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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से भयानक राजनीतिक षडयंत्र राजनीति विशेष संपादकीय

15 अगस्त सन 1947 और भारत का विभाजन

भारत के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इसका इतिहास जो आज विद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है वह इसका वास्तविक इतिहास नहीं है। यह इतिहास विदेशियों के द्वारा हम पर लादा गया एक जबर्दस्ती का सौदा है और उन विदेशी लेखकों व शासकों के द्वारा लिखा अथवा लिखवाया गया है जो बलात् हम पर शासन करते रहे और शताब्दियों तक इस राष्ट्र का शोषण करते रहे।
भारत के अतीत को खोजिये तो आप पाएंगे कि आज का बांग्लादेश, पाकिस्तान, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, ईरान और अफगानिस्तान सहित एशिया में कितने ही देश इस देश के अतीत के अंग बने हुए थे। ये सब मिलकर भारत का निर्माण करते थे अथवा यह कहें कि इन सबसे मिलकर भारत बनता था। आज जब इतने बड़े भू-भाग पर चिंतन करते हैं तो यह सोचकर कष्ट होता है कि कभी अपना भारतवर्ष कितना बड़ा था?
सोवियत संघ की भांति ये विभिन्न देश मिलकर एक महादेश का निर्माण ही नहीं करते थे, अपितु इनकी भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक एकता शक्ति इन्हें एक ही राष्ट्र राज्य की इकाई बनाती थी। इनकी राष्ट्रभक्ति सदा अक्षुण्ण रही। कई बार ऐसे अवसर भी आये कि जब स्वतंत्र शासकों के होने के उपरांत भी भारत के इस भू-भाग के शासकों की निष्ठा भारत के प्रति अडिग रही। कालांतर में जब मजहब नाम का शत्रु भारत में घुसा तो उसने मजहब के नाम पर भारत के टुकड़े करने आरंभ कर दिये। उसी का परिणाम है कि वह वृहत्तर भारत आज हमें कहीं दिखायी नहीं देता।
महाभारतकालीन भारत
महाभारत काल में भारत के अंदर 101 प्रसिद्घ क्षत्रिय राजवंश थे। इनमें से 86 राजा मगध नरेश जरासंध ने पराजित कर जेल में डाल रखे थे। इन 101 राजवंशों के इतने ही महाजनपद (प्रांत या राज्य क्षेत्र) थे। इससे महाभारत (विशाल भारत) का निर्माण होता था। ये राजा किसी एक राजा से होने वाले दूसरे राजा के युद्घ की भांति कौरव पांडवों के युद्घ में सम्मिलित नहीं हुए थे, अपितु सभी राजा एक दूसरे के विपक्ष में सम्मिलित होकर लड़े थे। इसीलिए यह महाभारत का युद्घ कहलाया। आज इस तथ्य से बहुत कम लोग भारत में परिचित हैं कि वह युद्घ ‘महाभारत का युद्घ’ क्यों कहा जाता है?
महाभारत काल में एक वंश का नाम तर्जिका आता है। इनके प्रांत का नाम कालतोयक था। गुप्तों के काल में कालतोयकों पर मणिधांमजों का राज्य था। वर्तमान अफरीदी (मूलपाठ अपरन्ध्र) पठानों के प्रांत का नाम अपरांत या अपरीत था। आज का समरकंद चर्मखंडिक कहलाता था।
सम्राट द्रहयु के वंशज गांधार ने गांधार राज्य की स्थापना की, जो कि मांधाता से कुछ काल पश्चात हुआ था। महाराजा दशरथ के पुत्र और श्रीराम के अनुज भरत के पुत्रों तक्ष और पुष्कार की नगरियां इसी गांधार देश की सीमा में थीं।
सम्राट मांधाता के काल से ही भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा पर यवन लोगों का एक समुदाय था। कालांतर में ये लोग यहां से आगे बढ़े और आगे बढक़र इन्होंने यूनान व ग्रीस देश की स्थापना की। यूनान और ग्रीस से भारत के युगों पुराने संबंध हैं। उसकी संस्कृति की प्राचीनता भारत की देन है।
अल्बरूनी के अनुसार वर्तमान मुल्तान वह स्थान है जहां कभी प्राचीन राजवंश सैवीर के शासक राज्य करते थे। इसी प्रकार वर्तमान स्यालकोट कभी शाकल नगरी थी। जिसे अल्बेरूनी ने सालकोट लिखा है। वर्तमान बंगाल से लगता हुआ उड़ीसा कभी का अंग-देश है जिस पर कर्ण ने शासन किया था। बंग इसी से लगता हुआ प्रांत था। कालांतर में यह बंग ही बंगाल के रूप में रूढ़ हो गया।
इससे आगे का प्रांत प्राग्ज्योतिष (वर्तमान असम) था। इसे कामरूप भी कहा जाता है। कभी इसी का नाम चीन भी था। जबकि वर्तमान चीन का नाम महाचीन था। इसी प्रकार कौटिल्य ने भी चीन शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए किया है। जो विशाल भारत को दर्शित करता है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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