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विश्वगुरू के रूप में भारत

भारत के महान वैज्ञानिक महर्षि कणाद

भारत ऋषि और कृषि का देश है। इसकी ऋषि परंपरा ने ऐसे अनेक महान वैज्ञानिक ,अनुसंधानकर्ता, बुद्धि की उत्कृष्टता में ढले हुए महापुरुष संसार को दिए हैं , जिनकी दिव्यकीर्ति से संसार आज तक आलोकित है। महर्षि कणाद भारत की ऋषि परंपरा की एक ऐसी ही दिव्य और भव्य महान विभूति हैं। जिनका जन्म गुजरात के प्रभास ( द्वारिका ) क्षेत्र में हुआ था । कुछ विद्वानों की मान्यता है कि उनका जन्म ईसा से 600 वर्ष पूर्व हुआ था। वैशेषिक दर्शन के आदि प्रवर्तक ऋषि कणाद को ‘कणभुक्’, ‘कणभक्ष’ इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। त्रिकाण्डशेष कोष में इनका नाम ‘काश्यप’ भी कहा है। कणाद कश्यप के पुत्र थे ऐसा किरणावली में लिखा है, इसी से उनका नाम काश्यप भी बोला जाता है।
इनका एक नाम ‘औलूक्य’ भी है। उलूक ऋषि का पुत्र होने से उनका यह नाम लिया जाता है । कहा नहीं जा सकता कि कश्यप और उलूक एक ही ऋषि के नाम हैं या अलग अलग हैं? उलूक मुनि विश्वामित्र के पुत्र थे जिन के विषय में महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 4 में लिखा है। प्रमाणिक आधार पर बात करें तो वायु पुराण, पूर्वखण्ड, 23 अध्याय में कणाद के प्रसङ्ग में लिखा है कि वे सत्ताइसवीं चतुर्युगी में प्रभास क्षेत्र में शिव जी के अवतार सोमशर्मा नाम ब्राह्मण के शिष्य थे।
जब संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का साम्राज्य था तो उस समय भारत के महान ऋषियों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत संपूर्ण भूमंडल का मार्गदर्शन किया करते थे। समस्त संसार के ज्ञान पिपासु लोग भारत की ओर बढ़े चले आते थे। उनकी भारत की ओर बढ़े चले आने की इच्छा का एकमात्र कारण अपनी ज्ञान पिपासा को शांत करना होता था। महर्षि कणाद उन्हीं ऋषियों में से एक थे, जिन्होंने संसार का उपकार करते हुए अनेक वैज्ञानिक सिद्धांत प्रतिपादित किए और समस्त संसार का अपने बौद्धिक बल से मार्गदर्शन किया। यह पहले ऋषि थे जिन्होंने परमाणु के संबंध में हमें विस्तार से बताया। संसार के लोगों को महर्षि कणाद ने बताया कि भौतिक जगत की उत्पत्ति सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण अर्थात परमाणुओं के संघनन से होती है। हमारे ज्ञान विज्ञान की चोरी करने में पारंगत रहे पश्चिमी जगत के लोगों ने बाद में हमारे इस महान ऋषि का परमाणु संबंधी यह ज्ञान विज्ञान जॉन डाल्टन ( 6 सितंबर 1766 से 27 जुलाई 1844) के खाते में दर्ज कर दिया।
महर्षि कणाद ने ही गति के नियम भी स्थापित किए। उन्होंने अपने वैशेषिक दर्शन में स्पष्ट लिखा है कि :-
वेगः निमित्तविशेषात कर्मणो जायते। वेगः निमित्तापेक्षात कर्मणो जायते नियतदिक क्रियाप्रबन्धहेतु। वेगः संयोगविशेषविरोधी।।

