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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-21

मि. विन्सेंट ए. स्मिथ अपनी पुस्तक ”भारत एवं श्रीलंका की उत्तम कला का इतिहास” के पृष्ठ 22 पर सम्राट अशोक द्वारा स्थापित ‘अखण्ड स्तंभ’ के बारे में हमें बताते हैं-”इतने विशाल आकार के अखण्ड स्तंभ का ढालना, सजाना, खड़ा करना, इस बात का प्रमाण है कि अशोक के काल में इंजीनियर एवं पत्थर काटने वाले प्रवीणता एवं साधनों की दृष्टि से किसी भी काल और देश के अपने प्रतिपक्षियों से किसी भी दशा में कम नहीं थे।”
वास्तुकला में तालाब, बावड़ी, कुंआ और प्रासादों का निर्माण सम्मिलित था। इनके निर्माण में भी हमारे ऋषि पूर्वजों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त था। प्रो. हीरेन ने भारत की वास्तुकला और ग्रीक व मिस्र की वास्तुकला का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने अपने निष्कर्ष में लिखा-‘स्तंभों पर की गयी सजावट की सुंदरता अन्य बातों के अतिरिक्त उन पर बनायी गयी मूत्र्तियां जो परियों जैसी लगती हैं के बनाने में तो हिंदुओं ने इन दोनों राष्ट्र-ग्रीक एवं मिस्र को परास्त कर दिया है।’
समय का संकेत करने के लिए घटी बनाने की कला भी भारतीयों को शेष विश्व से पूर्व ज्ञात थी, इस कला में जलयंत्र, बालु का यंत्र, धूप घड़ी आदि सम्मिलित थी। आजकल के संसार में घटी के स्थान पर घड़ी आ गयी है, परंतु भारत में अभी भी ज्योतिषी लोग घड़ी, पल आदि के माध्यम से शुभविवाह मुहूत्र्त निकालते हैं। ज्योतिषियों के पंचांग आज भी शेष विश्व के लिए आश्चर्य और कौतूहल का विषय हैं। जिनमें एक वर्ष की मौसम आदि संबंधित घटनाओं का पूर्व में ही उल्लेख कर दिया जाता है। इतना ही नहीं हमारे ज्योतिषी लोग प्राचीनकाल से ही सैकड़ों वर्ष आगे के विषय में यह बता दिया करते थे कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण कौन से माह की कौन सी अमावस्या या पूर्णिमा को होगा?
वस्त्रों की छपाई भी एक कला है। इस कला को आज भी हमारे बुनकर भाई राजस्थान जैसे प्रांतों के कई शहरों में बड़ी कुशलता से अपनाये हुए हैं। प्राचीन भारत में कौशल विकास वर्णाश्रम व्यवस्था में स्वयं ही संपन्न हो जाता था, जब एक बालक अपने पिता से स्वयं ही वस्त्र छपाई सीख जाता था। इस प्रकार भारतीय वर्ण व्यवस्था कला-कौशल विकास और उसके संरक्षण व संवद्र्घन में भी सहायक होती थी। भारतीयों ने जल, वायु और अग्नि के संयोग से बनने वाली भाप का निरोध कर उससे अनेक क्रियाओं की खोज की। जिससे हमारे उद्योगों में और कृषि आदि में प्राचीनकाल में बड़ी उन्नति हुई।
कला सौंदर्यबोध और नवीनता की परिचायक होती है। ईश्वर ने अपनी इस कला का प्रकृति के कण-कण में सौंदर्य बोध कराया है और सौंदर्य के लिए कला की भावना को मनुष्य के हृदय में एक कुशल चितेरे की भांति उकेर दिया है। यही कारण है कि मानव हृदय रह-रहकर सौंदर्य बोध से प्रेरित होकर कला का और उत्तमता से विकास और संवर्धन करता है। हर व्यक्ति को प्राकृतिक सौंदर्य भाता है, प्राकृतिक सौंदर्य में खोकर व्यक्ति सौंदर्यबोध के नये-नये आयामों को अपनी अंतर्मन की कल्पनाओं में उकेरने लगता है और उनमें खो जाता है, और इस प्रकार कला बोध का यह कार्य मनुष्य के हाथों संपन्न होने वाला ईश्वर का कार्य है। ईश्वर ने प्रकृति को जितनी सुघड़ता से गढ़ा है-उतनी ही वह मनुष्य को प्रेरणा देती है और मनुष्य उसकी देखा-देखी नई-नई कलाएं सीखता है और उसके सौंदर्य को अपने ढंग से प्रकट करने का कार्य करता है। ईश्वर प्रदत्त वस्तुओं और पदार्थों के संयोग से मनुष्य ने अपनी कला का विकास किया है। जिसमें ईश्वर ने भी प्रकृति से वस्तुएं या पदार्थ उपलब्ध कराके मनुष्य की भरपूर सहायता की है।
