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इतिहास के पन्नों से

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च के अवसर पर विशेष : मां पन्नाधाय के नाम पर किया जाए राष्ट्रीय पुरस्कार आरंभ

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर हम अपने देश की अनेक महान नारियों को स्मरण कर रहे हैं। हम यहां पर वैदिक काल की अपाला ,घोषाल ,मदालसा ,अनुसूया आदि के बारे में बात न करके भारत के पिछले 1200 – 1300 वर्ष के इतिहास के कालखंड पर विचार करें तो हमें पता चलता है कि इस काल में भी अनेक देशभक्त वीरांगनाओं ने अपने-अपने काल में देश और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना अनुपम बलिदान दिया है या कोई भी ऐसा महान कार्य किया है जिससे उनकी सुगंध इतिहास के पृष्ठों पर आज भी स्पष्टतया अनुभव होती है। यह एक महान संयोग ही है कि जब आज संपूर्ण संसार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है तब तप, त्याग, वीरता और बलिदान की प्रतीक माता पन्नाधाय गुजरी का जन्म दिवस भी है। आज ही के दिन 1534 ईस्वी में रानी कर्णावती ने अपने 13000 सहेलियों के साथ जौहर किया था, इसलिए दोनों वीरांगनाओं को भी नमन करते हुए आज के दिवस पर वीरांगनाओं की चर्चा करना आवश्यक है।
जब वीरांगनाओं की ही बात चल पड़ी है तो हमें याद रखना चाहिए कि 712 इसमें मोहम्मद बिन कासिम द्वारा जब भारत पर आक्रमण किया गया तो उसका सामना भारत के महानायक राजा दाहिर सेन से हुआ था। उस युद्ध में राजा दाहिर सेन की पत्नी लाडी रानी और उनकी दो बेटियां सूर्यप्रभा और चंद्रप्रभा ने अपने बौद्धिक और रणनीतिक कौशल का परिचय देकर इतिहास में अपना नाम अमर किया था। उनके कारण देश का सम्मान बढ़ा था। आज हमें उनकी पावन स्मृतियों पर भी श्रद्धा के पुष्प चढ़ाने चाहिए। आज हम उस वीरांगना श्यामली की वीरता को भी नमन करें जिसने युद्ध क्षेत्र में मोहम्मद गौरी से लड़ते हुए पृथ्वीराज चौहान की प्राण रक्षा की थी और जो मुसलमान सैनिक पृथ्वीराज चौहान को मारने के लिए आगे बढ़े थे उनकी आहुति युद्ध यज्ञ में देकर मां भारती के सम्मान की रक्षा की थी। उसने अपनी वीरता और त्याग के बदले में पृथ्वीराज चौहान के आग्रह के उपरांत भी कुछ नहीं मांगा था। इसी पृथ्वीराज चौहान की महारानी संयोगिता और उसकी ननद तथा चित्तौड़ के महाराणा समरसिंह की रानी पृथा ने जौहर रचाकर अपना प्राणोत्सर्ग किया था। यह घटना दिल्ली के लाल किले में हुई थी। इसी लालकिले में महारानी संयोगिता और उनकी ननद पृथा को अपने-अपने पतियों के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना मिली थी। लालकिला उस समय लालकोट के नाम से प्रसिद्घ था। पूरे दुर्ग में अपने महाराज के वीरगति प्राप्त हो जाने के कारण सन्नाटा छाया हुआ था। साथ ही यह भी भय था कि अब कभी भी विदेशी आक्रांता किले में प्रवेश कर सकते हैं और उसके पश्चात यहां ऐसा दानवीय कृत्य होना संभावित था कि जिसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाने थे-अर्थात भारत की महारानी संयोगिता और उनकी ननद सहित हजारों भारतीय वीरों, सेनापतियों, सेनानायकों की पत्नियों व बहू बेटियों के शीलहरण का परंपरागत दानवी खेल।
इससे पहले कि मोहम्मद गौरी का सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक हमारी इन महान नारियों को हाथ लगाता, ये दोनों वीरांगनाएं जौहर के माध्यम से वीरगति को प्राप्त हो गई थीं। भारत के अनेक शूरवीरों की लाशों पर पैर रखकर जब कुतुबुद्दीन भीतर पहुंचा था तो उसे उनकी राख के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला था। आज उस जौहर और वीरता के खेल को भी स्मरण करने का दिन है।
हमें आज पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला और कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी कल्याणी के उस महान कार्य को भी स्मरण करना है जिसके माध्यम से उन्होंने भारत के अपमान का बदला लिया था और यह सिद्ध किया था कि हमारे पिता बेशक परस्पर लड़ते रहे हों,पर हम मां भारती की सच्ची संतान होने का गर्व करती हैं और इसलिए मां भारती के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देती हैं। उन्होंने गौरी के काजी का अंत किया था और शत्रु के घर में जाकर भारत के सम्मान की रक्षा की थी।
