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भारतीय संस्कृति

गुरु बिन मुक्ति नाही,एक बड़ा प्रपंच* भाग 2

डी के गर्ग

धर्म गुरुओं की मार्केटिंग
वर्तमान मे देश में छोटे बड़े हजार से ज्यादा स्वयंभू धर्म गुरु उपलब्ध है जो स्वयं को भगवान का दूत बताने से नही हिचकते, अधिकांश अनपढ़ है जो चमत्कार दिखाने और आशीर्वाद देने में माहिर हैं,इनके दरबार में खूबसूरत महिलाओं का जमावड़ा रहता है और ये जोड़े में इनकी मार्केटिंग करती है.
इन गुरुओं के अपने अपने अभिवादन है जैसे जय गुरु देव, सदगुरु,गुरु तेरा आसरा आदि. इसी तरह इनके नाम भी है जैसे श्री श्री ,सदगुरु,महा गुरु, परमगुरु आदि।
ये जरूर है कई अधिकांश गुरु कैंसर,लकवा आदि बीमारियों के अल्पकाल में देह त्याग गए और अब इनका परिवार संपत्ति की देखभाल कर रहा है।
ये भोले भाले लोगो को फसाने के लिए प्रसिद्ध दोहे और शोलोको का सहारा लेते हैं, कुछ बानगी देखो,

श्लोक=
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेशरः।
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
इसका उपयोग ये नकली गुरु अपनी महिमामंडल के लिए करते हैं और ब्रह्मा, विष्णु आदि ईश्वर के अनेक नामों से अपनी तुलना कराते हुए फूल कर कुप्पा होते रहते हैं।इसके आगे उनका ध्यान नहीं जाता । वास्तविक अर्थ में इस श्लोक से वेद में स्पष्ट आदेश है कि ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर एवं साक्षात् परमब्रह्म ही गुरु है। उन गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
स्पष्ट है कि- गुरु की उपरोक्त कसौटी पर जो खरा उतर जाता है वही गुरु है। अर्थात जिस प्रकार सोने की कसौटी पर खरा उतरनेवाली धातु ही सोना होती है। ठीक उसी प्रकार गुरु की कसौटी पर खरा उतरनेवाला ही गुरु है। वेद के नियमों के अनुसार- ‘‘श्रीब्रह्मा,‘‘ ‘‘श्रीविष्णु‘‘ और ‘‘श्रीमहेश्वर‘ एवं साक्षात् ‘‘परम् ब्रह्म‘‘ ही गुरु हैं। परन्तु इस श्लोक के वैदिक अर्थ इसलिए बदलकर अवैदिक विधि से वर्तमान मानव-मनीषियों ने समझाया है कि शरीरधारी मनुष्य रूपी गुरु ही ब्रह्मा है और यही मनुष्य रूपी गुरु ही विष्णु है एवं मनुष्य रूपी गुरु ही महेश्वर है तथा मनुष्य रूपी गुरु ही साक्षात् परम् ब्रह्म परमेश्वर है। यदि कोई शरीरधारी मनुष्य स्वयं को गुरु के बहाने ही श्रीब्रह्मा, श्रीविष्णु और श्रीमहेश्वर तथा साक्षात् परम् ब्रह्म कहलवाता है तो ‘‘महासरस्वती‘‘ और ‘‘महालक्ष्मी‘‘ एवं ‘‘महाकाली‘‘ का अपमान ही होगा क्योंकि पिता के अलावा अन्य किसी मनुष्य को पिता स्वीकार करते है तब तो जिसे पिता मानेंगे वही माता का पति कहलायेगा।
2.धूर्त गुरुओ द्वारा भ्रान्ति पैदा करने के लिए कबीर के दोहे और संस्कृत के श्लोक के गलत भावार्थ का इत्यादि का सहारा: प्रयोग में लाये जाने वाले दोहे और इनके उलटे सीधे भावार्थ देखिये :
1 सब धरती कागद करूँ लेखनी सब बन राय ॥
सात समुन्द्र की मसि करूँ , गुरु गुण लिखा न जाय ॥
2 तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे ना करि सकै , गुरु करे सो होय ॥ (वाणी कवीर साहिब)
3 गुरुदेव ‘ का अर्थ जो अन्धकार से प्रकाश में ले जावे , अथवा गुरुदेव गुरु के प्रकाशवान नूरी स्वरूप को कहते हैं । गुरुदेव ‘ पद का सतगुरू के अन्तरी नूरी ( ज्योतिर्मय ) स्वरूप के लिए प्रयोग किया गया है । ‘ गु ‘= अन्धकार और ‘रू ‘ = प्रकाश
4 ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम्’ְ’अर्थात श्रद्धावान ही ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है।
एकलव्‍य ने गुरु द्रोणाचार्य की मृण्‍मयी अर्थात मिट्टी से बनी प्रतिमा से धनुर्विद्या में वह अपूर्व कौशल प्राप्‍त कर लिया था जिसे देख स्‍वयं आचार्य द्रोण भी आश्‍चर्यचकित रह गए थे।
5.शिष्य-समुदाय को पुरातन काल के शास्त्रों से चुने हुए उद्धरण दे-देकर निरंतर यह समझाया जाता है कि इस देव-दुर्लभ मानव चोले को सफल बनाने के लिए देहधारी ‘श्रीगुरु महाराजजी’ की तन-मन-धन से सेवा करना शिष्य का परमकर्तव्य होता है। इनके मन में बहुत गहराई तक यह बिठा दिया जाता है कि ‘गुरुदेव की असीम अनुकंपा को प्राप्त करना ही योगसिद्धि का प्रथम सोपान है। अतः वे जो भी आज्ञा दें उसका प्राणपणपूर्वक पालन करना अनिवार्य है। एक कर्तव्यनिष्ठ शिष्य को चाहिए कि गुरु महाराज जो करते हैं, उसकी तरफ बिल्कुल भी ध्यान न देवे क्योंकि वे निराकार ब्रह्म की साकार मूर्ति हैं, अतः उसका कल्याण इसी में है कि वे जो कहते हैं, उसका पालन करे, बस।’
6.प्रपंची गुरुजन अपने प्रवचनों में आध्यात्मिक ज्ञान का बखान करते हुए देवी-देवताओं, जादू-टोने, झाड़-फूँक, तंत्र-मंत्र, कर्मकांड आदि को झूठा बताते नहीं थकते, परंतु अपने निजी जीवन में समय-समय पर आवश्यकतानुसार इनका आश्रय लेने में इन्हें कोई हिचक अथवा लज्जा का अनुभव नहीं होता। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन मिथ्याचारियों को न तो अध्यात्म का कोई व्यावहारिक ज्ञान ही होता है और न इन्हें स्वयं अपने ऊपर ही विश्वास रहता है।
देश का दुर्भाग्य : अभी अभी बलात्कार के आरोपी नित्यानंद ने स्वयं को शिव का अवतार घोषित कर दिया और नए देश कैलाशा के निर्माण की घोषणा की है। उसके लाखो शिष्य उसको ईश्वर का अवतार मानकर पूज रहे है।
इसी तरह अवतारवाद की शुरुआत हुई थी की पहले गुरु का आशीर्वाद , उसकी मृत्यु के बाद उसको अवतार/पैगम्बर घोषित कर देना। और परिवार के सदस्य ,या रिश्तेदार को गद्दी का उत्तराधिकारी बना देना।

