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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से मुद्दा राजनीति विशेष संपादकीय

‘पत्थरबाजो! भारत छोड़ो,’ भाग-5

(50) कोच्चीन, त्रावणकोर- इन दोनों क्षेत्रों में मुस्लिम शासन एक दिन भी नहीं रहा। जबकि 1857 ई. से यहां अंग्रेजी राज्य अवश्य आ गया।
इस प्रकार के परिश्रम साध्य विषय को समझकर और देखकर हमें ज्ञात होता है कि अंग्रेजों का भारत में विस्तार सामान्यता 1820 ई. से बाद का है। उसमें भी अधिकांश 1857 ई. में आकर हुआ है। इस प्रकार अंग्रेजों के विषय में जो लोग भावुकता में यह कह देते हैं कि अंग्रेजों ने भारत पर 200 वर्ष तक शासन किया, वे बिना तथ्यों की पड़ताल किये ऐसा बोल जाते हैं। अंग्रेजों का अधिकांश भारत पर मात्र 90 वर्षीय शासन रहा है। इस शासन के विषय में हम आगे चलकर यथा स्थान स्पष्ट करेंगे कि इन दिनों भी में भी अंग्रेजों को भारतवासियों ने शांत रहकर शासन नही करने दिया था। 
ऊपर दी गयी इस तालिका से यह भी स्पष्ट है कि देश के कुछ स्थान ही ऐसे रहे हैं जिन पर मुस्लिम शासन 500 वर्ष से अधिक रहा है। अधिकांश भारत ऐसा रहा है जहां पर या तो मुस्लिम शासन रहा ही नहीं या रहा तो कुछ काल के लिए ही रहा। 
दिल्ली में अंग्रेज केवल 35 वर्ष ही रहे
अंग्रेजों ने दिल्ली पर 1857 से 1947 तक 90 वर्ष तक अपना नियंत्रण स्थापित रखा। इसमें भी उन्होंने 1912 ई. में दिल्ली के लिए अपनी राजधानी का परिवर्तन किया। उससे पहले वे कलकत्ता से शासन करते रहे थे। दिल्ली में अंग्रेज शासक की हैसियत से केवल 1912 से 1947 तक मात्र 35 वर्ष ही रहा था। 1758 से 1858 तक दिल्ली पर मराठों का शासन था। यदि दिल्ली पर अंग्रेजों का 200 वर्षीय शासन माना जाएगा तो मराठों के दिल्ली पर शासन को कहां फेंका जाएगा?
शिवाजीकाल में मुगल साम्राज्य दिल्ली से आगरा तक सिमट गया था
हमें विन्सेंट ए. स्मिथ (दि आक्सफोड हिस्ट्री ऑफ इंडिया, ऑक्सफोर्ड लंदन रीप्रिय 1961 बुक 6 उपखण्ड 3) से पता चलता है कि ”महाराज शिवाजी के उत्थान से मुस्लिम साम्राज्य नाम की कोई चीज भारत में नहीं बची थी, केवल दिल्ली से आगरा तक ही मुगलों की वास्तविक सत्ता चलती थी। 1680 ई. में (जब शिवाजी संसार से गये तो उस समय कैसी क्रांति उत्पन्न हो चुकी थी, यह देखने योग्य तथ्य है) तो संपूर्ण भारत मुख्यत: मराठों और उनसे संधि कर चुके राजपूतों, बंगाली, हिंदू नरेशों, उडिय़ा हिंदू नरेशों, जाटों आदि के आधीन था। वारेन हेस्टिंग्स के समय में बिहार, बंगाल, महाकौशल, मध्यप्रदेश, विदर्भ, महाराष्ट्र, गुजरात और संपूर्ण राजपूताने पर हिंदुओं का राज्य था। साथ ही पंजाब और कश्मीर पर सिखों का राज्य था। मैसूर राज्य भी हिंदुओं के आधीन था। 
ऐसी स्थिति में निजाम हैदराबाद, सिंध और अवध के कुछ हिस्से ही मुख्यत: मुस्लिम शासन में थे। जितने भाग में मुस्लिम वर्चस्व था उससे दोगुने से अधिक हिस्से में भारत में हिंदुओं का शासन  18वीं शताब्दी में था।”
दामोदरलाल गर्ग अपनी पुस्तक ‘भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ के पृष्ठ 11 पर लिखते हैं :-
”भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का जैसा व्यवहार रहा उसकी आलोचना करते हुए एक यूरोपियन इतिहासकार लिखते हैं कि इस पर किसी प्रकार का संदेह नही किया जा सकता कि भारत के साथ प्रारंभिक संपर्क में जो व्यवहार (अंग्रेजों की ओर से) किया गया, वह सत्य और सदाचार के नाम पर कंपकंपी पैदा करने वाला है। उस व्यवहार की निंदा प्रत्येक ईमानदार ईसाई करेगा। जिन्हें न्याय पसंद था और जीवन में कलंक नहीं चाहते थे उन्होंने भी इन लोगों की हरकतों की निंदा की। एक अंग्रेज अधिकार का कथन है :- ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल को जिस प्रकार हस्तगत किया उसमें झूठ बोलने और मक्कारी के अतिरिक्त और कुछ नही था।”
