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पर्व – त्यौहार

होली: एक यज्ञीय पर्व

(हरिभूमि समाचार पत्र में होली पर विशेष रूप से प्रकाशित लेख)

डॉ विवेक आर्य

आज होली पर्व है। होली सांस्कृतिक उत्सव है। इस पर्व का प्राचीन नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् वसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ। होली होलक का अपभ्रंश है। तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है। हमारी संस्कृति यज्ञीय है। इसी का अनुसरण करते हुए हम प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ के रूप में होली रूपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते आये है। यह यज्ञ एक बड़े सामूहिक यज्ञ से आरम्भ होता है और उसी यज्ञ से अग्नि लेकर हम घरों में छोटे-छोटे हवन करते थे। इससे घर की वायु शुद्धि होती है। ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं। उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ सर्वोत्तम साधन है।

परमात्मा ने सभी प्राणियों को यह सुन्दर सृष्टि बिना किसी शुल्क के सदुपयोग के लिए दी है। अन्य प्राणी इसको गंदा नहीं करते। मनुष्य ही इसको विकृत करता है। इस सारे संसार को रहने के योग्य बनाए रखना मनुष्य का ही दायित्व है। मनुष्य ही यह कर सकता है। इसको स्वच्छ शुद्ध बनाए रखने के लिए जितने भी उपाय हो सकते हैं, उनका सम्मिलित नाम यज्ञ है। इसलिए हमारे बुद्धिमान पूर्वजों ने हमारे सांस्कृतिक पर्वों को, हमारे उल्लास को, हमारे पारिवारिक व सामाजिक उत्सवों को, मांगलिक कार्यों को यज्ञ से जोड़ दिया। ताकि हम इस संसार का, संसार के पदार्थों का और अपने जीवन का सम्पूर्णता के साथ सदुपयोग कर सकें।

जैसे जैसे कथित प्रगति हो रही है, वह मनुष्य को विलासी बना रही है। विलास ही विनाश का कारण बनता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भौतिक उन्नति नहीं होनी चाहिए। बात यह है कि संतुलन होना चाहिये। मनुष्य को यह ज्ञान होना चाहिए कि यह सांसारिक उन्नति उसके सहयोग के लिए है। उसकी उन्नति में सहायता के लिए है। सुविधा के साधन किसके लिए हैं और जिसके लिए हैं उसे करना क्या है? उसके जीने का उद्देश्य क्या है? यह जाने बिना सुविधा के साधन मनुष्य के मित्र नहीं शत्रु बन जाते हैं। इस संतुलन को यज्ञ की भाषा में संगति करण कहा जाता है। जैसे सभी नद नाले अन्ततः समुद्र में ही जाकर गिरते हैं, उसी तरह हमारे जीवन के सभी क्रियाकलापों का, पुरुषार्थ का समायोजन हमारे जीवन के उद्देश्य में होना चाहिए। उदाहरण के लिए हम कमाते हैं तो उसका उद्देश्य शरीर का पालन पोषण करना और उस शरीर के द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करना होना चाहिए। कमाने वाले को इसका ज्ञान भी होना चाहिए और ऐसा ही करना भी चाहिए। तब उसका कमाना भी यज्ञ ही हो जाता है, इसी को संगति करण कहते हैं। यह संगति करण पांचों यज्ञों में होता है।
इस सृष्टि का कण-कण उपयोगी है। उनको देव नाम दिया गया है। समय के प्रवाह में शब्द बदले हैं तो उनके अर्थ भी बदले हैं। आज देव शब्द का सामान्य सा अर्थ यह हो गया है कि देव है तो उसके आगे हाथ जोड़कर तो निकलना ही है। यह देव शब्द जिस ‘दिवु’ धातु से बना है उसके दस अर्थ होते हैं। मोटे रूप में संसार के जितने भी उपयोगी पदार्थ हैं वे देव हैं। अब ये देव जड़ भी है चेतन भी हैं। सजीव भी हैं निर्जीव भी हैं। आज ये सारे देव नाराज हैं। हमारे भाइयों को लाखों किलोमीटर दूर ब्रह्माण्ड में घूम रहे ग्रहों के कुपित होने की तो चिन्ता है, हमारे आसपास के देवताओं के कुपित होने की चिन्ता नहीं है। भौतिक उन्नति तो इन देवताओं को रुष्ट ही कर रही है। प्रगति की अंधी दौड़ में भूमि विकृत हो गई, हवा विकृत हो गई, जल दूषित हो गया। यह सन्तोष की बात है कि अब बुद्धिमान लोगों को यह चिन्ता होने लगी है कि यह सब जो बिगाड़ा गया है, यदि ठीक नहीं किया गया तो विनाश हो जाएगा। लेकिन पर्यावरण की शुद्धि पत्तों को पानी देने से नहीं होगी, जड़ में पानी देने से होगी। पर्यावरण को शुद्ध करने का सर्वश्रेष्ठ और सम्पूर्ण तरीका हवन है। जड़ देवताओं के नेता अग्नि को श्रेष्ठ पदार्थ देने से वे सब देवताओं को मिल जाते हैं। अग्नि को दिये बिना वे खा नहीं सकते हैं। जठराग्नि न हो तो हम भी नहीं खा सकते। यह बिल्कुल व्यवहारिक विधि है। जिसके पास जिस वस्तु की कमी है, उसे वह दे दो। बच्चा भी इस बात को समझ सकता है। पुष्टि चाहिए तो पुष्टिकारक पदार्थ दे दो। दुर्गन्ध दूर करनी है तो सुगन्धित पदार्थ दे दो।

चेतन देवता भी नाराज हैं। बुजुर्गों की दुर्गति हो रही है। आपने कभी बन्दरों को देखा! खाने के पदार्थ पर एक बड़ा बन्दर कब्जा कर लेता है, कमजोर देखते रह जाते हैं। क्या मनुष्य बन्दर की ही औलाद है? कोई मनुष्य भूख से तड़प रहा है, आप पकवान खा रहे हैं! किसी के तन पर वस्त्र नहीं, रहने को झोंपड़ी नहीं! आप विलासिता पूर्ण जीवन जी सकते हैं? इसका समाधान यज्ञीय भावना है। अकेला खाने वाला पापी होता है। यज्ञ कहता है दूसरों को खिलाकर खाओ। अन्न ही तो है सम्पत्ति। इसलिए हमारे पूर्वजों ने दोनों मुख्य फसलों के आगमन पर यज्ञ का विधान किया। दीवाली और होली। पहले यज्ञ करो, जड़ देवताओं को खिलाओ। फिर चेतन देवों को बांटो। फिर स्वयं खाओ। तब सभी देवता प्रसन्न होंगे; कहीं अज्ञान, अभाव और अविद्या का नाम नहीं रहेगा और यह सृष्टि हमारे रहने का स्थान सुन्दर और पवित्र रहने के योग्य बना रहेेगा। आइये सब मिलकर होली के अवसर पर यज्ञ भावना से अपने जीवन को जीने का संकल्प ले।

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