भारत में किसानों की दुर्दशा बढ़ती ही जा रही है। उधर को देखने की फुर्सत किसी को नहीं है। इस दुर्दशा के मूल कारणों पर यदि विचार किया जाए तो जितनी परतें खुलती जाएंगी उतने ही बड़े चेहरों से नकाब उतरता जाएगा। 1947 के पश्चात से अब तक के वर्षों में ‘कब्र में दबे कई मुर्दे’ भी बेचैनी अनुभव करने लगेंगे तो कइयों की भव्य समाधियों पर खून के छींटे साफ दिखने लगेंगे।
देश में आज कृषि महंगी हो गयी है। इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है-हमारी खेती को बैलों के स्थान पर टै्रक्टर से कराने की परम्परा का प्रारंभ करना। यह टै्रक्टर जब नेहरू-काल में विदेशों से लिया गया तो उस समय अरबों रूपया देश पर कर्जा हुआ था। उस कर्जे को एक एक ट्रैक्टर के रूप में बहुत से किसानों में बांट दिया गया। किसान खुश हो गया था-उस बेचारे को पता ही नहीं था कि जिसे तू अपनी प्रसन्नता का कारण मान रहा है, वही तेरी विपन्नता का कारण बनेगा। पहली बार देश के किसानों से किश्तों के रूप में सरकार ने उसकी कमाई को अपने खजाने में भरना आरंभ किया। उस वसूली से नेता विदेशी कर्जा को भरते रहे, और साथ ही अपने ‘कमीशन’ से अपनी पौ बारह भी करते रहे। किसान की आय तो बढ़ी, पर जितनी बढ़ी उससे अधिक टै्रक्टर का लोन पटाने में जाती रही। जब तक वह किश्तों से मुक्त हुआ, तब तक पता चला कि टै्रक्टर भी बूढ़ा हो गया है, इसलिए अब दूसरा लिया जाए। तब दूसरा ले लिया-भोला किसान फिर मारा गया और वह फिर लग गया कर्जा पटाने में।
टै्रक्टर को दिलाने में विदेशी कंपनियों का हाथ था-क्योंकि उन्हें इससे ‘मोटा मुनाफा’ हो रहा था। दूसरे अधिकारियों का हाथ था-क्योंकि उन्हें भी कमीशन मिल रहा था। तीसरे-फिर हमारे नेताओं का हाथ था-क्योंकि उन्हें भी ‘स्विस बैंक’ में खाता खुलवाने के लिए उस समय आवश्यकता अनुभव होने लगी थी। घाटा था तो केवल किसान को था-जिसे अपने लिए इन तीनों ने मिलकर ‘कमाऊ पूत’ बना लिया था। किसान की कमर टूट गयी कमाते-कमाते, वह सोचता रहा कि अब सुबह होगी और अब होगी? पर उसके लिए सुबह लंबी हो गयी। अब आजादी के 70 वर्ष पश्चात भी उसे नही लगता कि अगले 70 वर्ष में भी उसे सुबह के दर्शन हो जाएंगे। क्योंकि नई सुबह की आशा में बढ़ते किसान को इन सत्तर वर्षों में खाद पानी, बिजली, बीज, कीटनाशक आदि का ऐसा चस्का लगा दिया गया है कि वह इन सबको खरीदने के लिए बाध्य कर दिया गया है। अब इन सबका जब वह योग करता है तो पता चलता है कि लागत और उपज दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है। जबकि मोदी की ‘डिजिटल इंडिया’ में कंप्यूटर और मोबाइल किसान के बच्चों के हाथ में भी चला गया है, अर्थात गृहस्थी के खर्चे ऊपर से नीचे तक सभी वर्ग के लोगों के बहुत अधिक बढ़ गये हैं। इसमें किसान को भी प्रभावित किया है, किसान की आय-व्यय लगभग समान और उसके साथ-साथ घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति का बड़ा होता प्रश्न-ये ऐसे तथ्य हैं जिन्होंने किसान की रात की नींद और दिन का चैन उससे छीन लिया है। प्रश्न का कोई समाधान न होते देख अंत में वह आत्महत्या की ओर बढ़ जाता है। 
मोदी सरकार की नीतियों से भी किसान का कोई भला हो जाएगा-ऐसा लगता नहीं। जब तक किसान के लिए टै्रक्टर नाम का ‘यमराज’ और विदेशी खाद, कीटनाशक आदि का ‘भस्मासुर’ खड़ा रहेगा तब तक उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन आने वाला नहीं है। अच्छा कि सरकार कृषि को पुन: बैल आधारित करे। एक गाय का बछड़ा जब तक बूढ़ा होता है तब तक किसान के पास दूसरा और तीसरा बछड़ा बैल बनकर आ जाता है। इसमें बैल लोन पर नहीं मिलता और ना ही एक बैल के समाप्त होने पर दूसरे बैल के लिए सरकारी ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती है। एक चक्र है जो किसान के घर में ही प्राकृतिक रूप से घूम रहा है और उसी से किसान को लाभ मिलता रहता है। यह चक्र जीवित करना होगा। गाय का पालन खेती के लिए खाद और कीटनाशक तैयार करने हेतु आवश्यक बनाया जाए। गाय-पालन के लाभ बताकर और उन्हें अपनाकर किसान को समृद्घ करने हेतु उसे लोन से बचाकर उसकी खेती की उपज बढ़ाने की नीति लागू करनी होगी। ‘कमीशनखोर’ नेता व अधिकारी इस योजना को लागू नहीं होने देंगे, पर उत्तर प्रदेश में योगी जी और केन्द्र में मोदी जी इसे लागू कराने की पहल तो करके देखें। निश्चय ही सुखद परिणाम आएंगे।
मध्य प्रदेश में पुलिस की गोली से छह किसानों के मरने का समाचार आज के समाचारपत्रों में है। ऐसा केवल मध्य प्रदेश में ही नहीं हो रहा है। देश के दूसरे भागों में भी किसानों में बेचैनी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोनी के किसानों का आंदोलन भी पिछले लंबे समय से चल रहा है। किसान को अन्नदाता की उपाधि दी जाती है-पर अन्नदाता हमें तो अन्न देता रहे,  परंतु उसके अपने मुंह के लिए एक कण भी उसके पास ना हो-हमारी नीतियां ऐसी हैं। भूमाफिया लोग किसानों की भूमि को छीन रहे हैं और रातों रात उनकी कोठियों की ऊंचाई बढ़ती जा रही है।
जबकि किसान उजड़ता जा रहा है। आहत किसान जब मध्य प्रदेश में सडक़ों पर आता है या लोनी क्षेत्र में अपने पेट पर हाथ रखकर प्रशासन से अपने लिए न्याय की गुहार लगाता है तो प्रशासन उसे गोली का उपहार देता है या उसके पेट पर रखे हाथ को ही मरोड़ देता है-इससे तो काम बनने वाला नहीं है। न्याय के लिए सभी पूर्वाग्रह छोडऩे होंगे और अपने किसान की समृद्घि के सभी उपायों पर विचार करना होगा अन्यथा इस देश में हम भारी उपद्रव मचता देखेंगे। क्योंकि पेट पर हाथ रखकर जब न्याय की पुकार की जाती है और वह सुनी नहीं जाती है तो उस समय निकलने वाली बददुआओं से सारी व्यवस्था ही जलकर राख हो जाती है-
नौ नांतवा है राह की बात करते हैं, 
हम तो रोज कयामत की बात करते हैं।
हद से बढ़ जाती है जब लोगों की मजबूरी,
तो अमन पसंद भी बगावत की बात करते हैं।

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