ब्रह्म कुमारी मत का सच भाग -2

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डॉ डी के गर्ग
ब्रह्माकुमारी के पाखण्डी मतों का खण्डन:
(1) ब्रह्माकुमारी मत- मैं इस कलियुगी सृष्टि रुपी वेश्यालय से निकालकर सतयुगी, पावन सृष्टि रुप शिवालय में ले जाने के लिये आया हूँ । (सा.पा.पेज 170)
खण्डन- लेखराज अगर इस सृष्टि को नरक व वेश्यालय मानता है तो इस वेश्यालय में रहने वाली सभी ब्रह्माकुमारियां भी साक्षात् वेश्यायें होनी चाहिए। क्या यह सत्य है?
(2) ब्रह्माकुमारी मत- रामायण तो एक नॉवेल (उपन्यास) है, जिसमें 101 प्रतिशत मनोमय गप-शप डाल दी गई है। मुरली सं. 65 में लेखराज कहता है कि राम का इतिहास केवल काल्पनिक है। (घोर कलह -युग विनाश, पेज सं.15)
खण्डन- भूगर्भशास्त्रियों को अयोध्या, श्रीलंका आदि की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं से तथा नासा का अन्वेषण समुद्र में श्रीरामसेतु का होना आदि रामायण को प्रमाणित करता है। पूरा हिन्दू इतिहास रामायण के प्रमाण से भरा हुआ है। इसे उपन्यास व गप-शप कहना और सनातन-धर्म पर अनर्गल बातें कहना ही वास्तव में गप्पाष्टक है, कमीनापन है।
(3) ब्रह्माकुमारी मत- जप, तप, तीर्थ, दान व शास्त्र अध्ययन इत्यादि से भक्ति मार्ग के कर्मकाण्ड और क्रियायों से किसी की सद्गति नहीं हो सकती। (सतयुग में स्वर्ग कैसे बने? पे. सं. 29)
खण्डन – यह बातें तथ्यों से परे, नासमझी से पूर्ण हैं। जप से संस्कार शुद्ध होते हैं। तप से मन के दोष मिटते हैं )। जहाँ संत रहते हैं उन तीर्थों में जाने से, उनके सत्संग से विचारों में पवित्रता व ज्ञान मिलता है। दान व परोपकार से पुण्य बढ़ता है। शुभ कर्म का शुभ फल मिलता है। शास्त्र अध्ययन से ज्ञान बढ़ता है, सन्मार्ग दर्शन मिलता है, विवेक, बुद्धि जागृत होती है। कर्मकाण्ड से मानव की प्रवृत्ति धर्म व परोपकार में लगी रहती है और इन सब बातों से जीवों का तथा स्वयं मानव का कल्याण होता है। ईन शुभ कर्मों की निंदा करना लेखराज एवं उसके सर्मथकों की मूर्खता प्रकट करता है। जो वेदों और शास्त्रों का विरोध करता है वह मनुष्य रुप में साक्षात असुर है।
(4) ब्रह्माकुमारी मत- श्रीकृष्ण ही श्री नारायण थे और वे द्वापरयुग में नहीं हुए, बल्कि पावन सृष्टि अर्थात् सतयुग में हुए थे। श्रीकृष्ण श्रीराम से पहले हुए थे। (साप्ताहिक पाठ्यक्रम, पृ.सं.140,143)
खण्डन- भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद भगवद्गीता के अध्याय 10 के 31 वें श्लोक में कहा ‘पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‘ अर्थात् मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने श्रीराम का उदाहरण देकर श्रीराम को अपने से पूर्व होना घोषित किया है, दृष्टान्त सदैव अपने से पूर्व हुई अथवा वर्तमान बात का ही दिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि इस मत का संस्थापक लेखराज पूरा गप्पी, शेखचिल्ली था जिसने पूरी श्रीमदभगवद्गीता भी नहीं पढ़ी थी।
(5) ब्रह्माकुमारी मत- गीता ज्ञान परमपिता परमात्मा (लेखराज के मुख से) शिव ने दिया था। (सा.पा.पेज सं.144)
