिए उचित होगा कि शहरों में नालों में मानव मल को बहाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। स्वच्छता अभियान में इस मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए और कोई भी व्यक्ति मानवमल को नालों में न बहा सके ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। 
हमारी ‘उगता भारत’ टीम का प्रत्येक सिपाही इस पवित्र कार्य में सरकार का सहयोग करेगा और तालाबों को सही स्थान पर स्थापित कराने हेतु सही जानकारी उपलब्ध कराने के लिए अपेक्षित प्रयास भी करेगा। हमें आशा है कि इस पवित्र कार्य में जनसहयोग भी मिलेगा और हम सब मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ को पूर्ण कर लेंगे।

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