कंपनी के दूषित व्यवहारों से ‘राज्य और सिद्घांत’ का जिस प्रकार हनन होता है, उसके आधार पर विलियम हाबिट साफ-साफ कहते हैं :-
”भारत में कब्जा करने के लिए ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ को जिस दूषित नीति से काम लेना पड़ा, ईसाई नीति के प्रतिकूल उसमें अधिक नीचता की कल्पना नहीं की जा सकती। मक्कारी और शैतानी का सबसे बुरा यदि कोई रास्ता हो सकता था, जिसमें अन्याय की सीमा को पार किया गया हो परंतु न्याय का आवरण उसके ऊपर रखा गया हो और अमानुषिक व्यवहारों का लज्जाजनक प्रदर्शन किया गया हो तो उन तरीकों और उपायों से भारतवर्ष का शासन छीनकर ब्रिटिश राज्य में सम्मिलित किया गया।
जब हम दूसरी जातियों के सामने अंग्रेजों की न्यायप्रियता की प्रशंसा करते हैं, तो भारत की ओर संकेत करके हमारा उपहास किया जाता है।
करीब सौ वर्षों तक जिन उपायों से हिंदुस्थान के देशी राजाओं से उनकी रियासतें छीनी गयीं और न्याय तथा ईमानदारी का जामा पहनाकर उनसे अधिक जालिमाना तरीका, राजनैतिक तथा धार्मिक किसी क्षेत्र में देखने को नही मिलेगा।”
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के साथ जिस अमानुषिक नीति का प्रदर्शन किया था, उसकी आलोचना करते हुए एक प्रसिद्घ दार्शनिक लिखते हैं :-
”पिछली शताब्दी में अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ जो जुल्म किये, वे जुल्म पेरू, और मैक्सिको के रहने वालों के अत्याचारों की याद दिलाते हैं। 
सोचने की बात यह है कि उनके कारनामे कितने घृणास्पद रहे होंगे, जबकि कंपनी के निदेशकों तक ने स्वीकार किया है कि भारत में व्यापार करके जो बड़ी से बड़ी संपत्ति पैदा की गयी उनमें उतना ही बड़ा अन्याय और जुल्म भरा हुआ है, जितना बड़ा जुल्म संसार के इतिहास में कहीं सुनने और पढऩे को नहीं मिलेगा। भारतीय माल के खरीदने का भाव अंग्रेज व्यापारी स्वयं तय करते थे और माल बेचने का भाव भी इन्हीं अंग्रेजों के हाथों में था। भारतीय लोग उनको माल बेचने और उन्हीं से खरीदने को विवश थे, चूंकि जो हिंदुस्थानी अपना माल बेचने और खरीदने से मना करता था उसे जेल की सजा मिलती थी। अंग्रेजों की यह खुली नीति थी कि भारतीयों के साथ दगाबाजी से काम लिया जाए, और उनको आपस में लड़ा-लड़ाकर लाभ उठाया जाए। यही उन्होंने किया भी, उन्हें आपस में लड़ाया गया और एक-एक की मदद करके उनसे अनुचित तथा नाजायज लाभ उठाया गया।”
अंग्रेज मुगलों से अधिक निर्दयी रहे?
इस प्रकार के विवरणों से स्पष्ट है कि अंग्रेज लोग हिंदुस्तानी लोगों के प्रति मुगलों से अधिक निर्दयी थे। मुगलों को कई इतिहासकारों ने जनसाधारण के प्रति अत्यंत दयालु और उदार होने का भ्रम उत्पन्न किया है। अब प्रश्न यह आता है कि यदि मुगल जनसाधारण के प्रति अत्यंत दयालु और उदार थे, तो अंग्रेजों को भारत में बसाने और उन्हें व्यापार की एक से एक बढक़र एवं सुविधा उपलब्ध कराने वाले भी तो मुगल ही थे। हम पूर्व में अकबर और जहांगीर के विषय में बता चुके हैं कि दोनों मुगल बादशाहों के काल में किस प्रकार अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की सुविधाएं मिल गयीं थी?