देश भर में ऐसे बने हुए सद्गुरुओं की संख्या सैकड़ों-हजारों में होगी,

ये अनपढ़ गुरु निर्लज्जतापूर्वक बिना सिर पैर का प्रवचन बड़े-बड़े मंचों से बघारते रहते हैं।
इन्हें धर्म के वास्तविक स्वरूप तथा ईश्वर-भक्ति का लेशमात्र भी न तो कोई ज्ञान ही होता है और न इससे इनका किसी भी तरह का दूर तक कोई सम्बंध। ये केवल अपने ही भोग-ऐश्वर्य तथा स्वार्थ-सिद्धि के अंधे कुऐं में गले तक डूबे रहते हैं, उससे बाहर निकलने के सम्बंध में सोचने-समझने का विचार भी इनके अंदर कभी नहीं उठता। यदि ये कभी यह सोचते कि इनका अपना जीवन-लक्ष्य क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, परमतत्व परमेश्वर वस्तुतः क्या है, उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? तो फिर ऐसे लोग उन कर्मों को कदापि नहीं करते जिनमें वे अहर्निश फँसे रहते हैं।
स्वयंभू कलियुगी गुरुओं का कार्य केवल दूसरों को सदुपदेश देने के अतिरिक्त कुछ दूसरा नहीं होता।

ऐसे लोगों पर यह उक्ति स्पष्ट चरितार्थ होती है–
‘पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
जे आचरण करहिं जन थोरे।।’

अनेक प्रकार के मत-मतांतरों तथा पंथ-संप्रदायों के जन्मदाता स्वयंभू गुरु अपने शिष्यों को चाहे प्रभु-भक्ति में मन लगाने की जितनी भी सीख दे लेवें, परंतु स्वयं इनका मन सदैव काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, तृष्णा, राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि अनेक प्रकार के अवगुणों के कारण अत्यधिक चलायमान रहता है।इन्हें स्वयं यह नहीं पता होता कि वस्तुतः उनका अपना जीवन-लक्ष्य क्या है? उनकी वास्तविक चाह क्या है? देव-दुर्लभ मानव-जीवन पाकर उन्हें क्या करना है?

अधिकांश गुरुओं द्वारा अंग्रेजी अक्षर ‘पी’ के पंच-प्रयोग–देश विदेश में विशाल आश्रम,शानदार महल,कीमती गाडियां,प्रसिद्ध फिल्म स्टार और उद्योगपति चेले इनकी शान है ,कोई भी इनका चेला बन जाए सबको आशीर्वाद मिलेगा ,एक हाथ ऊपर उठाकर आशीर्वाद मुद्रा में फोटो तैयार रहती है।

इनकी जरूरत है : अधिकाधिक धन (penny-paisa), सम्पत्ति (property), शक्ति (power), आत्म-प्रचार (publicty) तथा राजनैतिक संरक्षण या लाभ (political benefits) प्राप्त करने की जुगत में व्यस्त रहते हैं।

धूर्तों गुरुओं के विषय में गोस्वामी जी ने ठीक ही लिखा है–
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुरु घोर नरक महुँ परई।।(रामचरितमानस–उत्तरकांड/98-4द्)
अर्थात्–जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, परंतु शोक नहीं हरता, वह घोर नरक में पड़ता है।

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