खण्डन – गीता को लेखराज द्वारा उत्पन्न बताना यह किसी तर्क व प्रमाण पर सिद्ध नहीं होता। इतिहास साक्षी है कि 5151 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान दिया था।
(6) ब्रह्माकुमारी मतः आत्मा रूपी ऐक्टर तो वही हैं, कोई नई आत्मायें तो बनती नहीं हैं, तो हर एक आत्मा ने जो इस कल्प में अपना पार्ट बजाया है अगले कल्प में भी वह वैसे ही बजायेगी, क्योंकि सभी आत्माओं का अपना जन्म-जन्मान्तर का पार्ट स्वयं आत्मा में ही भरा हुआ है । जैसे टेप रिकार्डर में अथवा ग्रामोफोन रिकार्डर में कोई नाटक या गीत भरा होता है, वैसे ही इस छोटी-सी ज्योति-बिन्दु रुप आत्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट भरा हुआ है। यह कैसी रहस्य-युक्त बात है। छोटी-सी आत्मा में मिनट-मिनट का अनेक जन्मों का पार्ट भरा होना, यही तो कुदरत है। यह पार्ट हर 5000 वर्ष (एक कल्प) के बाद पुनरावृत्त होता है, क्योंकि हरेक युग की आयु बराबर है अर्थात् 1250 वर्ष है। (सा.पा., पृ.सं. 86)
खण्डन- एक कल्प में एक हजार चतुर्युग होते हैं, इन एक हजार चतुर्युगों में चैदह मन्वन्तर होते हैं। एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग होते हैं, प्रत्येक चतुर्युगी में चार युग (कलियुग 4,32,000 वर्ष, द्वापर 8,64,000 वर्ष, त्रेता 12,96,000 वर्ष एवं सतयुग 17,28,000 वर्ष के) होते हैं।
हर पाँच हजार साल में कर्मो की हूबहू पुनरावृत्ति होती है, इसको सिद्ध करने के लिए ब्रह्माकुमारी के पास कोई तर्क या कोई भी शास्त्रीय प्रमाण नहीं है, सिर्फ और सिर्फ इनके पास लेखराज की गप्पाष्टक है जिसे मूर्ख व कुन्द बुद्धि वाले लोग ही सत्य मानते हैं। मानों यदि व्यक्ति की ज्यों की त्यों पुनरावृत्ति हो तो वह कर्म-बंधन व जन्म-मरण से कैसे मुक्त होगा?
(7) ब्रह्माकुमारी मत- परमात्मा तो सर्व आत्माओं का पिता है, वह सर्वव्यापक नहीं है।…भला बताइये कि अगर परमात्मा सर्वव्यापक है तो शरीर में से आत्मा निकल जाने पर परमात्मा तो रहता ही है तब उस शरीर में चेतना क्यों नहीं प्रतीत होती? मोहताज व्यक्ति, गधे, कुत्ते आदि में परमात्मा को व्यापक मानना तो परमात्मा की निन्दा करने के तुल्य है। (साप्ताहिक पाठ्यक्रम, पृ. सं. 44, 55, 68)
खण्डन- ईश्वर सर्वव्यापक है क्योंकि जोे एक देश में रहता है वह सर्वान्तर्यामी, सर्वर्ज्ञ, सर्वनियन्ता, सब का सृष्टा, सब का धर्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता। अप्राप्त देश में कर्ता की क्रिया का (होना) असम्भव है।
प्राण-अपान की जो कला है जिसके आश्रय में शरीर होता है। मरते समय शरीर के सब स्थानों को प्राण त्याग जाते हैं और मूर्छा से जड़ता आ जाती है। महाभूत, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण, अविद्या, काम, कर्म के संघातरुप पुर्यष्टक शरीर को त्यागकर निर्वाण हो जाता है। शरीर अखंडित पड़ा रहता है, जिसमें सामान्य रूप से चेतन परमात्मा स्थित रहता है। कुन्द बुद्धि लोगों को यह समझना चाहिए कि एक बल्ब बुझा देने से पूरा पॉवर हाऊस बंद नहीं हो जाता।
8 प्रश्न:-‘‘ईश्वर सर्वव्यापक है या नहीं ?
