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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से राजनीति विशेष संपादकीय

दोहन का उपाय ‘शोधन’ है

मोदी सरकार ने एन.जी.ओ. के विरूद्ध कठोरता का संदेश देकर उचित किया है, या अनुचित, इस पर देश में बहस चल रही है। इसके लिए एक गैर सरकारी संगठन के विषय में यह जानना आवश्यक है कि वास्तव में यह होता क्या है? इसके लिए विद्वानों का मानना है कि समाज का चेहरा बदल देने की आत्मिक आकांक्षा से विभिन्न कार्यक्रमों और सुव्यवस्थित परियोजनाओं को संचालित संपादित करने वाला ऐसा जनसंगठन जो नागरिकों की स्वस्फूत्र्त भावना और कामना से प्रेरित होकर संगठित किया गया हो, गैर सरकारी संगठन कहा जाता है। ये संगठन सामाजिक चेतना को जागृत करने का कार्य करते हैं और जो चीजें सरकार के या सरकारी अधिकारियों के संज्ञान में ना हो, लेकिन सामाजिक प्रगति के लिए और सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाये रखने के लिए आवश्यक हों, उसे ये सरकार के संज्ञान में लाने का विशेष कार्य करते हैं। जब तक इन संगठनों की ऐसी भावना होती है तब तक ये सरकार और समाज के लिए बहुत ही उपयोगी होते हैं। 
एक लोकतांत्रिक समाज में समाज के लोकतांत्रिक स्वरूप को बचाये व बनाये रखने के लिए इन संगठनों की आवश्यकता होती है। इसलिए भारत ने भी इन गैर सरकारी संगठनों को अपने समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिया। पर अब गैर सरकारी संगठनों पर लगाम कसने की अचानक सरकार को आवश्यकता आन पड़ी है। वास्तव में कुछ ऐसी बातें हैं कि जिन पर ये संगठन खरे नही उतर रहे। विदेशी अनुदान से ये अपनी मौजमस्ती ही नही कर रहे हैं, अपितु अब तो चर्चा ये भी है कि देश की सरकारी योजनाओं का विरोध करने या उनके विरूद्ध माहौल बनाने और अपना उल्लू सीधा करने की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में भी ये सम्मिलित मिल रहे हैं। देश की सरकारों को विदेशी चंदे से अस्थिर करना सीधे-सीधे राष्ट्रद्रोह है।
राजेन्द्र चंद्रकांत राय की पुस्तक ‘गैर सरकारी संगठन स्थापना, प्रबंधन और परियोजनाएं’ से हमें ज्ञात होता है कि 1968 में भारतीय गैर सरकारी संगठनों को केवल 24 करोड़ रूपया विदेशी अनुदान के रूप में मिला था। जो कि 2003-04 के दौरान 14700 संगठनों को बढकऱ 4856 करोड़ रूपया हो गया। 2000-01 के दौरान धार्मिक गतिविधियों के लिए 284 करोड़ रूपया प्राप्त किया गया। जबकि 2001-2 में यही राशि बढक़ऱ 391 करोड़ हो गयी। केन्द्रीय गृहमंत्रालय के अनुसार सन 2001-2 की अवधियों में इन संगठनों को 15168 करोड़ रूपया विदेशी अनुदान मिला, जबकि 2000-1 में 14598 करोड़ रूपये उपलब्ध हुए थे।
आंध्र प्रदेश का श्री सत्य सांई ट्रस्ट सर्वाधिक विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाला गैर सरकारी भारतीय संगठन है। इसने 88.18 करोड़ रूपये हासिल किये। तमिलनाडु के वल्र्ड विजन ऑफ इंडिया ने 85.42 करोड़ रूपये और महाराष्ट्र स्थिति वाच टॉवर ऑफ बाइबिल एण्ड ट्रैक्ट को 74.88 करोड़ रूपया मिले। दिल्ली ने सबसे ज्यादा 794.5 करोड़ रूपया विदेशी धन के रूप में प्राप्त किया। यह रकम 839 संगठनों के बीच बांटी गयी। इसके बाद तमिलनाडु ने 649.45 करोड़ तथा आंध्र प्रदेश ने 589.52 करोड़ की धनराशि प्राप्त की।
