भारत का राष्ट्रवाद और विश्व

भारत का राष्ट्रवाद आज के अंतर्राष्ट्रवाद से ऊंची सोच वाला रहा है। आज के विश्व मंचों पर भी राजनीतिज्ञ अपने-अपने देशों के हितों के लिए लड़ते-झगड़ते हैं, और ‘संयुक्त राष्ट्र’ जैसी विश्व संस्था का भी या तो उपहास उड़ा रहे हैं या फिर उसे असहाय बनाने में अपनी नकारात्मक भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। इन देशों की ऐसी सोच के कारण विश्व पुन: एक महाविनाशकारी युद्घ के मुहाने पर खड़ा है। कभी भी कोई उन्मादी राष्ट्र या उन्मादी राजनीतिज्ञ इस हंसती-खेलती मानव सभ्यता के विनाश के लिए युद्घ की घोषणा कर सकता है। आज के विश्व में कोई भी नेता ऐसा नहीं है जो युद्घ के स्थान पर शान्ति की भाषा बोल रहा हो और जिसका ऐसा सर्वमान्य व्यक्तित्व हो कि जिसकी बात को संसार के सभी देश मान सकते हों। चीन, अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन ये विश्व के पांच बड़े पंच हैं, और इन पांचों देशों के शासन प्रमुख इस समय युद्घ की भाषा बोल रहे हैं। जिससे युद्घ अवश्यम्भावी बनता जा रहा है। इन पांचों के हाथ में माचिस और पेट्रोल दिखायी दे रहे हैं। शांति के कबूतर उड़ाने का समय अब चला गया है, अब तो आग बरसाने वाले लड़ाकू हवाई जहाज उड़ाने का समय है। जिससे मानवता के लिए प्राण संकट का भय है। ऐसी स्थिति संसार के लिए और मानवता के लिए अपशकुन वाली है। इससे बचने के लिए भारत ने प्राचीनकाल में एक बहुत सुंदर व्यवस्था चक्रवर्ती सम्राट के रूप में स्थापित करके दी थी। यह चक्रवर्ती सम्राट संपूर्ण विश्व का सर्वमान्य नेता होता था, जिसकी बात को मानना सभी देशों के राजाओं के लिए अनिवार्य होता था। इस चक्रवर्ती सम्राट का प्रमुख कार्य घर के मुखिया की भांति संपूर्ण भूमंडल पर शान्ति बनाये रखना होता था। इसलिए इसकी न्यायपूर्ण बात को सभी सुनते और मानते थे। संयुक्तराष्ट्र की स्थिति इस चक्रवर्ती सम्राट के दसवें भाग की बराबर भी नहीं है, और इसी कारण आज विश्व शान्ति को खतरा है।
अब भारत के राष्ट्रवाद पर आते हैं। स्वामी वेदानंद तीर्थ जी लिखते हैं-”कई लोगों का विचार है कि वेद में राष्ट्र निर्माण की कल्पना है ही नहीं। ऐसा कहने वाले वेद को देखे बिना ऐसा कहते हैं, वेद में राष्ट्रकल्पना है और वह अत्यंत उदात्त तथा ऊंचे दर्जे की है। यजुर्वेद के दशम अध्याय के पहले चार मंत्रों में तो राष्ट्र की मानो मुहारनी ही है। यजुर्वेद 22/22 में राष्ट्र में क्या क्या होना चाहिए, इसका संक्षिप्त किंतु प्राञ्जल वर्णन है। अथर्ववेद के 12वें काण्ड का पहला संपूर्ण सूक्त (वर्ग) मातृभूमि विषयक हैं। ऋग्वेद का 1/80 सूक्त स्वराज्यपरक है। इन मंत्रों में जो विचार तत्व है वे इतने गंभीर और विमल भावों से भरे हैं कि उनके अनुसार आचरण मानव समाज के सभी दु:खों को मिटा सकता है। वेद सदा उत्तम राष्ट्र की भावना का प्रचारक है।”
भारत ने राष्ट्र को धारण करने के लिए बड़ी ऊंची साधना का निर्धारण किया है। उसकी दृष्टि में राष्ट्र धारण का अभिप्राय संपूर्ण भूमंडल के समस्त प्राणियों के हितचिंतन की बात करना है। संपूर्ण भूमंडल को ही एक राष्ट्र मानना और उसके निवासियों के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देना राष्ट्र की साधना करना है। अथर्ववेद 19/24/1 में आया है कि ‘तेने मं ब्रहमण्स्पते परि राष्ट्राय धत्तन’ इसका भावार्थ यही है कि स्वार्थ त्याग कर सर्वमंगलमयी कामना से प्रेरित राष्ट्र कार्य करो, यही राष्ट्र साधना है। उसी सामथ्र्य से इसे राष्ट्र के लिए धारण कर अर्थात मनुष्य के धन, जन, तन का उपयोग राष्ट्र के लिए होना चाहिए।
वेद ने राष्ट्र के लिए अपना चिंतन इतना ऊंचा क्यों रखा? इसका कारण है कि वेद ईश्वर की कल्याणी वाणी है, जो किसी एक देश के लिए या किसी एक वर्ग, समुदाय, संप्रदाय या एक पंथ के अनुयायियों के लिए हो ही नही सकती।
