भारत का ‘अन्नदाता’ इस समय आत्महत्या कर रहा है। जैसे-जैसे यह घटनाएं बढ़ती हैं, वैसे-वैसे ही विपक्षी पार्टियां चिल्लाती हैं कि सरकार किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है, और यह सरकार किसान विरोधी है। विपक्ष की इस चिल्लाहट के बीच सरकारें किसानों के कर्ज माफ कर रही हैं। पर देखा जा रहा है कि इसके उपरांत भी किसान की आत्महत्या करने की प्रवृत्ति में परिवर्तन नहीं आ रहा है। वास्तव में देश की राजनीतिक पार्टियों में से जो जहां पर विपक्ष में है, वह विपक्ष में रहकर तथा जो जहां सत्ता में है वहां सत्ता में रहकर बस इतना ही कर पा रही हैं, यह अलग बात है कि उनके इतना करने से समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मानना पड़ेगा कि समस्या का मूल कुछ और ही है, जिसे हम खोज नहीं पा रहे हैं।
किसानों की आत्महत्या का प्रथम कारण है देश की राजनीति की दिशाहीनता और उसका किसान विरोधी आचरण। भारत की राजनीति ने भारत के किसान को प्रकृति का मित्र न बनाकर उससे उसकी शत्रुता करा दी है और यह देन हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी की रही। किसान के कृषिक यंत्रों का और प्रकृति का जन्मजात वैर है। एक अकेले टै्रक्टर ने खेतों से किसानों के मित्र केंचुओं का तो सफाया किया ही है साथ ही खेतों में शीशम, आम, पीपल, बरगद, जामुन आदि के अपने आप उग आने वाले वृक्षों को भी काट-काटकर समाप्त कर दिया है। हमें वृक्षारोपण की आज आवश्यकता इसीलिए पड़ी है कि हमने प्रकृति द्वारा अपने आप वृक्षों के उगाने की प्रक्रिया को बाधित कर दिया है। इसका परिणाम यह आया है कि हमारे देश से परम्परागत वृक्ष समाप्त होते जा रहे हैं, और यहां विदेशी वृक्ष लगाने का प्रचलन बढ़ा है। वृक्षारोपण के समय पढ़े-लिखे लोग भी ऐसे विदेशी वृक्ष लगाते हैं जिनका भारत के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अब जिस देश का अधिकारी वर्ग और नेता वर्ग ही प्रकृति पर कुल्हाड़ा चला रहा हो तो उस देश में किसान सुखी कैसे रह सकता है? जब हम हल से खेती करते थे तो खेतों में उग आये अपने आम, पीपल, बरगद, शीशम, जामुन आदि के वृक्षों की रक्षा करते थे और बदले में वे हमारी रक्षा करते थे। आज स्थिति पलट गयी है।
किसानों की आत्महत्या का दूसरा कारण है-शिक्षा का विदेशीकरण। प्रचलित शिक्षा ने भारत के युवा वर्ग को उसके परम्परागत खेतीबाड़ी के कार्यों से काटकर रख दिया है। यह रोजगार देने वाली शिक्षा न होकर बेरोजगार पैदा करने वाली शिक्षा सिद्घ हो चुकी है। परम्परागत उद्योग धंधे और कारोबारों को उजाडक़र इसने किसानों के बच्चों को बेरोजगार बना दिया है। वे पढ़-लिखकर अपने माता-पिता पर बोझ बन रहे हैं और उनके कार्यों में हाथ बंटाने में अपना अपमान समझ रहे हैं। साथ ही बेरोजगार बच्चों को शहर की हवा लगते ही उन्हें महंगे फोन, और दुपहिया या चौपहिया वाहन की आवश्यकता घेर लेती है। जिन्हें एक किसान पिता पूरा नहीं कर पाता और यदि पूरा करता भी है तो फिर मोबाइल का खर्चा और वाहन के तेलादि का खर्चा उसकी सीमा