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इतिहास के पन्नों से

रामनवमी पर विशेष: मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हैं भारत के राष्ट्रपिता

आज राम नवमी का पर्व है। इस ऐतिहासिक पर्व की आप सबके लिए हार्दिक शुभकामनाएं। संपूर्ण भूमंडलवासियों के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है। क्योंकि इस दिन संपूर्ण भूमंडल से राक्षसवृत्तियों का विनाश करके अपने जीवन को आदर्श बनाने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म हुआ था।
संपूर्ण मंडल के संताप निवारक श्रीराम ने लोक कल्याण के लिए यज्ञ की पवित्र भावना को जीवन में धारण कर जीवन व्यतीत किया। उन्होंने शस्त्र और शास्त्र का उचित समन्वय करके लोक शांति स्थापित करने का अनुकरणीय सराहनीय और अभिनंदनीय कार्य किया।

संपूर्ण भूमंडलवासियों के सम्मान के पात्र हैं श्री राम

संपूर्ण भूमंडल पर लोग उनका सम्मान करते थे यह तभी संभव हो पाया था जब उन्होंने संपूर्ण वसुधा से राक्षस संस्कृति का विनाश कर देवताओं की वैदिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करना अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था। संसार के लोग उनके प्रति इसलिए भी श्रद्धावान बने कि श्रीराम ने उस समय सभी देशों के लोगों को समान अधिकार देने का महान कार्य संपादित किया। वह सबके मौलिक अधिकारों के लिए लड़ते रहे और उन राक्षसों का संहार करते रहे जो लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे थे। आज के पाकिस्तान का लाहौर नामक नगर रामचंद्र जी के बेटे लव के नाम से ही बसाया गया था।
इसके अतिरिक्त श्री राम और रामायण काल से जुड़े अनेकों ऐतिहासिक स्थल आज के पाकिस्तान में स्थित हैं। इतना ही नहीं आज का ताशकन्द भरत के बेटे तक्ष के नाम से ‘तक्षखंड’ के रूप में स्थापित किया गया था। जिससे पता चलता है कि श्री राम का नाम वहां तक भी श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता था। हमारा पड़ोसी देश बर्मा भी रामचंद्र जी के प्रति आस्थावान रहा है । आज भी वहां अनेक लोकगीतों में रामलीला के नाटक खेले जाते हैं।
बर्मा में रामवती नगर राम नाम पर स्थापित हुआ था। वहां के अमरपुर के एक विहार में सीता-राम, लक्ष्मण और हनुमान जी के चित्र आज तक अंकित हैं।

कई देशों में श्री राम को मिलता है सम्मान

जिस समय रामचंद्र जी का जन्म हुआ उस समय रावण का राज्य विश्व के बड़े भूभाग पर था । आज का रूस, चीन, अमेरिका सहित विश्व के अन्य क्षेत्र भी रावण के राज्य के अधीन था । उसके राज्य में जनता बहुत पीड़ित थी । क्योंकि रावण के लोग लोकतांत्रिक ढंग से शासन न करके लोगों के मौलिक अधिकारों का शोषण व हनन कर रहे थे। विद्वानों का यह भी मानना है कि रावण का राज्य मेडागास्कर द्वीप से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक के द्वीप समूहों पर भी था। जब रामचंद्र जी ने रावण का अंत कर दिया तो विश्व के जितने भूभाग पर रावण का राज्य था वहां- वहां के लोगों ने रामचंद्र जी के इस महान कार्य पर प्रसन्नता व्यक्त की और उनकी महानता के गीत गाए ।उस समय के विश्व की यह बहुत बड़ी घटना थी। जिसे रामचंद्र जी ने अपने 14 वर्ष के वनवास काल में बनाई गई अपनी विशेष और प्रभावकारी योजना के द्वारा मात्र 14 वर्ष में सफलतापूर्वक परिणति तक पहुंचाया था। उस समय लोगों को यह आशा नहीं थी कि कोई व्यक्ति रावण के राज्य का अंत कर उन्हें लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करते हुए जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराएगा। बस, यही कारण था कि जब उन्हें असंभव कार्य संभव हुआ दिखाई दे गया तो उस असंभव को करने वाले श्री राम के प्रति वह श्रद्धा से नतमस्तक हो गए। तब लोगों ने श्रीराम को राष्ट्रपिता से भी ऊपर भगवान मानकर सम्मान दिया। आजकल हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते हुए लोगों को सुनते हैं। महात्मा गांधी जी के बारे में कह दिया जाता है कि उन्होंने ब्रिटिश शासकों को भारत से भगाया, पर इतिहास की साक्षी ऐसी नहीं है कि महात्मा गांधी के प्रयास से अंग्रेज भारत छोड़ गए थे।
यदि फिर भी एक बार यह मान लिया जाए कि अंग्रेजों ने भारत को गांधीजी के प्रयास से छोड़ दिया था तो भी महात्मा गांधी श्रीराम जैसा महान और पवित्र कार्य कभी नहीं कर पाए कि उन्होंने राक्षसों का अंत संपूर्ण भूमंडल से ही कर दिया हो ? इसके विपरीत गांधीजी राक्षसों के सामने झुकते हुए नजर आते हैं । राक्षसों और मानव जाति के लिए कलंक आतंकवादियों का अंत करना भी गांधी जी पाप समझते हैं। वे अपने जीवन के अधिकांश भाग में उन आतंकवादी अंग्रेजों का गुणगान करते रहे जिन्होंने संसार भर में मानव अधिकारों का हनन करने के कीर्तिमान स्थापित किए । इतना ही नहीं गांधीजी जीवन भर अपना आदर्श औरंगजेब को भी मानते रहे।