सूचनाएं ऐसी भी हैं कि विदेशी ईसाई मिशनरियों ने भारत का ईसाईकरण करने के लिए भारत में कार्यरत कुछ गैर सरकारी संगठनों का सहारा लिया हुआ है। इसके लिए सारे भारत को सात जोनों में विभाजित कर दिया गया है। इन जोनों की अलग अलग जिम्मेदारी अमेरिका व ब्रिटेन जैसे कई देश निभा रहे हैं। बड़े आराम से देश की नसों में जहर का इंजेक्शन दिया जाता रहा है और हमारी सरकारें चैन की नींद सोती रही हैं। कभी गैर सरकारी संगठनों की कार्य प्रणाली की समीक्षा करने की भी आवश्यकता नहीं समझी गयी और ना ही ये उचित समझा गया कि आखिर इन गैर सरकारी संगठनों को मिलने वाली धनराशि का प्रयोग कहां और किसलिए किया जा रहा है? गैर सरकारी संगठनों में से कितने ही संगठन धन के चक्कर में सरकारों को अस्थिर करने का काम अपने विदेशी आकाओं के इशारे पर करते हैं। इससे विदेशी शत्रु देशों को देश को अस्थिर करने के लिए देशी चेहरे उपलब्ध हो जाते हैं। इससे बढिय़़ा कोई बात नही हो सकती कि चेहरा आपका और साधन उनके। इसलिए बड़ी सहजता से ‘बड़े-बड़े काम’ हो जाते हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो विदेशी गुप्तचर एजेंसियों के इशारे पर सारा कार्य होता रहता है। ये विदेशी गुप्तचर एजेंसियां इन विदेशी चेहरों के रूप में देश के सत्ता प्रतिष्ठानों की अति महत्वपूर्ण सूचना तक उपलब्ध कर लेते हैं, और अपने देशों को उन्हें भेज देते हैं। इस प्रकार कठपुतलियों के सामने देश की सरकार भी कठपुतली बन जाती है। जो स्वयं किसी के इशारे पर नाचते हैं, वे ही दूसरों को नचाने लगते हैं। ये कीटाणु देश के हृदय तक पहुंच रहे हैं। जिससे पूरा देश छटपटा रहा है।
अब मोदी सरकार ने इन कीटाणुओं की रोकथाम के लिए कमर कसी है। ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए तो मोदी सरकार की सोच एकदम उचित ही मानी जानी चाहिए। परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि कहीं सख्ती बरतते-बरतते कोई सच्चा राष्ट्रवादी संगठन भी इस सख्ती की चक्की में न पिस जाए। जो गैर सरकारी संगठन देश के सामाजिक परिवेश को धर्मांतरण के माध्यम से विषाक्त बनाने का कार्य करते पाए जायें या विदेशी अनुदान का अन्यथा दुरूपयोग करते पाए जाएं, उनके विरूद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। वैसे सरकार के लिए उचित यही होगा कि वो गैर सरकारी संगठनों को हतोत्साहित करने के लिए कुछ ऐसे उपाय करे कि जिससे लोगों को जनसेवा के कार्यों के लिए दान करने का मौका तो मिले पर उस दान का लाभ कोई एन.जी.ओ. न उठा पाए, बल्कि सरकार के माध्यम से जनसाधारण उठाए। क्योंकि गैर सरकारी संगठन लोगों की दानशील प्रवृत्ति का ही अनुचित लाभ उठाते हैं। दूसरे कार्य 80 जी के अंतर्गत सरकार कुछ ऐसे ठोस उपाय करे कि यदि कोई व्यक्ति जन परियोजनाओं के लिए या लोक कल्याण के लिए प्रधानमंत्री कोष में सीधे सीधे कुछ धन डालता है तो उसका लाभ उसे आयकर रिटर्न में मिले। लोगों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे राष्ट्रनिर्माण के लिए आगे आयें, और प्रधानमंत्री कोष में अपना दान दें। उस दानराशि से फटाफट विकास कार्य किये जाएं। मैं समझता हूं कि करों की चोरी के लिए भी जो लोग जाने पहचाने जा रहे हैं, वो भी देश निर्माण के लिए फटाफट धन दान करेंगे। जिस देश में ‘भूदान यज्ञ’ सफल हो सकता है उसमें ‘धन दान’ यज्ञ क्यों नही सफल हो सकता? गैर सरकारी संगठनों ने यदि लोगों की दान प्रवृत्ति का दोहन किया है तो सरकार उसका शोधन कर सकती है। ‘दोहन’ को ‘शोधन’ ही रोक सकता है। वर्तमान में देश निर्माण के लिए यह शोधन कार्य एक अच्छा उपचार हो सकता है। इसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष यदि एक सांझी रणनीति बनायें तो भारत की राजनीति के लिए यह उपचार बहुत ही कारगर सिद्ध हो सकते हैं।

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