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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विशेष संपादकीय

21 जून : भारत वंदन दिवस

21 जून भारतीयता के गुण गौरव के गुणगान का दिवस बन गया है। इस दिन सारा देश ही नहीं, अपितु सारा विश्व ही भारतीय संस्कृति की महानता और उसकी सर्वग्राहयता के समक्ष शीश झुकाता है। मां भारती की आरती में सारा संसार नतमस्तक हो जाता है और कह उठता है :-
”हे भारत की पवित्र भूमि! तुझको मेरा नमन है,
देवों की वेदवाणी से महकता तेरा चमन है।
हर्षित यह गगन है सारा, नाच रही ये धरा है,
बस निनाद एक स्वर का-‘मां तेरा वंदन है’।।”

पूरा देश आज अपने अतीत पर गर्व कर रहा है और अतीत वर्तमान के साथ गले मिलकर अपना उत्सव मना रहा है। यह कितना सुंदर दृश्य है कि ‘पतंजलि ऋषि प्रणीत’ योग का गौरवमयी अतीत आज हमारे ‘राजपथ’ पर जब अपना उत्सव मनाता है तो वर्तमान उसके सम्मान में पुष्प वर्षा करता है। भारत के प्रधानमंत्री इस दिन ‘लालकिले’ पर झण्डा नहीं फहराते, अपितु जनसाधारण के बीच देश में कहीं भी जा बैठते हैं और अपने अतीत की गौरवपूर्ण स्मृतियों को नमन करते हुए राष्ट्र का नेतृत्व करते हैं। जब वह ऐसा करते हैं तो योगबल से लोगों को अपने उज्ज्वल भविष्य का लंबा रास्ता भी दिखायी दे जाता है।
सचमुच हम सबके लिए 21 जून नमन, अभिनंदन और वंदन का दिन है। इस दिन को दिखाने में पूज्य रामदेव जी महाराज के योगदान को विस्मृत, नहीं किया जा सकेगा, साथ ही देश के प्रधानमंत्री मोदी जी के सहयोग की भी उपेक्षा नही की जाएगी। भारत के महान ऋषियों का चिंतन रहा है कि राष्ट्र तभी उन्नति कर सकता है जब ब्रह्मबल और क्षत्रबल में समन्वय बन जाता है। बाबा रामदेव इस समय भारत के ‘ब्रह्मबल’ के तथा प्रधानमंत्री मोदी जी भारत के ‘क्षत्रबल’ के प्रतीक हैं। दोनों का समन्वय हुआ है तो भारत के लिए सारा विश्व कर रहा है।
पिछले पांच हजार वर्षों के काल में अर्थात महाभारत के पश्चात विश्व में भटकाव बढ़ा। इसका कारण यही रहा है कि भारत की वैदिक संस्कृति के मार्गदर्शन से विश्व वंचित हो गया। फलस्वरूप संसार में मजहबों का प्रादुर्भाव हुआ। इन मजहबों ने मानव को शांति का विश्वास दिलाया कि जिस आत्मिक और मानसिक शांति को भारत का धर्म तुझे देता था-हम उसी शांति को तुझे देंगे। पर बात बनी नहीं। मजहबों ने मानवता को जो वचन दिया था-उसे उन्होंने निभाया नहीं। मजहब ने लोगों को परस्पर लडऩा-झगडऩा सिखाया और भारत के धर्म की सारी श्रेष्ठ परंपराओं को कुचलने में लग गये। इन मजहबों के कारण कलह -कटुता और परस्पर वैमनस्य का भाव संसार में इतना बढ़ा कि करोड़ों लोग इन मजहबों की लड़ाई में ‘स्वाहा’ हो गये। इस मजहब ने मानव को दानव बना दिया। यह दानव ही आज की भाषा में आतंकवादी है। मजहब संसार के लिए ‘भस्मासुर’ बन गया है। इसने विश्व के गुटों में विभक्त कर दिया है और महाभयंकर विनाशलीला के लिए (अर्थात तीसरे विश्वयुद्घ के लिए) भूमिका व सामान तैयार करने में लगा है। ऐसे में स्वामी रामदेव