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कविता

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

विचार लो कि मृत्य हो न मृत्यु से डरो कभी ।
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी ।
हुई न यूं सुमृत्यु तो वृथा मरे वृथा जिए।
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो…

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती।
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती ।
उसी उदार की सदा सजीव कृति कूजती
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म -भाव जो असीम विश्व में भरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
मनुष्य मात्र बंधु हैं यही बड़ा विवेक है।
पुराण पुरुष स्वभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाहृय भेद हैं।
परंतु अंतरैक्य में प्रमाण भूत वेद है।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी।
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थि जाल भी ।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया।
सहर्ष वीर करण ने शरीर चर्म भी दिया ।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
रहो ना भूल कर कभी मदांध तुच्छ वित्त में ।
सनाथ आपको करो न गर्व चित्त में ।
अनाथ कौन है यहां त्रिलोकीनाथ साथ हैं।
दयाल दीन बंधु के बड़े विशाल हाथ है
अतीव भाग्यहीन हैं अधीर भाव जो भरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव है खड़े ।
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े ।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ों सभी।
अभी अमृत्य अंक में अपन्क को चढो सभी।
रहो न यों कि एक से न एक का काम सरे।

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मेरे।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए।
विपत्ति विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हां बढ़े न भिन्नता कभी।
अतर्क एक पंथ में सतर्क पंथ हो सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

मैथिलीशरण गुप्त

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