इस समय विधवाओं की सुध लेने की जरूरत है देश में

रीता सिंह
देश की सर्वोच्च अदालत ने आश्रमों में कम उम्र की विधवाओं के रहने पर चिंता जाहिर करते हुए केंद्र सरकार से पूछा है कि विधवा विवाह को कल्याणकारी योजनाओं का हिस्सा क्यों नहीं होना चाहिए? न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने चिंता जताई कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है लेकिन उनके विवाह के बारे में कोई भी बात नहीं करता। पीठ ने सरकार से दो टूक कहा है कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर विधवाओं के पुनर्वास से पहले उनके विवाह को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी पर सफाई देते हुए सरकार की ओर से उसके महान्यायभिकर्त्ता (सॉलिसिटर जनरल)ने कहा कि सरकार के एजेंडे में विधवाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा और विधवागृहों में रहने वाली महिलाओं के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण की योजना है। लेकिन न्यायालय इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों पर दिखती हैं, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। न्यायालय ने महिला सशक्तीकरण नीति-2001 की असफलता पर भी सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि सरकार महिला सशक्तीकरण की नीति में बदलाव करे क्योंकि उसकी मौजूदा योजना पूरी तरह विफल है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को सुझाव दिया है कि विधवागृहों में रह रही महिलाओं को पास के बाल सुधारगृहों और वृद्धाश्रमों में काम करने मौका दिया जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने वृंदावन सहित देश के अन्य शहरों में रह रही विधवाओं के मसले पर सुनवाई पूरा करते हुए यह गंभीर और सख्त टिप्पणी की है। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह उचित और सामयिक है। आज देश भर में विधवाओं की स्थिति दारुण है और वे किस्म-किस्म की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। उनका जीवन दान और भीख के भरोसे घिसट रहा है। उन्हें अपनी जीविका के लिए मंदिरों में भजन-कीर्तन करने के अलावा अन्य कई कार्य करने पड़ रहे हंै। भजन-कीर्तन के एवज में उन्हें महज पांच रुपए से पचास रुपए तक मिलते हैं और वे इन पैसों से बमुश्किल अपनी जरूरतें पूरी कर पाती हैं। समझा जा सकता है कि महंगाई के इस दौर में इन चंद रुपयों से उनका गुजारा किस तरह होता होगा! कई स्वयंसेवी संगठनों ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि बहुत सारी विधवाएं अपनी भूख मिटाने के लिए न सिर्फ भीख मांगती हैं बल्कि कुछ तो अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए घरों में चौका-बर्तन भी करती हैं। भरपेट भोजन न मिलने से वे एक जिंदा लाश के रूप में तब्दील होती जा रही हैं। इसी का कुपरिणाम है कि उन्हें कई तरह की गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ दिनों पहले ही ‘फोग्सी फेडरेशन ऑफ ओब्स्टेट्रिक एंड गायनकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया’ के स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में पाया गया कि वृंदावन में रह रही विधवाओं में पच्चीस प्रतिशत कैल्सियम की भारी कमी से जूझ रही थीं और उनकी हड्डियां खोखली हैं। दस प्रतिशत विधवाओं को मधुमेह था और साठ प्रतिशत रक्ताल्पता की शिकार थीं। अ_ान्नबें प्रतिशत विधवाएं रक्तचाप से पीडि़त मिलीं और साठ प्रतिशत पेट संबंधी गंभीर बीमारियों की चपेट में थीं। यही नहीं, विधवाओं को व्यंगबाण और उपेक्षात्मक व्यवहार भी झेलने पड़ते हैं। वे क्या करती हैं, कहां जाती हैं और उनके यहां कौन आता-जाता है, ऐसे ढेरों सवालों के जरिए उन्हें प्रताडि़त किया जाता है। उनकी गरिमा पर भी सवाल उठाया जाता है। यही नहीं सामाजिक-धार्मिक कार्यक्रमों में भी उन्हें शिरकत करने से रोका जाता है। अगर विधवा किसी शुभकार्य में सम्मिलित हो जाती है और किसी तरह का विध्न उपस्थित हो जाता है तो इसके लिए उसी को जिम्मेदार माना जाता है। यानी केवल पति की मृत्यु का शोक ही उसके लिए त्रासदी नहीं होता। बल्कि उसे कट्टर रीति रिवाजों के अनुसार जीवन गुजारना पड़ता है। कभी-कभार तो उसका मुंडन भी कर दिया जाता है।
