जब तक ये तथ्य हमारे सामने नहीं लाये जाएंगे-तब तक हमारे भीतर इस शब्द को अपनाने में हीन भाव बना रहेगा। वस्तुत: हिन्दू एक चुनौती का नाम है, जिसका पर्याय काला, काफिर आदि हो ही नहीं सकते। यह चुनौती वही है जो मध्यकाल में हमारे पूर्वजों द्वारा विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं को दी जाती रही, और जिसके सामने उन विदेशी आक्रांताओं का टिकना कठिन हो गया था।  

मुस्लिम सम्प्रदाय के जन्म से सदियों पूर्व हमारे यहां यूनानी लेखक मैगस्थनीज जब आया तो उसने यहां से वापस अपने देश में जाकर अपनी भारत यात्रा के संस्मरण लिखे थे। ये संस्मरण जिस पुस्तक में उसने लिखे उसका नाम उसने ‘इण्डिका’ दिया था। यह ‘इण्डिका’ ही कालांतर में इस देश के लिए ‘इण्डिया’ के रूप में रूढ़ हुआ। इससे दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं-

प्रथम तो ‘इण्डिया’ का नाम इस देश को अंग्रेजों ने नहीं, अपितु उससे पूर्व अन्य लोग दे चुके थे। भारत के इण्डिया नाम को अंग्रेजों के साथ जोडक़र देखने वाले लोग इस तथ्य को समझें। जब कोलम्बस अंग्रेजों के भारत आगमन से सौ पूर्व भारत की खोज के लिए निकला तो वह अमेरिका पहुंच गया। वह जहां पहुंचा उस स्थान को उसने पश्चिम का भारत अर्थात वैस्ट इंडीज के नाम से पुकारा। इसका अभिप्राय है कि यदि उस समय वैस्ट इंडीज था तो कोई ईस्ट इंडिया भी होगा, और ईस्ट इण्डिया भारत ही था। इसी नाम से अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक कंपनी बनायी।

दूसरे-‘इण्डिका’ भी ‘इण्डस’ से ही निकलकर आने वाला शब्द था। इसलिए ही सिंधु नदी को भारत के नामकरण और यहां की सभ्यता और संस्कृति को प्रभावित करने वाली नदी के रूप में माना जाता है।

आर्य और आर्यावर्त

प्राचीनकाल में इस देश की संस्कृति के तीन आधार थे-प्रथम-आर्य (यहां के नागरिक)

द्वितीय-आर्य भाषा (यहां की राष्ट्रभाषा संस्कृत)

तृतीय-आर्यावर्त (इस देश का प्राचीन नाम)

यही आर्य, आर्यभाषा और आयावर्त के स्थानापन्न बन गये हैं-हिंदू, हिन्दी, हिन्दुस्थान। कुछ भारतीय कवियों ने इसी समीकरण को भारतीय, भारती और भारत के रूप में भी अपने उत्कृष्ट कवित्त में स्थान देकर गौरवान्वित किया। निस्संदेह आर्य का हिन्दू तक पहुंचने का क्रम एक जंग लगी व्यवस्था के समान था। आर्य मानो इस पावन भारतीय सांस्कृतिक गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री था तो हिंदू प्रदूषणयुक्त वह गंगा बन गयी जो मैदानों में बहकर कई प्रकार के कूड़े करकट को अपने साथ लेकर सागर की ओर बढ़ती है। निश्चित रूप से हमें अपनी गंगोत्री से अधिक प्रेम करना चाहिए अर्थात अपने मूल से अधिक प्रेम होना चाहिए।

आर्य समाज ने इस प्रदूषणयुक्त गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का बीड़ा उठाया। जिसमें उसे अपने प्रारम्भिक काल में आशातीत सफलता भी मिली। स्वामी श्रद्घानंद जैसे लोगों को इस शब्द से कोई चिढ़ नहीं हुई। उन्होंने गैर हिंदुओं को शुद्घ कर पुन: हिंदू बनाया। स्वामीजी हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने। हमें इन वंदनीय पुरूषों की भावनाओं का सम्मान करते हुए इनसे शिक्षा लेनी चाहिए और हिंदू समाज के उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए।

तीखी आलोचना कर देना और हिंदू से स्वयं को कतई अलग दिखाने का प्रयास करना, महर्षि दयानंद की पावन संस्था आर्य समाज को एक संप्रदाय में परिवर्तित करने का घृणास्पद प्रयास होगा। यदि हम आर्यसमाज को एकसंप्रदाय में परिवर्तित कर गये तो अनर्थ हो जाएगा। इससे हमें सावधान रहना होगा।

हमें विचार करना होगा कि आर्य हिंदू का यह विरोध कल को आर्यभाषा अर्थात हिंदी के विरोध में यदि परिवर्तित हो गया तो क्या होगा? क्या हिंदी को आज की परिवर्तित परिस्थितियों में संस्कृत कहा जाता है-नहीं और कदाचित संभव भी नहीं।

जैसे हमने अपनी हिन्दी भाषा को संस्कृत साहित्य के शब्दों से समृद्घ किया है वैसे ही हमें हिंदू को आर्य संस्कारों से समृद्घ करना है। उसे राम और कृष्ण की वास्तविक संतान और उत्तराधिकारी बनाना है। तब यह हिंदू का बंधन हम पर से स्वयं ही ढ़ीला हो जाएगा। इसे विवाद का विषय बनाना अपनी ऊर्जा को नष्ट करना है। हमें जंग लगी व्यवस्था और प्रदूषण युक्त गंगा से लडऩा है, उसके लिए सभी के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता है।

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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