ब्रह्माकुमारी: जब हम ईश्वर को सर्वव्यापक कहते हैं तो ये कहते हैं की फिर तो ईश्वर गधे में, शौच में, गन्दे नाले में आदि में भी होगा ?अब यदि हम कहें की नहीं है तो कहते हैं की तब तो ईश्वर सर्वव्यापक नहीं रहा !और यदि हम कहें की इन सब में ईश्वर है, तो कहेंगे की ईश्वर अपवित्र हो गया !इसके साथ एक और तर्क सूर्य किरणों का दिया जा सकता है जो शुद्ध पवित्र रहती हैं,ठीक उसी तरह से ईश्वर अपवित्र नहीं होता और वह सर्वव्यापक भी रहता है द्य सामान्य व्यक्ति तो इनके चक्कर में फँस जाता है।
ब्रह्माकुमारी वाले इतना नहीं समझते की ईश्वर निराकार तो है ही, साथ ही पवित्र भी है द्यएकरस, अखण्ड आदि गुण वाला परमात्मा स्थान नहीं घेरता जैसे मोबाईल या रेडियो या दूरदर्शन की तरंगे हैं,वो कई-कई शहरों की गन्दगी, कई-कई उद्योगों के धुएँ, ध्वनि-प्रदूषण आदि को पार करती आती हैं लेकिन जब हमें मोबाईल या रेडियो या टी.वी. पर मिलती हैं तो अपवित्र नहीं होती अर्थात् शुद्ध रहतीं हैं, जो ध्वनि या दृश्य अपने मूल से चला था वही हमें सुनाई देता है ना की बीच में आये शोर की मिलावट के साथ जब ये तरंगे शुद्ध रह सकती हैं तो फिर ईश्वर पवित्र क्यों नहीं रह सकता?
क्या ईश्वर के कोई नाक है जो गंदगी उसे प्रभावित करेगी ?क्या ईश्वर का कोई शरीर है जो गन्दगी उसे छू लेगी ? ईश्वर निराकार अभौतिक सत्ता है , न उसे गंदगी छू सकती है न अच्छी चीज , कोई भौतिक वस्तु उसे प्रभावित नहीं कर सकती , जैसे आकाश निराकार है और गन्दगी के अंदर भी है , क्या वो गन्दगी आकाश को प्रभावित करती है ? यदि कहो – हाँ तो फिर पूरा आकाश गन्दा हो जाने से इस संसार के कौन से कोने में छुपोगे ? निराकार ही क्यों गन्दगी तो किसी सूक्ष्म भौतिक सत्ता को भी प्रभावित नहीं कर रही , एक गन्दगी में से प्रकाश की किरणे गुजर जाती है क्या गंदगी उन किरणों को प्रभावित करती है ? क्या किरणे मैली हो जाती है ? प्रकाश सूक्ष्म है , ईश्वर सूक्ष्मातिसूक्ष्म है उस से सूक्ष्म तो संसार में कुछ भी नहीं , साथ ही वह अभौतिक निराकार सत्ता है , और गंदगी कहा किसे जाता है ? कोई वस्तु देखने कि दृष्टि से गन्दी है तो कोई छूने कि दृष्टि से , कोई चखने कि दृष्टि से तो कोई सूँघने कि दृष्टि से , या फिर कोई सुनने की दृष्टि से, इस तरह अलग अलग दृष्टि से संसार कि सभी वस्तुएं गन्दी हो गयी , और तो और कोई वस्तु किसी के लिए अच्छी है तो वही वस्तु किसी के बुरी है , पोट्टी इंसान को खराब लगती लेकिन सूअर को अच्छी लगती है , गन्दगी तो अपेक्षा से होती है , इस तरह संसार कि सब चीजें गन्दी है , और वही चीजें अन्य दृष्टि से अच्छी भी है , फिर ईश्वर पर सवाल उठाने वाले संसार के कौन से कोने में भागेंगे ? ईश्वर तो अभौतिक है , ये सवाल उठाने वाले तो भौतिक है ? कहाँ कहा बचेंगे ? यूँ तो एक व्यक्ति के शरीर में लाखों छोटे जीव जंतु रहते हैं , वे प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में कुछ खाते है तो कुछ पोट्टी भी करते है, फिर हर व्यक्ति के शरीर में गंदगी हुयी , कहा भागेगा ? क्या गंदगी ने कभी प्रभावित किया उनको ? ईश्वर सर्वव्यापक है
9 ब्रह्माकुमारी- श्रीकृष्ण श्रीराम से पहले हुए थे। परन्तु आज लोगोँ को यह वास्तविक ज्ञान नहीँ है।