एक विधवा के लिए हिंदू समाज में विशेष तरह के नियम गड़े गए हैं जिसके अनुसार जिंदगी गुजारना अत्यंत दुरूह होता है। मसलन वह रंग-बिरंगी नहीं बल्कि सफेद धोती या साड़ी पहनेगी, वह किसी प्रकार का आभूषण और शृंगार नहीं कर सकती। हद तो तब हो जाती है जब उसे अशुभ करार देकर कई बार नृशंसतापूर्वक उसकी हत्या कर दी जाती है। विधवाओं के जीवन का सबसे दुखद पहलू यह भी है कि मृत्यु के बाद उचित रीति से उनका अंतिम संस्कार भी नहीं होता। स्वयंसेवी संगठन मृतका के शव को किसी नदी के हवाले कर देते हैं। दो साल पुराने आंकड़े के मुताबिक देश में पांच करोड़ से भी अधिक विधवाएं थीं। उन्हें परंपरा और रीति-रिवाज की आड़ लेकर अधिकारों से वंचित और बेदखल कर दिया गया है। कुछ साल पहले एक स्वयं सेवी संस्था ने उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर विधवाओं की दयनीय्ं हालत सुधारने और उन्हें आवास उपलब्ध कराने की मांग की थी। इस पर अदालत ने सरकार को आगाह किया कि वह विधवाओं को आवास उपलब्ध कराए और उनके जीवन निर्वाह के लिए निश्चित धनराशि मुकर्रर करे। इस निर्देश के बाद सरकार ने वृंदावन में एक हजार विधवाओं के रहने के लिए आवास बनवाने का भरोसा दिया था। इसके लिए सत्तावन करोड़ रुपए का बजट भी आवंटित किया गया था। योजना के मुताबिक 2017 के अंत तक विधवाओं के लिए आवास तैयार हो जाना चाहिए। अब देखना है कि सरकार इस दिशा में कितना कामयाब हो पाती है। देश में सर्वाधिक विधवाएं शिव की नगरी बनारस और राधा-कृष्ण की नगरी वृंदावन में रहती हैं।
बनारस और वृंदावन धार्मिक नगरी हैं और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। वृंदावन का शाब्दिक अर्थ है तुलसी का वन। लेकिन आज इस नगरी की पहचान विधवाओं की नगरी के रूप में हो रही है। यहां आश्रमों में हजारों की तादाद में विधवाएं रह रही हैं। माथे पर तिलक और गले में कंठी धारण किए कम उम्र और उम्रदराज- विधवाएं बड़ी संख्या में रह रही हैं। आमतौर पर माना जाता है कि यहां रह रही विधवाएं कृष्ण भक्त हैं और मोक्ष के लिए आई हैं। लेकिन एक दूसरा सच यह भी है कि इनमें से कई ऐसी हैं जो स्वयं नहीं आई हैं, बल्कि परिवार ने या तो उन्हें छोड़ दिया है या यहां रहने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है। ज्यादातर विधवाओं के परिवार में या तो कोई सदस्य नहीं बचा है या उनके परिवार वाले उनकी देखभाल को तैयार नहीं हैं। समाज के रिश्ते-नातों और दुनिया के रंगों से अलग कर दी गई ये स्त्रियां बदलते वक्त के साथ समाज की मुख्य धारा में लौटना चाहती हैं। कई महिलाओं के मन में विवाह बंधन में बंधने की लालसा भी है। लेकिन समाज की दकियानूसी बेडिय़ों के कैद से मुक्त हो पाना अब भी उनके लिए पहाड़ लांघने जैसा है। आज देश इक्कीसवीं सदी में आधुनिक विचारों से लैस है। महिलाओं को मुख्य धारा में लाने और उन्हें बराबरी का हक देने के लिए प्रभावी कानून गड़े जा रहे हैं। लेकिन विडंबना है कि देश में सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं की जकडऩ जस की तस बनी हुई है।
1856 में ब्रिटिश सरकार ने विधवाओं पर होने वाले अत्याचार को रोकने और उनका मानवीय अधिकार वापस दिलाने के लिए हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया था। यह अधिनियम विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत देता है। इस अधिनियम में स्पष्ट कहा गया है कि यदि दूसरे विवाह के समय स्त्री के पति की मृत्यु हो चुकी है तो ऐसा विवाह वैध है। इस अधिनियम के मुताबिक ऐसे विवाह से उत्पन सभी संतानें भी वैध मानी जाएंगी। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि भारतीय समाज विधवाओं को उचित सम्मान और आदर दे तथा सरकार भी ऐसे विधवाओं को पुनर्विवाह के लिए प्रेरित करे जो कम आयु की हैं। समाज और सरकार दोनों को समझना होगा कि विधवाओं को उचित सम्मान, अधिकार और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराए बिना स्त्री के अधिकार और बराबरी की बातें फिजूल हैं।

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