मनुष्य ने नौका निर्माण किया। इसमें ईश्वर ने अथवा प्रकृति ने मनुष्य को लकडिय़ां उपलब्ध करा दीं। मनुष्य ने रथ का निर्माण किया तो उसके लिए भी आवश्यक वस्तुएं मनुष्य को प्रकृति ने उपलब्ध करा दीं। उनका संयोग मनुष्य ने किया और देखा कि उसने अपने उपयोग के लिए एक नई वस्तु का निर्माण कर लिया है। यहां देखने वाली बात यह है कि भारतवासियों की हर खोज में सकारात्मकता है, उसमें मानव जाति के विध्वंस की कोई योजना नहीं है।
अपनी सकारात्मक खोजों के माध्यम से भारत ने अपनी कला का विस्तार किया और अपनी दूर देश की यात्राओं को सहज व सरल बनाने का हरसंभव प्रयास किया। मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ीं और साथ ही अपनी कलाओं के विस्तार से जिज्ञासा भाव और उत्साह भी बढ़ा तो प्राचीनकाल में भारतवासी नौका और रथ तक ही नहीं रूके अपितु वे खोज करते-करते हवाई जहाजों और जलयानों तक भी पहुंच गये। कला का सौंदर्यबोध और उस सौंदर्य के प्रति मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण उसे आगे ही आगे बढ़ाता गया। इस प्रकार कला के विकास ने मानव के व्यक्तित्व के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सूत्रादि से या स्तर से रस्सी बनाना भी एक कला है। पटबंध अर्थात वस्त्र की रचना करना भी एक कला है। इन दोनों कलाओं में भी भारतवासी प्राचीनकाल से ही निष्णात रहे हैं। मि. आर्मे का कथन है-”भोजन बनाने वाली भारतीय युवती के हाथ एक यूरोपीय सुंदरी के हाथों की अपेक्षा अधिक कोमल होते हैं। स्त्रियां रेशम के कीड़े से कोये से कच्चे रेशम की लच्छी बनाती हैं। कच्चे रेशम के कोये को बारीकी से विभिन्न प्रकार की श्रेणी में विभक्त किया जाता है और इन स्त्रियों की स्पर्श की भावनाएं इतनी उत्तम होती हैं कि जब इनकी अंगुलियों के बीच में बड़ी तेजी से धागा चला जाता है तो ये आंखों से काम नहीं ंलेतीं। यदि धागे का वर्गीकरण बदल जाता है तो ये उसे तुरंत तोड़ देती हैं और इनकी स्पर्श शक्ति इतनी प्रबल होती है कि यदि धागा प्रथम श्रेणी का हो जाता है तो ये उसे तुरन्त बीसवीं श्रेणी में बदल देती है। इसी प्रकार 19वीं से दूसरी में बदल देती हैं आदि आदि। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने स्वयं धैर्यवान एवं कुशल हिंदुओं को कला में उत्कृष्टता का उपहार दिया है। ऐसा लगता है कि-अन्य राष्ट्रवासियों की शारीरिक संरचना हिंदुओं की करघा कला की प्रवीणता तथा उन सब अन्य कलाओं में जिनमें भावनाओं नजाकत की आवश्यकता है, प्रतिद्वन्द्विता में ठहरने में सक्षम नहीं है।”
मि. एल्फिन्सटन भारतीय सूती कपड़े की बुनावट को देखकर चकित रह गये थे। तब उन्होंने उस सूती कपड़े को बनाने की भारतवासियों की कला से प्रभावित होकर लिखा था-”इसकी सुंदरता व मृदुलता जिसकी बहुत प्रशंसा की गयी है, तथा इसकी बनावट इतनी महीन है कि संसार का कोई भी देश आज तक भी इस स्तर पर नहीं पहुंच पाया है।”
श्रीमती मैनिंग ने कहा है कि-”ईसा से कुछ शताब्दियों पूर्व (भारतीय) वे लोग ऐसी मलमल बनाते थे-जिसे हमारी 19वीं शताब्दी की मशीनें भी मात नहीं दे सकतीं।”
इन उदाहरणों व उद्घरणों से स्पष्ट है कि भारत कपड़े की बुनावट की कला में भी विश्व में अद्वितीय स्थान रखता था। उस समय भारत के कपड़े बुनावट का संसार में कोई भी देश मुकाबला नहीं कर सकता था।
हमारे महान पूर्वजों को विश्व के अन्य देशों के लोगों से पहले रत्नों की पहचान करने की कला आ गयी थी। सोने के नकली या असली होने की पहचान भी भारतवासियों को थी। नकली सोने चांदी को वे झट से पहचान जाते थे। सोने चांदी के आभूषण बनाना भी सर्वप्रथम भारतीयों ने ही सीखा था।
क्रमश:

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