वेद विश्वजन्य है तो उनका ज्ञान भी विश्वजन्य ही होगा। वह दुर्गति के स्थान पर सदगति की और दुर्मति के स्थान पर सन्मति की प्रार्थना करने वाला धर्म ग्रंथ है और वह दुर्गति के स्थान पर सदगति की तथा दुर्मति के स्थान पर सन्मति की प्रार्थना करता है, इसलिए वास्तविक अर्थों में धर्मग्रंथ कहा जा सकता है। ईश्वर ने प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ पर मनुष्य मात्र का समान अधिकार माना है, धूप पर सबका अधिकार है, चंद्रमा की चांदनी पर सबका अधिकार है जल पर सबका अधिकार है तो ईश्वरीय वेदवाणी पर भी सबका समान अधिकार है।
वैदिक राष्ट्र कैसा हो और कैसे इस संपूर्ण भूमंडल पर निवास करने वाली मानवजाति का कल्याण होना संभव है? इस संबंध में यजुर्वेद 22/22में आया है :-
आ ब्रहमन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम।
आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योअतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढ़ानवानाशु: सप्ति: पुरन्धिर्याेषा जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यज्ञमानस्य वीरो जायताम्। निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम्।।
इस मंत्र में राष्ट्र के लिए आवश्यक पदार्थों की विवेचना की गयी है। सबसे पहली आवश्यकता मानी गयी है-
ब्रह्मन! स्वराष्ट्र में हों द्विजब्रह्म तेजधारी
किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए और उसके निवासियों में परस्पर सदभाव बनाये रखने के लिए मेधासंपन्न गुणी और ज्ञानी पंडितों का अर्थात सुशिक्षित विद्वानों का होना आवश्यक है। ऐसे लोगों के कारण राष्ट्रवासियों को अपनी बौद्घिक क्षमताओं के विकास का अवसर मिलता है और उनके द्वारा बड़े-बड़े वैज्ञानिक आविष्कार व खोजों का हो पाना संभव हो पाता है। इतना ही नहीं राष्ट्र की मेधाशक्ति के प्रतीक ये विद्वज्जन लोगों में परस्पर प्रीति को बढ़ाने का काम करते हैं और लोगों के भीतर मानवीय गुणों का संचार कर उन्हें आत्मिक रूप से सबल बनाते हैं। आत्मिक रूप से सबल व्यक्ति संसार में सफल व्यक्ति बनता है।
भारत में मेधाशक्ति की उपासना करने और मेधा संपन्न लोगों की संगति करने की वेद ही अन्य ऋचाएं भी हैं। जिनका आशय भी यही है कि यदि हम मेधाशक्ति के उपासक बन मेधा संपन्न लोगों की संगति करने के अभ्यासी बनेंगे तो हमारा आत्मिक मानसिक, शारीरिक व बौद्घिक विकास होगा। जिन देशों के पास मेधा संपन्न ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म तेजधारी और समाज को दिशा देने में समर्थ विभिन्न विद्याओं में निष्णात विद्वानों का अभाव होता है-वह देश संसार में किसी भी प्रकार की उन्नति करने में असमर्थ रह जाता है। ऐसे देशों के लोग स्वतंत्रता और स्वराज्य के विषय में सोच भी नहीं पाते हैं। इसलिए वे बड़ी सहजता से पराधीन हो जाते हैं। अफ्रीका के देशों का उदाहरण हमारे सामने है। भारत के महान और दिव्य मेधासंपन्न ऋषियों के कारण ही यह देश प्राचीन काल में विश्वगुरू बन सका था। उनकी दिव्यमेधा ने लोगों का बौद्घिक नेतृत्व किया और उन्हें भारत के प्रति निष्ठावान बनाया। भारत का ज्ञान-विज्ञान इसीलिए उत्तम कहा गया कि यहां एक से बढक़र एक विद्वान और दिव्य मेधासंपन्न ऋषि थे। ये लोग व्यक्ति की ज्ञान ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाते रहे और उसे सही दिशा देकर विश्व के परिवेश को सबके अनुकूल बनाते रहे। विद्या की वृद्घि और अविद्या का नाश करके संसार को सही दिशा देना इन महान विद्वानों का प्रमुख कार्य होता है। इसीलिए इस मंत्र में यह प्रार्थना की गयी है कि हमारे देश में महाविद्वान मेधा संपन्न दिव्य गुणयुक्त ब्रह्म तेजधारी द्विज लोग हों। जिनके ज्ञान सूर्य के तेज के सामने दुष्ट और अत्याचारी लोगों को रूकने या टिकने का भी साहस न हो सके। ये लोग विद्याव्यसनी हों और अपने ज्ञानबल से राष्ट्र संचालन करने में सक्षम हों। इनके बुद्घिबल से राष्ट्र की बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान मिल सकता हो। वेद मंत्र राष्ट्र में और क्या होना चाहिए? इस पर प्रकाश डालते हुए आगे कहता है –
क्रमश:

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