खण्डन – यह बात तुम्हारी महामूर्खता को पूर्ण सिद्ध करती है क्योँकि गीता मेँ श्रीकृष्ण ने कहा है ‘‘पवनः पवनाभस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। अर्थात् शस्त्रधारियो मे मैँ राम हूँ, इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराम का उदाहरण देकर राम को अपने से पूर्व होना घोषित किया है। इससे स्पष्ट है कि लेखराज शेखचिल्ली था जिसने गीता भी नहीँ पढ़ी थी।
10 ब्रह्मकुमारी- परमपिता शिव ज्योतिर्बिन्दु हैँ। वह परमधाम के वासी हैँ जहां पर प्रकाश ही प्रकाश है।‘‘(पृ॰167)
खण्डन – जब तुम्हारा परमात्मा इस पृथ्वी का वासी नहीँ है तो उस विदेशी की उपासना क्यो करती है ? क्या धरती पर उसे प्लेग खा जायेगी? यदि वह बिन्दु है तो उसके अस्तित्व का ही क्या प्रमाण है? कहीँ वर्षा के जल मेँ बह न गया हो। कैसी हास्यास्पद कल्पना है पाखण्डियो की।
11 ब्रह्मकुमारी- वेद उपनिषद पुराण हमारे धर्मशास्त्र नहीँ हैँ। हमारा धर्म का शास्त्र तो गीता है। (पृ॰182)
खण्डन – वेदोँ के जिन्होनेँ दर्शन नहीँ किये, उपनिषद आदि का ज्ञान इसलिए नहीँ हुआ क्योकि संस्कृत पढ़ी ही नहीँ थी। अतः उनकी वे ही मूर्ख लोग निन्दा करते हैँ। गीता की तो आढ़ इसीलिए लेती हो क्योकि तुम्हे लेखराज को अवतार बताकर अपना ढोगी पन्थ चलाना है।
12 ब्रह्माकुमारी- रामायण तो एक नावेल है जिसमेँ 101 प्रतिशत गपशप डाल दी है (घोर कलह-युग विनाश पृ॰15)
खण्डन – संसार के ढेरो विद्वान और ऐतिहासिक व्यक्ति रामायण को सत्य घटना का ग्रन्थ मानते हैँ पर तुम्हारा कुपढ़ लेखराज वेद शास्त्र, रामायण आदि के अस्तित्व को भी नहीँ मानता है। उसने रामायण को उपन्यास लिखने का कमीनापन किया है, इसके प्रमाण मेँ उसने क्या दलील दी है? अथवा चेलियाँ बतावेँ की लेखराज के पास क्या प्रमाण है?
13 ब्रह्माकुमारी- शिव और शंकर मे अंतर है और दोनो के अपने अपने धाम है शिव को निराकार ज्योतिर्बिन्दु कहते है और उसे परमधाम का निवासी कहते है दूसरी और शंकर को आकारी तथा संहारकारी देवता कहते है जिसका शंकरपुरी निवास बताते है । जबकि पवित्र वेदों से इनके तर्क की तुलना की जाए तो यह बात सत्य नहीं है।
आर्यसिद्धान्ती-महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपने ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश मे परमेश्वर के गुणवाचक सौ नाम अर्थ सहित लिखे है उनमे से कुछ लिखे हैं।जिसे समझे और जाने की परमात्मा के सैंकडो नाम गुणवाचक है लेकिन वह शरीरधारी अवतरित शक्ति नही है न ही बनाया जा सकता और कयोकि जिसने सृष्टी बनाई है औप जिसका वह पालन और धारण भी कर रहा है और अंत मे सृष्टी का नष्ट भी वह अकेले ही करेगा ।इसके लिए उसे अवतरित होने या किसी को बनाने की जरूरत भी नही है ।कयोकि यदि उसे अपने काम किसी के द्वारा करने की जरूरत पडे तो वह परमात्मा नही हो सकता ।वह सर्वशक्तिमान नही हो सकता और यदि उसका कोई विशेष धाम है तो वह निराकार सर्वव्यापक नही रहेगा ।इसलिए ब्रह्मकुमारी का अवतारवाद और विशेष धाम सब कल्पना पर आधारित है जिनका वैदिक दृष्टीकोण से कोई आधार नही है बल्कि सब निराधार बाते है ।

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