अर्थात्‌ : ‘गति पांच द्रव्यों पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है।’
बाद में सन 1687 की जुलाई में सर आइज़क न्यूटन ने गति के इन नियमों को अपने नाम से प्रकाशित कर दिया। अपने नाम भारत के ज्ञान विज्ञान को कर लेने की मुहिम में लगे पश्चिमी जगत के लोगों ने शोर मचा कर झूठ को भी सच कर दिया और न केवल पश्चिम के देशों में बल्कि संसार के अन्य देशों में भी फिर यही पढ़ाया जाने लगा कि गति के नियमों को स्थापित करने वाला सर आइज़क न्यूटन था। इस प्रकार महर्षि कणाद का परिश्रम और पुरुषार्थ कूड़ेदान में फेंक दिया गया या भुला दिया गया। शक्ति और गति के बीच संबंध का वर्णन करने संबंधी सूत्र महर्षि कणाद ने वैशेषिक सूत्र में लिखा था।
विद्वत्ता और वैज्ञानिक चिंतन के धनी महर्षि कणाद ही संसार के ऐसे पहले वैज्ञानिक ऋषि थे जिन्होंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को भी प्रतिपादित किया। यद्यपि उनके जन्म से पूर्व भी भारत के लोग अर्थात हमारे महान पूर्वज गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से परिचित थे, परंतु उसे विधिवत प्रतिपादित कर एक नाम देने का काम इसी महान ऋषि के द्वारा किया गया था। इसके संबंध में भारत के महान वैज्ञानिक भास्कराचार्य ने भी विस्तार से हमें बताया है। वर्तमान विश्व न्यूटन को गति के सिद्धांत का जन्मदाता मानता है। वर्तमान विश्व की ऐसी मान्यता पूर्णतया निराधार है।
आधुनिक संसार परमाणु बम के जनक के रूप में भी भारत की ओर न देखकर इस बम के तथाकथित आविष्कारक जे0 रॉबर्ट ओपेनहाईवर की ओर देखता है। माना जाता है कि इसी वैज्ञानिक के नेतृत्व में 16 जुलाई 1945 को परमाणु बम का पहला सफल परीक्षण संभव हो पाया था। हम यह भूल जाते हैं कि जैसे ही परमाणु बम मानव के हाथों में आया तुरंत वह दानव बन बैठा। 6 और 8 अगस्त 1945 को उसने अपना दानवतावादी स्वरूप दिखाकर दुनिया को दहला दिया, जब जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम वर्षा करके बड़ी संख्या में लोगों को मार दिया था। जबकि इससे पहले जब परमाणु शक्ति का ज्ञान हमारे ऋषियों को था तो उन्होंने इस प्रकार से निरपराध लोगों का संहार करने के लिए कभी हथियारों का दुरुपयोग नहीं किया और ना ही राजशक्ति के माध्यम से होने दिया। उस समय घातक हथियारों पर नियंत्रण बौद्धिक और विवेक शक्ति संपन्न ऋषियों का हुआ करता था, आजकल की भांति आतंकवादियों का नहीं। हमारे ऋषियों का चिंतन पूर्णतया सात्विक था, जबकि 1945 की जुलाई में परमाणु बम बनाने वाले लोगों का चिंतन पूर्णतया तामसिक था।विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबुरक ने अणुशास्त्र में आचार्य कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना है।
महर्षि कणाद परमाणु वाद के इतने दीवाने हो गए थे कि अपने अंतिम समय में भी उन्होंने पीलव:, पीलव:, पीलव: अर्थात परमाणु, परमाणु, परमाणु शब्द ही उच्चरित किए थे। इन शब्दों के उच्चारण का अभिप्राय यह नहीं कि वह नास्तिक थे या परमपिता परमेश्वर की सत्ता को या उसके नाम को कहीं कम करके आंक रहे थे अपितु इसका अभिप्राय केवल एक ही था कि वह परमाणु में भी उस परमपिता परमेश्वर को सत्ता को समाहित देख रहे थे जिसके कारण यह सारा जगत और ब्रह्मांड की सभी शक्तियां गतिमान हैं। आज का विज्ञान और वैज्ञानिक परमाणु वाद का इस अर्थ और संदर्भ में दीवाना नहीं है। संभवत: यही आज के विज्ञान और वैज्ञानिक की सबसे बड़ी दुर्बलता है।
आज का वैज्ञानिक वैशेषिक दर्शन के अनुसार ‘विशेष’ को नहीं समझ पाया है। जी हां , वही ‘विशेष’ जो इस समस्त चराचर जगत का आधार है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

 

 

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