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बिखरे मोती

अहम् बहम के कारणै, नर ऊंचे से गिर जाए

बिखरे मोती-भाग 193
परिणाम यह होता है कि पहले तो रिश्तों में खिंचाव और बचाव का क्रम चलता है, घुटन, तनाव और दूरी बढऩे लगती है, ईष्र्या और घृणा की अग्नि जो सामाजिक आवरण की राख के नीचे दबी थी, उसे मामूली से क्रोध की चिंगारी विस्फोटक और भयावह इस कदर बना देती है कि देखने वाले और सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, सभी रिश्ते भस्मीभूत हो जाते हैं, अगली पीढिय़ों तक रिश्ते खराब हो जाते हैं। इसलिए विवेकशील व्यक्ति को जहां तक हो सके क्रोध और क्षोभ से बचना चाहिए, क्योंकि जब ये परावर्तित होकर लौटते हैं, तो प्रत्युत्तर में पहले से भी अधिक हमलावर और प्राणघातक होते हैं। माना कि क्रोध नहीं करना चाहिए- किंतु सुधार की दृष्टि से अथवा किसी के हित को दृष्टिगत रखते हुए ऐसा करना यदि अपेक्षित हो तो क्रोध करना भी चाहिए जैसे-माता-पिता, गुरू राजा, वैद्य (डाक्टर) किसी के हित के लिए उसे डांटते-फटकारते हैं तो ऐसा क्रोध ‘मन्यु’ कहलाता है। यजुर्वेद में ऐसे क्रोध (मन्यु) के लिए प्रार्थना की गयी है-‘मन्युरसि मन्युर्मयि धेहि’ अर्थात हे प्रभु! आपदुष्टों पर क्रोध करने वाले हो, मुझे भी ऐसा मन्यु प्रदान कीजिए। 
अहम् बहम के कारणै, 
नर ऊंचे से गिर जाए।
ये दो ऐसे भंवर हैं,
कोई बिरला ही बच पाय।। 1126 ।।
व्याख्या :-प्राय: इस संसार में यह देखने को मिलता है, जब मनुष्य जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति की ऊंचाई पर होता है-तो शनै: शनै: अहम (अहंकार) और बहम (दम्भ) नाम के राक्षस उसे घेर लेते हैं।
अब प्रश्न पैदा होता है-अहम् किसे कहते हैं और बहम किसे कहते हैं? अहम से अभिप्राय अहंकार से है अर्थात अपने में श्रेष्ठता की भावना ही अभिमान पैदा करती है। अभिमान तभी होता है, जब मनुष्य दूसरों की तरफ देखकर यह सोचता है कि वे मेरी अपेक्षा तुच्छ हैं। इसके अतिरिक्त बहम से अभिप्राय ‘दम्भ’ से है अर्थात मान, बड़ाई, पूजा ख्याति आदि प्राप्त करने के लिए अपनी वैसी स्थिति अथवा योग्यता न होने पर भी उसका दिखावा करना दम्भ कहलाता है।
ये अहम (अहंकार) और बहम (दम्भ) के कीड़े अर्श पर पहुंचे हुए मनुष्य को लोगों की निगाह में ऐसे गिरा देते हैं-जैसे दीमक बड़े से बड़े वृक्ष को एक दिन धराशायी कर देती है। साधारण मनुष्य की बातें तो छोड़ो, कभी-कभी तो पुण्यात्मा कहे जाने वाले व्यक्ति भी पुण्यात्मा अथवा धर्मात्मा होने का अहम (अहंकार) पाल लेते हें, इतना ही नहीं दिव्यात्मा होने का बहम (दम्भ) ही पाल लेते हैं। ये दोनों ही मन: स्थिति मनुष्य को आगे बढऩे नहीं देती हैं। ये जब अपने विकराल रूप पर आती हैं तो मनुष्य को पतन के गर्त में ऐसे डुबा देती हंै जैसे नदी में पडऩे वाले भंवर नौका को डुबा देते हैं। इस संसार में कोई बिरला ही विवेकशील व्यक्ति ऐसा होता है-जो अहम (अहंकार) बहम (दम्भ) के भंवर से बच पाता है।
इसलिए जीवन के किसी भी क्षेत्र में श्रेष्ठता पाने पर उसे कायम रखने के लिए अहम (अहंकार) और बहम (दम्भ) से हर व्यक्ति को, हर परिस्थिति में हमेशा दूर रहना चाहिए।
क्रमश:

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