फल फूल से लदी हों औषध अमोघ सारी
देशवासियों को पर्जन्य समय पर बरसकर अन्नादि की पूर्ति करते हैं, साथ ही समय पर वर्षा होने से अनेकों प्रकार के पेड़ पौधों को भी नवजीवन मिलता है। मानव समाज को कितने ही पेड़ों से फल मिलते हैं तो कितनों से ही औषधियां मिलती हैं। कितनी ही वनस्पतियां हमारे जीवन के लिए बहुमूल्य औषधि प्रदान करती हैं। यही कारण है कि वेद ने राष्ट्र के आवश्यक अवयवों में फल-फूल से लदी औषधियों पेड़-पौधों को भी माना है।
स्वस्थ नागरिकों से ही स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण होता है, और स्वस्थ नागरिक तभी मिलेंगे जब उनके लिए औषधियां उपलब्ध हों। अत: वेद ने अपनी राष्ट्रीय सामूहिक प्रार्थना में व्यक्तियों के स्वास्थ्य की कामना करते हुए औषधियों की उपलब्धता की भी इच्छा व्यक्त की है। तेजधारी ब्राह्मणों की बात कहकर वेद ने मनुष्य की शिक्षा का समाधान किया है तो बलवान योद्घा की बात कहकर सुरक्षा का समाधान किया है, इसके बाद वेद ने देश आर्थिक समृद्घि की मांग की है। अब वेद कह रहा है कि अतिवृष्टि या अनावृष्टि की स्थिति राष्ट्र में कभी नहीं आनी चाहिए। ना ही दुर्भिक्ष पडऩा चाहिए। इसके लिए सभी राष्ट्रवासियों को सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास करने की आवश्यकता होती है।
हो योगक्षेमकारी स्वाधीनता हमारी
वेदमंत्र अंत में कहता है कि हमारी स्वाधीनता हमारे लिए योगक्षेमकारी होनी चाहिए। योग वह है जिसे जीवन में हमने प्राप्त कर लिया है और क्षेम वह है जो हमें अभी प्राप्त करना शेष है। अभिप्राय हुआ कि हमारी स्वाधीनता हमारे योग की रक्षिका और प्राप्तव्य अर्थात क्षेम की प्राप्ति में सहायक होनी चाहिए। स्वाधीनता पर योगक्षेमकारी होने की अनिवार्य शर्त लगाकर वेद मनुष्य के लिए पूर्णत: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की वकालत कर रहा है। साथ ही व्यक्ति के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में किसी प्रकार से भी शासन-व्यवस्था बाधक न बने इसे भी सुनिश्चित कर रहा है।
संसार के अन्य देशों की शासन व्यवस्थाएं देर तक मनुष्य के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में बाधक बनी खड़ी रहीं। इसका कारण यह था कि उन लोगों को ‘योगक्षेमकारी स्वाधीनता’ का रहस्य पता नहीं था। उनका चिंतन इतना ऊंचा और पवित्र नहीं था जिससे कि वे व्यक्ति के लिए ‘योगक्षेमकारी स्वाधीनता’ की कल्पना भी कर पाते। वेद ने ‘योगक्षेमकारी स्वाधीनता’ की बात कहकर विश्व की सभी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधाराओं पर अपनी उत्कृष्टता का परचम फहरा दिया है। विश्व में जितने भर भी ग्रंथ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधाराओं पर लिखे गये हैं वे सबके सब वेद के इस विचारबीज के समक्ष अत्यंत बौने हैं। उनको लिखने-पढऩे में उन्हें सदियों का समय लगा है और सबके उपरांत भी यह बहस उनमें आज भी जारी है कि सर्वोत्तम शासन व्यवस्था कौन सी है? सर्वोत्तम सामाजिक और आर्थिक विचारधारा कौन सी है? वह कभी इन तीनों विचारधाराओं को एक साथ मिलाकर देखते हैं तो कभी इन्हें अलग-अलग करके देखते व समझते हैं। इस प्रकार पूरा पश्चिमी जगत आज भी अंतद्र्वन्द्व में उलझा पड़ा है।
संसार के जितने देशों में राजशाही के विरूद्घ क्रांति हुई है-उन सबने अपने-अपने संविधानों में वेद के संविधान का यह सूत्र लिया और इसे सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के नाम से स्थान दिया। कहने का अभिप्राय है कि वेद की बात को हल्का सा समझने में भी पश्चिम को युगों का समय लग गया। इसके उपरान्त भी वह सामाजिक शान्ति की खोज में है, उसके यहां राजनीतिक उथल-पुथल भारत से अधिक है और आर्थिक अपराध भी भारत से अधिक है। ऐसे में पश्चिमी देशों को विश्व का बौद्घिक नेतृत्व देने की वकालत करने वाले लोगों को सोचना होगा कि जो पश्चिम वेद के एक मंत्र के भी एक शब्द को समझने में आज तक असफल रहा है, वह ‘विश्वनायक’ कैसे हो सकता है?