इनके पश्चात 1628 ई. में हिंदुस्थान का बादशाह शाहजहां बना, तो उसने अपने शासन के 12वें वर्ष में अंग्रेजों को कलकत्ता में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। बादशाह शाहजहां ने यहां से पुर्तगालियों को उनके दुराचरण के कारण भगा दिया था, इसलिए कलकत्ता को अंग्रेजों ने अपने लिए प्राप्त कर लिया। 
अंग्रेजों को अपने माल पर चुंगी देनी पड़ती थी उसे भी शाहजहां ने समाप्त कर दिया। इसका कारण यह भी बताया गया है कि बादशाह की बेटी जहांनारा इन दिनों आग में जल गयी थी। जिसका दरबार के वैद्य और चिकित्सकों ने भरपूर उपचार किया, परंतु वह स्वस्थ न हो पा रही थी, तब कंपनी ने अपने डॉक्टर गैबरील बागटन को जहांनारा के उपचार हेतु भेजा। डा. बागटन के उपचार से जहांनारा शीघ्र ही स्वस्थ हो गयी। तब बादशाह ने डा. बागटन से पूछा कि तुम्हें इस सेवा के बदले में क्या दिया जाए?
डा. बागटन बादशाह के प्रस्ताव की मानो प्रतीक्षा ही कर रहा था। उसका देशभक्त हृदय बादशाह के प्रश्न पर झूम उठा। तब उसने बादशाह से करबद्घ प्रार्थना करते हुए कहा-”जहांपनाह, कंपनी को अपने माल पर जो चुंगी देनी पड़ती है, उसे माफ कर दिया जाए।”
बादशाह ने बिना आगे-पीछे सोचे अपनी ओर से राजाज्ञा जारी करा दी कि ईस्ट इंडिया कंपनी के माल पर चुंगी समाप्त कर दी गयी है, भविष्य में इनसे कोई चुंगी ना ली जाए।
अंग्रेजों को व्यापारिक बुद्घि चातुर्य
इसे कहते हैं व्यपारिक बुद्घि चातुर्य। एक व्यक्ति ने अपना शुल्क बड़ी भारी राशि के रूप में प्राप्त कर लिया और बादशाह को पता भी न चला। इससे पूर्व शाहजहां के पिता जहांगीर को सर टॉमस रो ने ‘हुक्का’ देकर उससे व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी।
इसके पश्चात औरंगजेब को भी इन लोगों ने बड़े सस्ते में खरीदने का प्रयास किया। औरंगजेब को जब शिवाजी ने दक्षिण में दुखी करना आरंभ किया तो शिवाजी के विरूद्घ बादशाह का साथ देकर अंगे्रजों ने औरंगजेब की सहानुभूति प्राप्त कर ली थी। यद्यपि उस समय अंग्रेज बादशाह की किसी प्रकार की सहायता करने की स्थिति में नहीं थे, परंतु उनके पास व्यापारिक बुद्घि चातुर्य था। उसी चातुर्य से ये लोग बादशाह का मूर्ख बनाकर अपने लिए लाभ प्राप्त कर गये। इस लाभ को प्राप्त करके अंग्रेजों ने भारतीय लोगों को उत्पीडि़त करना आरंभ कर दिया।
फिलिप एण्डरसन का कहना है कि-”उनके (अंग्रेजों के) आचरणों को देखकर हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियां उनको गाय का मांस खाने वाले तथा कुत्तों से भी पतित मानते थे। उनकी दृष्टि में अंग्रेज लोग धोखेबाज थे।”
बादशाह औरंगजेब को जब अंग्रेजों की उत्पीडऩात्मक कार्यवाहियों का पता चला तो वह अत्यंत आक्रोश में आया, और उसने अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियों को तुरंत बंद करने का आदेश दिया। जिससे अंग्रेजों ने भारतीय होकर बादशाह से क्षमा याचना कर ली। बादशाह ने उनकी जब्त कोठियां उन्हें लौटा दीं। फलस्वरूप अंग्रेजों को 1699 ई. में नई कोठियां बनाने का अधिकार और मिल गया। जिससे अंग्रेज लोग अकबर से चली परंपरा का लाभ लेते-लेते औरंगजेब से भी लाभ कमा गये, और अपनी स्थिति को व्यापारिक दृष्टिकोण से सुदृढ़ बनाने में सफल हो गये।
क्रमश:

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