‘राष्ट्रपिता’ के रूप में श्री राम

रामचंद्र जी यदि गांधी जी के स्थान पर होते तो निश्चित रूप से आतंकवादियों और पापियों को आतंकवादी और पापी ही कहकर संबोधित करते और उनके विनाश को अपना जीवन लक्ष्य बनाते । भारत की परंपरा में ऐसे किसी व्यक्ति को राष्ट्रपिता नहीं माना जा सकता जो राक्षसों के अंत को भी पाप समझता हो। भारत में तो उसी व्यक्ति को ‘राष्ट्रपिता’ या ‘भगवान’ माना जाता है जो संसार से पापों का नाश करे और साथ ही साथ पापियों को भी मौत की नींद सुलाने की क्षमता और सामर्थ्य रखता हो।
यद्यपि हम व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति को ‘राष्ट्रपिता’ नहीं मानते ।क्योंकि वास्तविक राष्ट्रपिता तो वह परमपिता परमेश्वर है जो इस चराचर जगत का निर्माता, पालन कर्त्ता और संहारकर्त्ता है। फिर भी इस लौकिक संसार में परमपिता परमेश्वर की सृष्टि व्यवस्था के अनुकूल कार्यों को संपन्न करने वाले व्यक्ति को ऐसा सम्मान दिए जाने के हम विरोधी भी नहीं हैं। निस्संदेह श्रीराम ने परमपिता परमेश्वर की सृष्टि व्यवस्था के अनुरूप कार्य करते हुए अपना जीवन यापन किया। इसीलिए वह संसार के महानतम व्यक्ति के रूप में स्थापित हुए।
जब श्रीराम ने रावण जैसे राक्षस का अंत किया तो उनकी कीर्ति संपूर्ण जगत में व्याप्त हो गई। यही कारण है कि अनेकों द्वीपों व देशों में उनके नाम की कीर्त्ति आज तक भी किसी न किसी रूप में मिलती है। कई स्थानों पर मुसलमान भी उन्हें अपना पूर्वज मानकर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं और अपने नाम के साथ ‘राम’ शब्द जोड़कर अपने आत्मिक गौरव को प्रकट करते हैं। मलेशिया में रामकथा का प्रचार अभी तक है। वहां मुस्लिम भी अपने नाम के साथ ‘राम-लक्ष्मण’ और ‘सीता’ का नाम बड़े गर्व के साथ जोड़ते हुए देखे जाते हैं।।यहां रामायण को ‘हिकायत सेरीराम’ कहते हैं। ये लोग श्री राम को अपना पूर्वज और महान शासक मानकर उनका सम्मान करते हैं। उनकी मान्यता है कि श्रीराम एक पूर्ण पुरुष थे और उनमें एक भी दोष नहीं था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक ‘भारत को समझो’ अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता और सुप्रसिद्ध इतिहासकार हैं)

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