इसी परंपरा में कानपुर के किशोरा राज्य की आत्म बलिदानी राजकुमारी ताजकुंवरी का नाम भी स्मरणीय है। किशोरा राज्य के राजा सज्जन सिंह की इस बेटी ने कुतुबुद्दीन ऐबक से टक्कर ली थी और अपना व अपने देश का सम्मान रखते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। इसी प्रकार इसकी छोटी बहन कृष्णा और दादी विद्योत्तमा ने भी अपना सम्मान बचाकर अपना बलिदान दिया था।
इसी कड़ी में रानी नायिका का भी नाम उल्लेखनीय है, जो कि अन्हिलवाड़ा के राजा अजयपाल सिंह की रानी थी। जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के उपरांत अपने पुत्र मूलराज और भीमदेव सोलंकी को अपनी कमर पर उसी प्रकार बांधकर युद्ध मैदान के लिए प्रस्थान किया था जिस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई ने अपने बेटे को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। मां ने अपने बेटे मूलराज को हिंदू राजाओं के समक्ष युद्ध के मैदान में दिखाते हुए कहा था कि यह बाल्यराज आप लोगों की गोद में डाल रही हूं। प्राण प्रण से इसकी रक्षा कीजिए। तब आग भड़क उठी और सारी हिंदू सेना और आसपास के सहायक हिंदू नरेश भी मोहम्मद गौरी के विरुद्ध इस प्रकार लड़े कि मार से मात खाकर विदेशी आक्रमणकारी की सारी सेना चारों दिशाओं में बिखर गई थी। रानी ने विदेशी आक्रमणकारी को बुद्धिमत्ता पूर्ण ढंग से मार भगाया था और उसका गुप्तांग काटकर उसे हमेशा के लिए नपुंसक बनाकर उसका वंश ही समाप्त कर दिया था।
हमारे देश में वीरांगनाओं की इसी परंपरा में रानी पद्मिनी, गोरा बादल और गोरा की पत्नी की कहानी भी कम रोमांच पूर्ण नहीं है। रानी पद्मिनी ने हजारों वीरांगना सहेलियों के साथ अपना बलिदान दिया था और गोरा की पत्नी को जब गोरा के बलिदान की जानकारी हुई थी तो उसने भी चिता जला कर अपना प्राणांत किया था।
यजुर्वेद( 5/12) में सच ही तो कहा गया है कि “हे नारी तू शेरनी है, तू आदित्य ब्रह्मचारियों की जन्मदात्री है। हम तेरी पूजा करते हैं। हे नारी तू शेरनी है, तू ब्राह्मणों की जन्मदात्री है, क्षत्रियों की जन्म दात्री है, हम तेरा यशोगान करते हैं, तेरी पूजा करते हैं।”
हम यह तो कहते हैं कि जहां नारियों की पूजा होती है ,वहां देवताओं का वास होता है, पर यह नहीं जानते कि पूजा का अर्थ क्या है ? पूजा का यही अर्थ है जो यजुर्वेद के इस मंत्र में स्पष्ट किया गया है।
इसी क्रम में छत्रसाल की माता रानी सारंधा, रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, माता जीजाबाई, वीरांगना चारुमति, चित्तौड़ के राणा रतन सिंह की पुत्रवधू रानी उर्मिला, रानी झलकारी बाई, रानी अहिल्याबाई, कित्तूर की रानी चेन्नम्मा, माता देवकी, महारानी तपस्विनी, माता मरूद्धति, क्रांतिकारी दुर्गा भाभी, रानी किरणमई अथवा किरण देवी, लक्ष्मीबाई केलकर ( मौसी जी) वीरांगना रामप्यारी गुर्जरी, माता गुर्जरी( गुरु गोविंद सिंह की पत्नी), वीरांगना नीरा आर्या जैसी अनेक महान महिलाओं के नाम उल्लेखनीय हैं। जिनके नाम लेने मात्र से इतिहास के मोटे-मोटे ग्रंथ भर जाएंगे, इसलिए यहां उन सबका कीर्तिगान किया जाना संभव नहीं।
केंद्र की मोदी सरकार को चाहिए कि आज जब हम मां पन्ना धाय का जन्म दिवस मना रहे हैं तब राष्ट्रीय स्तर पर इस महान नारी के तप, त्याग और बलिदान को सम्मान देने के लिए एक ऐसे पुरस्कार की स्थापना की जाए जो महान माताओं को मिले जिनके बेटे अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देते हुए देश के लिए अमर हो जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की परंपरागत धुंधली सी छवि से बाहर निकाल कर इस दिवस को भारतीय संदर्भ में सही गरिमा प्रदान करने का समय आ गया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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