‘विश्वनायक’ तो वही बनेगा जो विश्व को सर्वोत्तम व्यवस्था देगा और वह निस्संदेह भारत ही है। जिसने ‘योगक्षेमकारी स्वाधीनता’ की बात कहकर विश्व के हर व्यक्ति के लिए सुनिश्चित कर दिया कि हमारी स्वाधीनता सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय दिलाने वाली हो। समाज में या राजनीति में या अर्थजगत में कोर्ईं भी वर्ग या वर्ग समूह ऐसा ना हो जो लोगों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय दिलाने में बाधक हो। चिंतन वेद का ऊंचा है-इसलिए ‘विश्व नायक’ भी वेद की ही विचारधारा है।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय के शब्दों को स्थान दिया गया है। पश्चिम के उच्छिष्ट -भोजी तथाकथित बुद्घिजीवियों ने इन शब्दों को पश्चिम की मानवीय विचारधारा से लिया गया माना है और इस प्रकार भारत के संदर्भ में भी नेतापद पश्चिम को देकर उसे अपना बौद्घिक मार्गदर्शक मान लिया है। जबकि उनकी यह मान्यता सिरे से ही अतार्किक है, सच ये है कि पश्चिम ने जितना कुछ भी सीखा है-वह सब भारत से सीखा है।
प्रो. मैक्समूलर का कहना है कि-”संसार के इतिहास में वेद उस रिक्तता को पाटते हैं जिसे संसार की किसी भी अन्य भाषा का कोई भी ग्रंथ नहीं पाट सकता था।….मेरी मान्यता है कि प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो अपने पूर्वजों के अपने इतिहास के तथा अपने बौद्घिक विकास के संबंध में तनिक भी चिंतित है-वैदिक साहित्य का अध्यापन अपरिहार्य है।”
वेद की उत्कृष्टता को नमन करते हुए ग्यूगोल्ट ने कहा है कि-‘ऋग्वेद मानवता के राजपथ की सर्वोत्कृष्ट संकल्पना है।’
मोन्सलियोन डेल्टोस का कहना है कि-”ग्रीस और रोम का कोई भी स्मारक ऋग्वेद से अधिक मूल्यवान नहीं है।”
विश्व के अनेकों विद्वान ऐसे हुए हैं जिन्होंने वैदिक संस्कृति की सर्वोत्कृष्टता को ऐसे ही शब्दों में स्वीकार कर भारत का बौद्घिक नेतृत्व विश्व के लिए आज भी प्रासंगिक और उचित माना है।
विश्व के लिए अनुकरणीय है भारत की कलाएं
विश्व के पास कुछ भी ऐसा नहीं है जो भारत के ज्ञान-विज्ञान से अलग हो, या जिस पर उसका एकाधिकार हो। हर क्षेत्र में भारत ने विश्व का मार्गदर्शन किया है। यही स्थिति कला के क्षेत्र में भी कही जा सकती है।
श्रीमती मैनिंग का कहना है कि-”भारत की प्राचीन वास्तुकला इतनी आश्चर्य चकित करने वाली है कि जिस किसी प्रथम यूरोपीय ने उन्हें देखा होगा-उसके पास उनकी विचित्रता की स्वयं प्रशंसा को प्रकट करने के लिए शब्द भी न मिले होंगे, और यद्यपि जितना किसी वस्तु से अधिक परिचय हो जाता है, उतना ही इस प्रकार के भाव कम हो जाते हैं, परंतु यहां ऐसी बात नहीं है। आज भी गंभीरतम आलोचक जब इन्हें देखता है तो कह उठता है अहा! आश्चर्य जनक!! अति सुंदर!!!”
भारतीयों की वास्तुकला के विषय में प्रकट श्रीमती मैनिंग के इन शब्दों पर हमारी किसी प्रकार की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। भारतीयों की वास्तुकला और मूत्र्तिकला विश्व में अप्रतिम थी। आज भी भारतीयों की वास्तुकला के स्मारकों को देखकर दर्शक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। एक भवन की रचना की प्रशंसा करते हुए एलफिंस्टन महोदय कहते हैं-”दरवाजों एवं स्तंभों दिल्हों, एवं अन्य बड़े-बड़े स्थानों के सरदल तथा उन उच्चकोटि के ढांचों को जिन पर प्रचुर मात्रा में बेल-बूटे फल-फूल, मनुष्य, पशु एवं अन्य काल्पनिक वस्तुएं बनायी गयीं थी साथ में हर प्रकार के अलंकरण जो भी एक तीव्र बुद्घि वाला व्यक्ति सोच सकता या सृजित कर सकता है, से घेरा गया था। ये बेलबूटे जो फैले हुए पौधों विशेषकर बेलों की आकृति में एक ऐसा लालित्य प्रस्तुत करते थे जिसकी तुलना संसार के किसी भी अन्य भाग में नहीं मिलती थी।”
अपने पूर्वजों के विषय में ऐसी प्रशंसा सुनकर भला किस भारतीय को गर्व नहीं होगा? क्रमश:

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