यदि डा. भीमराव अंबेडकर जी आज होते तो अपने नाम के हो रहे दुरूपयोग को देखकर बहुत आहत होते। डा. भीमराव अंबेडकर अपने नाम पर बनायी गयी ‘भीमसेना’ को बनाने की अनुमति भी कभी नही देते। साथ ही मायावती की ‘जय भीम और जयमीम’ योजना को भी कभी अपनी स्वीकृति प्रदान नहीं करते। स्पष्ट है कि अंबेडकर जी की अंबेडकरवादियों ने ही अधिक दुर्दशा की है।
देश के भीतर बन रही अवैध सेनाएं संविधान का खुला उल्लंघन है। हमारा संविधान अपनी मांगों को मनवाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति हमें प्रदान करता है। संविधान की भावना के अनुसार कोई भी आंदोलनकर्ता हिंसक प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों को अपनाकर देश के सामाजिक परिवेश को यदि बिगाडऩे का प्रयास करता है तो यह उसके द्वारा किया गया एक अपराध है। हमारा मानना है कि कोई व्यक्ति, संगठन या समुदाय किसी महापुरूष के नाम पर यदि जातिवादी संगठन या जातिवादी सेना खड़ी करता है तो इसे देश की अस्मिता के विरूद्घ किया गया कृत्य माना जाना चाहिए। यदि ऐसी कोई सेना देश के सामाजिक परिवेश को बिगाडऩे की दोषी पायी जाती है तो उस सेना के ऐसे कृत्य को देश की एकता और अखण्डता को तार-तार करने का प्रयास मानते हुए देश के विरूद्घ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की श्रेणी का अपराध माना जाना चाहिए।
जब देश पर अंग्रेजों का शासन था तो वे लोग भारत के जनसाधारण को भी हथियार रखने की अनुमति नही देते थे। यहां तक कि देश में स्वनिर्मित हथियारों को रखना भी दंडनीय अपराध था। अंग्रेज उन्हीं भारतीयों को हथियार का लाइसेंस देते थे जो उनका हितैषी या चाटुकार होता था और हमारे क्रांतिकारियों की सूचना उन तक पहुंचाने के कारण उस व्यक्ति को हमारे राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों से अपने प्राणों को संकट दिखायी देता था। अंग्रेज ऐसी कठोरता केवल इसलिए करते थे जिससे कि भारत के स्वतंत्रता प्रेमी लोग किसी भी स्थिति में उनके विरूद्घ क्रांति के मार्ग पर न उतर आयें और यदि उन्हें किसी गांव या शहर में किसी क्रांतिकारी के छिपे होने की या वहां से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाने की सूचना मिले तो अंग्रेज पुलिस या कोई भी प्रशासनिक अधिकारी वहां जाकर आराम से हमारे क्रांतिकारियों को भून दे और उस गांव कस्बे या शहर के लोगों पर भी मनमाना अत्याचार कर सके। 
कहने का अभिप्राय है कि अंग्रेजों ने अपनी ‘गुण्डागर्दी’ को ही अपने शासनकाल में ‘स्टेट’ का नाम दे दिया था। उस समय राष्ट्रभक्त लोग अपने देश की स्वतंत्रता के लिए काम करते थे तो उन्हें भी ‘स्टेट’ के विरूद्घ किये गये राजद्रोह के मामले में जेल जाना होता था या फांसी की सजा भुगतनी होती थी। अंग्रेजों की यह विशेषता रही कि उन्होंने अपने ‘लूटतंत्र और लाठीतंत्र’ को इस देश के काले अंग्रेजों की दृष्टि में लोकतंत्र और अपनी गुण्डागर्दी को ‘स्टेट के विरूद्घ अपराध’ के रूप में बैठाने में सफलता प्राप्त की। जिसका गुणगान उनके अनुयायी ‘काले अंग्रेज’ आज तक करते हैं। उनके अनुयायियों में कांग्रेसी सबसे अधिक आगे हैं। एक ओर ये लोग कहते हैं कि अंग्रेजों के कुशासन से भारत को ‘साबरमती के संत’ ने स्वतंत्र कराया और भारत को उनके अत्याचारों से मुक्त कराया। जबकि दूसरी ओर अंग्रेजों का गुणगान भी करते हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नही होगा जब देश की युवा पीढ़ी सडक़ों पर उतरकर यह पूछेगी कि यदि ऐसा था तो आपके गांधी ने देश को आजाद कराने की मूर्खता क्यों की थी?
आज के परिप्रेक्ष्य में संदर्भ को समझने की आवश्यकता है। यदि अंग्रेज अपने कुशासन और गुण्डागर्दी के विरूद्घ और हमारे स्वतंत्रता प्रेमी पूर्वजों के विद्रोह को ‘राज्य के विरूद्घ अपराध’ मान सकते थे और उन्हें फांसी पर लटका सकते थे तो आज जब भारत एक संवैधानिक व्यवस्था से जन्मी शासन प्रणाली से आगे बढ़ रहा है तो उस संवैधानिक व्यवस्था के विरूद्घ हथियार उठाने वाले राष्ट्रद्रोही क्यों नहीं हो सकते? निश्चित ही राष्ट्रद्रोही हैं, और ऐसे किसी भी संगठन या जातिवादी सेना को राष्ट्रद्रोही घोषित किया जाना समय की आवश्यकता है जो किसी महापुरूष के नाम पर या किसी जाति के नाम पर सेना तैयार करके लोगों को देश की शासन व्यवस्था के विरूद्घ उकसाने का कार्य करती हो।
डा. अंबेडकर जातिवादी व्यवस्था के विरोधी थे। वह जातिवाद को धीरे-धीरे भारतीय समाज से मिटा देने का संकल्प लेकर चले थे। उनका लक्ष्य समतावादी सर्व समन्वयी समाज की संरचना करना था। वह आरक्षण को भी अनंत काल तक चलाने के पक्षधर नहीं थे। वह चाहते थे कि दलित शोषित समाज ऊपर उठे और भारत में अन्त्योदयवाद की क्रांति के सफल होते ही सर्व समन्वयी समाज की संरचना का लक्ष्य प्राप्त करते ही यह आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। उनका यह सपना राष्ट्रहित में था। उस सपने को पूरा करने के लिए देश में ‘जाति तोड़ो-समाज जोड़ो’ की समाज सुधार की आंधी चलनी चाहिए थी। पर लोगों ने जाति के नाम पर और स्वयं डा. साहब के नाम पर ही सेनाओं का गठन करके अपनी संकीर्ण सोच का परिचय देना आरंभ कर दिया। उनका लक्ष्य जाति तोड़ो-समाज जोड़ो के स्थान पर ‘जातिवाद बढ़ाओ और समाजवाद मिटाओ’ का बन गया है। कहने का अभिप्राय है कि बाबा साहेब का सपना ही शीर्षासन कर गया है। अब इसकी सांग ऊपर को है और सिर नीचे को है। शीर्षासन की मुद्रा में कर दिया गया यही सपना बाबा साहेब को सहारनपुर में बदनाम करा गया। एक पवित्रात्मा स्वर्ग में भी इस बदनामी को देखकर कराह उठी होगी। उन्हें अच्छा लगता कि हम सब सामूहिक रूप से उनके यथार्थ सपने को पूरा करते और जो लोग देश के सर्व समन्वयी समाज की संरचना के चलने वाले आंदोलन में बाधक बनते उन्हें सामाजिक दण्ड से हम दंडित करते। भीमसेना ने बाबा के सपनों की हत्या की है तो अपराधी को उसके अपराध का दण्ड मिलना ही चाहिए।

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