जी महाराज और श्री मोदी ने विश्व को भारत की जीवन-व्यवस्था से परिचित कराकर सचमुच मानवता पर भारी उपकार किया है। इस उपकार के फलस्वरूप संसार में शाकाहारियों की संख्या बढ़ी है। बड़ी तेजी से पश्चिमी देश मांसाहार छोडक़र शाकाहार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। शाकाहारी होने से लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था और सात्विकता बढ़ेगी। सात्विकता की वृद्घि से संसार में अहिंसा भाव-वर्धन होगा। लोग एक दूसरे के साथ प्रेम और बंधुत्व का प्रदर्शन करेंगे और स्वयं को एक ही भगवान की संतान मानने पर बल देंगे। इस भाव वर्धन से धीरे-धीरे मानवतावादी शक्तियां बलवती होंगी और संसार से आतंकवाद को मिटाने में सफलता मिलेगी।
जब संसार एक मौन क्रांति से बाहर निकलकर अर्थात अपने ‘द्विज’ बनने की साधना को पूर्ण करके अपनी साधना (संसार में सात्विक लोगों के संगठनीकरण की प्रक्रिया) से बाहर आएगा तो उस सफलता में भारत की बड़ी भूमिका होगी। निश्चय ही उस समय भारत का अतीत वर्तमान विश्व के मंचों पर विराजमान होगा और सारा संसार उसकी आरती कर रहा होगा। उस भव्य और दिव्य दिवस की आहट 21 जून ने दे दी है। अभी तो शुरूआत है। आने वाला समय निश्चय ही अच्छा होगा।
सारा विश्व इस समय जिस वैश्विक आतंकवाद से जूझ रहा है, वह योग से ही समाप्त किया जा सकता है। योग से समाप्त करने का अभिप्राय है कि मानव के भीतर की आतंकी प्रवृत्ति को और वृत्तियों को उसके हृदय मंदिर के यज्ञकुण्ड में डालकर ही भस्म किया जा सकता है। जब व्यक्ति निरंतर ‘ब्रह्मयज्ञ’ में अपनी आसुरी शक्तियों के दमन और शमन की तथा उसकी दैवीय वृत्तियों के अथवा दिव्य भावों के वर्धन की प्रार्थना नित्य अपने इष्ट से करने लगता है तो उस समय उसके भीतर भारी परिवर्तन होने लगते हैं। ये परिवर्तन सकारात्मक होते हैं और मानव को मानव से देव बनाने में सहायक होते हैं। सारे संसार को 7.50 अरब देवों (विश्व की कुल जनसंख्या) का कुटुम्ब (वसुधैव कुटुम्बकम्) बना देने की अदभुत क्षमता योग में है। जिसका संदेश स्वामी रामदेव जी अपने प्रवचनों में अक्सर देते हैं। माना जा सकता है कि इतनी बड़ी सफलता में आने से पहले कुछ राक्षस (दानवी शक्तियां अर्थात आतंकवादी) विघ्न डालेंगे तो उसके विनाश के लिए अपेक्षित मन्युभाव अर्थात मानवता के उत्थान के लिए आने वाला सात्विक क्रोध भी हमें योग से ही मिलेगा। दानवी शक्तियों के विरोध और समापन के लिए हमारे पास क्षत्रबल है। जिसकी हमें कभी भी उपेक्षा नही करनी है। बाबा रामदेव ब्रह्मबल और क्षत्रबल के समन्वय के समर्थक हैं वह गांधीजी की भांति केवल ‘ब्रह्मबल’ के ही उपासक नहीं हैं। विश्व के लोग आजकल ‘प्रैक्टिकल’ हो गये हैं। उन्हें गांधीजी की अहिंसा तब तक अधूरी लगती है जब तक हाथ में दण्ड (डंडा) ना हो, और बाबा रामदेव हाथ में डन्डा लेकर चलने के ही समर्थक हैं। उनकी ‘प्रैक्टिकल’ बात को लोग मान रहे हैं और….’भारत बदल रहा है।’

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