से बाहर हो जाता है। डिजीटल होती इंडिया किसान की आत्महत्या का कारण बन रही है। एक मध्यम वर्गीय नौकरीपेशा व्यक्ति जिसे 40-50 हजार की मासिक आय है-वह इस आपाधापी की जीवनशैली में कहीं टिक नहीं पा रहा-तो फिर 10-5 हजार की मासिक आय वाला किसान कैसे अपने आपको जीवित रखे? वह अंधा हो चुका है और अंधेपन में जाने अनजाने में वह ऐसा रपटता है कि मौत से जा मिलता है। इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। किसान की आत्महत्या का यह प्रमुख कारण है। वह चाहता है कि वह स्वावलंबी हो और आत्मसम्मान का जीवन जीये पर परिस्थितियां उसे जकड़ लेती हैं और इसी समय उसे मृत्यु पकड़ लेती है।
तीसरा कारण है गांवों में खेतीहर मजदूरों का बढ़ता अभाव। पहले लोग अपनी फसल की निराई-गुड़ाई स्वयं किया करते थे। फसल के साथ उग आयी घास को पशुओं को खिलाते थे, पर अब यह घास खरपतवार नाशकों से समाप्त करायी जाती है। खेती की निराई-गुड़ाई के लिए मजदूर महंगे मिलते हैं, अब से 30-40 वर्ष पूर्व तक भारत में सहकारी खेती परम्परागत रूप से होती आ रही थी। उसे बताने या समझाने की आवश्यकता नहीं थी। लोगों में समन्वय का भाव इतना था कि वे स्वयं ही एक दूसरे के काम में सहायता देते थे। खेतीहर मजदूर स्वयं जाकर किसान को मदद देते थे, समय आने पर किसान उन्हें अपनी फसल में से उनका अंश देता था। यदि फसल मर जाए तो सबकी मर गयी और बच गयी तो सबको लाभ होता था। यह भारत की सहकारी खेती का सूत्र था। आज महंगी खेती मर जाए तो यह किसान की ही मरती है-समाज पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मरते हुए किसान को पहले लोग बचाने के लिए अर्थात उसकी आर्थिक सहायता करने के लिए भी सामने आते थे। उसकी कन्या के विवाह में खुलकर सहयोग करते थे, पर आज यह स्थिति नहीं रही है। जातिवादी राजनीति ने खेतीहर मजदूरों को खेती से छीन लिया है और उन्हें किसी की बेगार न करने का निर्देश देकर अपनी ‘परम्परागत वोट’ के रूप में प्रयोग करना आरंभ कर दिया है। इससे खेती और खेती के स्वरूप में साथ ही सामाजिक समरसता के परम्परागत स्वरूप में भारी परिवर्तन आया है। जिससे किसान अपनी समस्याओं से अकेला जूझ रहा है। उसका परिवार उसके साथ नहीं, देश की राजनीति उसके साथ नहीं और ना ही सामाजिक स्तर पर कोई उसके साथ है तो ऐसे में वह क्या करे? आज आवश्यकता है कि किसान को प्रकृति का मित्र बनाया जाए, वृक्षारोपण का नाटक बंद कर स्वयं उग आने वाले हमारे परम्परागत वृक्षों की रक्षा की जाए। वृक्षारोपण अभियान देश की अर्थव्यवस्था पर व्यर्थ का भार है। योगी आदित्यनाथ जी से हमारा निवेदन है कि वह सही दिशा में निर्णय लेकर देश की राजनीति का मार्गदर्शन करें। शिक्षा में परिवर्तन लाया जाए और विद्यार्थियों को उनके परम्परागत व्यवसाय को आधुनिक स्वरूप में अपनाने हेतु प्रेरित कर उनकी रूचि में सकारात्मकता का पुट पैदा किया जाए, गांवों के परिवेश को सहकारी खेती की सहकारी भावना से ओतप्रेत बनाया जाए, परिणाम सुखद आयेंगे।

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